... वो दौर जब चीन में हर तरफ थी अराजकता

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चीन में जिसकी भी उम्र पचास साल से ज़्यादा है, उसने वहाँ की सांस्कृतिक क्रांति को ज़रूर देखा होगा.

अगर किसी का जन्म साल 1966 में हुआ हो, जब ये क्रांति ख़त्म हुई, उस वक़्त उनकी उम्र दस साल रही होगी.

अगर उस दौरान किसी के माता-पिता प्रोफेसर, कलाकार या सरकारी अधिकारी रहे हों, तो हो सकता है उन्होंने नौजवानों को भीड़ के हाथों सड़कों पर घसीटे जाते, अपमानित होते और संभव है कि मौत हो जाने तक पिटते हुए भी देखा हो.

उस वक़्त कुछ ख़ुद को कोस रहे थे, तो कुछ 'पुरानी संस्कृति' को जला देने और बर्बाद कर देने की बात कर रहे थे.

कुछ खेतों में कड़ी मेहनत करने वाले किसानों से सीखने की बात को सही सोच के तौर पर देख रहे थे.

वहाँ एक दशक तक क़रीब सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई ठप पड़ गई थी. अस्पतालों में बमुश्किल काम हो रहा था और हर तरफ अराजकता का बोलबाला था.

माओत्से तुंग ने उस वक़्त वापस कम्युनिस्ट पार्टी का बागडोर अपने हाथ में ले ली थी और पूरे देश में क्रांतिकारी जागरूकता फैलाने की ज़ोर-शोर से कोशिश हो रही थी.

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माना जाता है कि चीन की इस सांस्कृतिक क्रांति में दस लाख़ से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

चीन की सांस्कृतिक क्रांति की 50वीं वर्षगांठ पर ऐसा लगता है कि चीनी मीडिया ने खामोशी ओढ़ रखी है.

सरकारी अख़बार और टेलीविजन चैनल ने इस पर कोई रिपोर्ट नहीं की है. कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण वाले फ़ीनिक्स टेलीविजन का प्रसारण हांगकांग से होता है.

यह कभी-कभी चीन के टेलीविज़न से ज़्यादा उदारवादी रवैया अपनाता है.

फ़ीनिक्स टेलीविजन ने सांस्कृतिक क्रांति की वर्षगांठ पर एक विशेष ऑनलाइन फ़ीचर तैयार किया है, लेकिन इसका लिंक अब काम नहीं कर रहा है.

लेकिन चीनी ट्विटर कहे जाने वाले 'वाइबो' पर सांस्कृतिक क्रांति को लेकर चीन के लोगों की राय देखने को मिल रही है.

सीना न्यूज़ वेबसाइट पर इससे जुड़ा कोई भी लेख तो मौजूद नहीं है, लेकिन वेबसाइट ने 1981 का कम्यूनिस्ट पार्टी का एक दस्तावेज़ डाला हुआ है, जो बताता है कि 'सांस्कृतिक क्रांति' को माओत्से तुंग ने खड़ा किया था और इसकी वजह से 'पार्टी, देश और देश के लोगों को गंभीर नुकसान झेलने पड़े.'

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इस दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि इस राजनीतिक आंदोलन का मार्क्सवाद और लेनिनवाद से कोई लेनादेना नहीं है और 'ना ही चीनी समाज की सच्चाई' है.

पार्टी समर्थक अख़बार 'द ग्लोबल टाइम्स' ने ज़्यादा कुछ नहीं लिखा है, लेकिन इसके ऑनलाइन पेज पर एक औरत की तस्वीर दिखाई गई है, जो माओत्से तुंग के पोट्रेट के सामने बैठकर नूडल्स खा रही है.

इसका शीर्षक लिखा हुआ है 'त्रासदी की वर्षगांठ'.

ग्लोबल टाइम्स के संपादक हू शीजिंग ने वाइबो पर पोस्ट किया है, "बीजिंग में मेरे माता-पिता और दादी के घर पर छापा पड़ा था, क्योंकि उन्हें ज़मींदार' माना गया था".

उन्होंने लिखा है, "यह मेरी सबसे भयावह याद है. उस वक़्त मैं छह साल का था. रेड गार्ड ने मेरी दादी को 'ज़मीन-मालकिन' कहते हुए ज़मीन पर धक्का देकर गिरा दिया था. उन्होंने दादी को थप्पड़ मारा. वो रो रही थीं, मेरी दादी को बीजिंग छोड़ने पर मज़बूर किया गया. मेरे पिता उनकी एकलौती संतान थे और मेरी दादी के सिर्फ़ एक ही रिश्तेदार थे, जो उनकी देखभाल कर सकते थे."

वो लिखते है, "बहुत ही कम उम्र से मुझे हर फ़ॉर्म में 'ज़मींदार' भरना पड़ता था. मैं बहुत शर्मींदगी महसूस करता था. सांस्कृतिक आंदोलन की यादें बहुत कड़वी है!"

इसके बावज़ूद भी बहुत से लोगों ने 'वाइबो' पर हू शीजिंग पर पाखंडी होने का आरोप लगाया है, क्योंकि उनके अख़बार ने इस मुद्दे को नज़रअंदाज़ किया है.

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