सूखे से ऐसे लड़ रहा है सोशल मीडिया

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विश्व के कई देशों में भयंकर सूखे के हालात से छह करोड़ लोगों को आकस्मिक राहत की आवश्यकता है.

सूखे की स्थिति को एल-नीनो फ़ैक्टर ने और गंभीर कर दिया है.

भारत के कई राज्य भी इस वक़्त सूखे की चपेट में हैं और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले दो मॉनसून में बारिश नहीं होने की वजह से देश में 33 करोड़ लोग सूखे की चपेट में हैं.

इस बीच सूखे की इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए सोशल मीडिया का कई तरीक़े से इस्तेमाल किया जा रहा है.

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सोशल मीडिया का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में हो रहे पलायन को दुनिया के सामने लाने और वहां मदद पहुंचाने के लिए किया जा रहा है जहां अपेक्षाकृत माीडिया की पहुंच बेहद कम है.

अंतरराष्ट्रीय विकास के लिए काम करने वाली अमरीकी एजेंसी 'यूएस एड' के मुताबिक़, लेसोथो उन 14 अफ़्रीक़ी देशों में शामिल है जहां खाद्य पदार्थों का संकट पैदा हो गया है. यह हालत अकाल प्रभावित होने की घोषणा के पहले थी.

यही कारण है कि मलावी, स्वाज़ीलैंड और ज़िम्बाब्वे की तरह यहां भी आपातकाल घोषित कर दिया गया है.

अगर आप गूगल पर पिछले छह महीनों में इन देशों में सूखे पर कहानियां ढूंढें तो हज़ारों कहानियां मिलेंगी: ज़िम्बाब्वे पर 5,720 कहानियां, मलावी पर 2,940, सेनेगल पर 1600 और लेसोथो पर 794.

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इस साल की शुरुआत में ब्रिटेन की चैरिटी संस्था, 'सेंड अ काउ' ने लेसोथो के गंभीर संकट पर सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए ट्विटर पर एक लाइव चैट सेशन का आयोजन किया था.

चैरिटी के डायरेक्टर, मैनथेथ मोनिथी बताती हैं, "लेसोथो के लिए प्रचार आसान नहीं था क्योंकि ज़्यादातर लोगों को इस जगह के बारे में पहले कुछ नहीं पता था और यही कारण है कि इसके लिए फंड इकट्ठा करना मुश्किल हो गया था."

मोनिथी के मुताबिक़, वो लेसोथो में थीं और धीमे इंटरनेट कनेक्शन और बिजली की कमी के बावजूद लाइव चैट में काफ़ी लोगों ने हिस्सा लिया. इससे चैरिटी को फंड इकट्ठा करने में मदद मिली.

'सेव अ काउ' चैरिटी ने भी भविष्य में इस तरह के सोशल मीडिया संवाद आयोजित करने की योजना बनाई है.

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दक्षिण अफ्रीका में एक खेत में मरे जानवरों के दृश्य ने व्यापारी एनसी शूम्बी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने फेसबुक पर 'द फामर्स इन डिस्ट्रेस ग्रुप' बनाया.

तब से उन्होंने इस ग्रुप के ज़रिए पैसों और चारों के रूप में चंदा इकट्ठा करना शुरू किया और इन चारों को ज़रूरतमंद किसानों तक पहुंचाने का भी ज़िम्मा उठाया.

इसी सोच से प्रभावित होकर एक और फेसबुक पेज, 'वॉटर शॉर्टेज साउथ अफ़्रीक़ा' शुरू हुआ है जो लोगों से अनुरोध करता है कि अगर वो सूखा-ग्रस्त इलाक़ों का दौरा करते हैं तो वहां पानी की बोतलें पहुंचाएं.

इस पेज के संस्थापक, कैरोलीन वैन सैसेन ने मूल रूप से इस बात की परिकल्पना की थी कि जिन क्षेत्रों में पानी की ज़रूरत हो वहां पानी की बोतलें गिराई जाएं.

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अब हज़ारों सदस्य सूखाग्रस्त इलाक़ों में पानी की बोतलें पहुंचाने में मदद करते हैं. कई लोगों ने अपने घरों को ड्रॉप-ऑफ प्वाइंट बनाया है. कई कंपनियां भी मुहिम से जुड़ गई हैं.

कैलिफोर्निया में कई सालों के सूखे ने #ड्राउटशेमिंग को जन्म दिया जहां लोग इस हैशटैग के साथ सोशल मीडिया पर पानी बर्बाद करने की तस्वीरें पोस्ट करते हैं.

उनका उद्देश्य उन लोगों को शर्मसार करना है जो पानी बर्बाद करते हैं और उन्हें जल संरक्षण के नियमों से बांधने की कोशिश की जाती है.

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अधिकारियों ने इसपर सवाल उठाए हैं और कहा है कि लोगों को शर्मशार करने की बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

उनका कहना है कि पानी की बर्बादी की घटनाओं को सामने लाने के लिए ऐप तैयार किया है जिससे इस तरह के मामले सामने आएं और नियम लागू किए जा सकें.

ऐसे दूसरे ऐप भी है जो लोगों को पानी के सही इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

उदाहरण के तौर पर 'ड्रिप डिटेक्टिव', एक मुफ़्त ऐपल ऐप है जो यूज़र को ये ट्रैक करने में मदद करता है कि एक नल से टपकता पानी उसकी जेब पर कितना भारी पड़ रहा है.

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फिलीपींस के मिंडानाओ क्षेत्र में क्लाउड वॉचर्स को इस तरीक़े से प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि कि वो बारिश वाले बादलों की पहचान कर सकें.

वो जियोकैम ऐप का इस्तेमाल कर तस्वीरें लेते हैं जिसे क्लाउड सीडिंग टीम को भेजा जाता है.

यह टीम भेजी गई तस्वीरों का जीपीएस डेटा से मिलान करते हैं, जैसे नमी और हवा की दिशा आदि, फिर तय किया जाता है कि कहां क्लाउड सीडिंग करना ठीक रहेगा.

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लेकिन एक ऐसा क्षेत्र भी है जहां ऐप्स और सोशल मीडिया अभी तक कुछ ख़ास नहीं कर पा रहा है.

वेनेज़ुएला, थाईलैंड और भारत जैसी जगहों पर लगातार पानी के गिरते स्तर ने बिजली बनाने वाले पनबिजली घरों की क्षमता को सीमित करना शुरू कर दिया है.

ये एक ऐसा मामला है जिसमें सोशल मीडिया अभी तक बहुत कारगार नहीं हो पाया है.

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