अगली पीढ़ी के करी शेफ़ कहां से आएंगे

भारतीय रेस्तरां

ब्रिटेन में अब भारतीय खाने में ही नहीं बल्कि वहां के भारतीय रेस्त्रां में पक रहे राजनीतिक गतिरोध में भी मसालों का तड़का लग रहा है.

सवाल उठने लगे हैं कि वहां अब अगली पीढ़ी के करी शेफ़ कहां से आएंगे और क्या ब्रिटेन के यूरोपीय संघ छोड़ने से स्थानीय भारतीय होटल व्यवसायियों को अपने रेस्त्रां बंद नहीं करने पड़ेंगे?

फ़िलहाल ब्रिटेन में आलम ये है कि हर हफ़्ते दो से तीन करी रेस्त्रां बंद हो रहे हैं.

दशकों से भारतीय खाना, चाहे वो चिकन टिक्का मसाला हो या देर रात तक मिलने वाले वंदालू- ये तय था कि इसे बनाने वाले खानसामे बांग्लादेशी हैं या ऐसा कोई जिसके पिता वहां से थे.

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. ज़्यादातर रसोईघरों से अब पूर्वी यूरोपीय, ख़ासकर रोमानियन लोगों की आवाज़ें सुनने को मिलती हैं .

इसका कारण है कि मुश्किल आव्रजन नियमों के चलते इन रेस्त्रां के लिए बांग्लादेश या दूसरे एशियाई देशों से नए खानसामे लाना बेहद महंगा पड़ता है.

एक दशक पहले एक करी शेफ़ सालाना 15 हज़ार पाउंड कमा लेता था. लेकिन अब एक रेस्त्रां को इसका क़रीब दोगुना देना पड़ता है और साथ ही यूरोपीय संघ के बाहर से शेफ़ लाने के लिए उन्हें कई जटिल नौकरशाही बाधाओं का सामना करना पड़ता है.

बांग्लादेश केटरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पाशा खांडाकर के मुताबिक ये 'आव्रजन का दोहरा मानक' है.

उन्होंने कहा, "हमें ब्रिटिश मंत्रियों ने यूरोपीय संघ के लोगों को नौकरी पर रखने को कहा है. लेकिन इससे भाषाई दिक्कत, सांस्कृतिक मेलजोल में परेशानी और यहां तक कि महक की भी दिक्क़त हो रही है."

उनके मुताबिक पूर्वी यूरोपीय कर्मचारियों को करी की महक पसंद नहीं आती.

पाशा खांडाकर कहते हैं, "हमें दुनियाभर के सभी लोगों को एक मौका देना पड़ेगा जो इन कामों के लिए बिल्कुल सटीक हैं. बहुत से एशियाई मूल के ब्रितानी पूछते हैं कि क्यों करी होम में काम करने के लिए एक रोमानियन को लाना आसान और कम खर्चीला होता है बजाए एक बांग्लादेशी के?"

ज़्यादातर लोग मानते हैं कि अब आव्रजन नियम उनके और उनके परिवारों के लिए भेदभाव पूर्ण हैं और यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने के समर्थक भी इन्हीं नियमों को हटाने की मांग करते रहे हैं.

रोज़गार मंत्री और ब्रिक्सिट की प्रसिद्ध समर्थक प्रीति पटेल का दावा है कि यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में वोट ही करी व्यवसाय को बचाने के लिए एकमात्र रास्ता है.

इसके पीछे अनुमान ये लगाया जा रहा है कि यूरोपीय संघ से निकलने के बाद ब्रितानी जनता आव्रजन नियमों को लेकर इतनी तनाव मुक्त हो जाएगी कि वहां के नेता दुनियाभर से आने वाले कम क्षमता और कम वेतन वाले कर्मचारियों को रोकने के लिए बनाए गए कड़े आव्रजन नियमों को सरल कर देंगे.

सर्रे के एक रेस्त्रां के बांग्लादेशी मूल के चीफ़ शेफ़ बताते हैं कि अब उन्हें रोमानियन भाषा सीखनी पड़ रही है क्योंकि उनके रसोईघर में अब ऐसे लोग काम कर रहे हैं जिन्होंने कभी करी बनाना तो दूर, कभी इसकी महक तक नहीं सूंघी थी.

इसी रेस्त्रां के मालिक जेफ़्री अली मानते हैं कि ब्रिक्सिट से इस करी व्यवसाय को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होने वाला है. इंडस्ट्री को बचाने के लिए दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ेगा.

वो मानते हैं कि अगर आव्रजन नियमों में ढिलाई भी की गई तो कोई नेता ये नहीं कहेगा कि अब जब यूरोपीय संघ से लोगों का आना कम हुआ है तो हम राष्ट्रमंडल देशों से ज़्यादा लोगों को ला सकते हैं.

हालांकि आव्रजन नियम ही वो मुख्य कारण है जिसकी वजह से इनमें से ज़्यादातर लोग यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में वोट देंगे.

लेकिन एक बात साफ़ है कि अगर 23 जून को वो यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में भी वोट डालते हैं तो भी ये बहस कि कितने आव्रजन की ज़रूरत है और एक देश के तौर पर कितना स्वीकार कर पाते हैं ये सवाल उसी तरह रहेंगे जैसे ये सवाल कि कौन भविष्य में भारतीयों के लिए खाना पकाएगा और परोसेगा?

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