उफ़नती नदी में दो नोटबुक और एक टेप रिकॉर्डर

जिम मूर

पच्चीस साल पहले उत्तरी इराक़ की लगभग पूरी कुर्द आबादी सद्दाम हुसैन की फ़ौजों के चंगुल से बचने के लिए सामूहिक पलायन कर गई थी.

मैं सीमा पर उफ़नती नदी के रास्ते एक छोटी नाव में कुर्दिस्तान पहुंचा था. मेरे पास दो नोटबुक, एक टेप रिकॉर्डर और चार कैसेट्स थे.

कुर्दों ने अपने पूरे इलाक़े पर नियंत्रण कर रखा था, जिसमें इरबिल जैसा बड़ा शहर, किरकुक, सुलेमानिया और दोहुक शामिल थे.

इराक़ी सेना पस्त हो चुकी थी. कुर्द जीत की खुशी मना रहे थे. लेकिन यह खुशी बहुत जल्द ही काफ़ूर होने वाली थी. सद्दाम ने दोबारा हमला किया. इस बार टैंक, आर्टिलरी और हेलीकॉप्टर गनशिप भेजी.

इस हमले से घबराए दसियों लाख लोग इन शहरों को छोड़कर तुर्की और ईरान की सीमा के क़रीब पहाड़ों की ओर पलायन करने लगे.

वो हर किस्म के वाहनों में सफ़र कर रहे थे. एक मरीज़ दोहुक के अपने अस्पताल बेड के साथ ही बाहर आ गया था.

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एक बच्चा इरबिल से आ रहे एक बुलडोज़र पर बैठा था. अधिकांश लोग पैदल थे. पहाड़ की 9,000 फ़ुट ऊंचाई से लेकर मैदान तक जाने वाले रास्ते पर वाहनों का तांता लगा हुआ था.

मौसम बहुत ठंडा था. अधिकांश लोग भूख और डिसेंट्री से मर गए थे. लोग मरे हुए बच्चों को सड़क के किनारे ही दफ़न करते जा रहे थे.

लेकिन पीछे कुर्द पशमर्गा गुरिल्ला रुक गए थे. कई लड़ाइयों का तो मैं खुद गवाह रहा, जिनमें उन्होंने पहाड़ों की ओर आते इराक़ी सुरक्षा बलों को पीछे धकेल दिया था.

लेकिन कुर्द आबादी के पलायन ने दुनिया का ध्यान खींचा. पश्चिमी महाशक्तियों ने कुर्द आबादी को बचाने के लिए उत्तरी इराक़ को नो फ़्लाई ज़ोन घोषित कर दिया.

आजकल तो वहां सैटेलाइट ट्रकों और इंटरनेट का बोलबाला होगा और इस दौरान की एक-एक कहानी लाइव प्रसारित हो रही होगी.

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लेकिन उस दौरान मैं क्या कर सकता था. अगर मैं मसूद बारज़ानी के केडीपी का लड़ाका होता तो मुझे पशमर्गा सेना के रेडियो से दश्मिक ख़बर देनी पड़ती जहां से वो किसी तरह लंदन भेजते, या अगर मैं जलाल तालाबानी और उनके पीयूके में होता तो मैं सैटेलाइट फ़ोन का सहारा लेता, जो कि संभवत: उस समय इराक़ का इकलौता सैटेलाइट फ़ोन था.

लेकिन इस दौरान मैंने चारों कैसेट्स रिकॉर्ड किए. इसमें उस समय के हालात का ब्यौरा, साक्षात्कार और लड़ाई से संबंधित चीजें थीं.

आख़िरकार जब मैं यहां से लौटा तो ये कैसेट्स मेरे साथ थे. तबसे काफ़ी कुछ बदल चुका था. नई कहानियों पर काम करना था, इसलिए ये कैसेट्स 25 साल तक वैसे ही पड़े रहे, जब तक कि हमने इस पर एक कार्यक्रम करने का निश्चय नहीं किया.

मैं बड़ा उत्सुक था. इसमें बारज़ानी और तालाबानी के साक्षात्कार थे और एक अन्य कुर्द नेता सामी अब्दुल रहमान का भी साक्षात्कार था, जिनके बूढ़े पिता की दोहुक से पलायन के दौरान मौत हो गई थी.

एक मशहूर अभिनेता हामा अली से पहाड़ों में मेरी मुलाक़ात हुई थी. इस पलायन में उनकी पत्नी और बच्चे खो गए थे. इसके अलावा बहुत सारी आवाजें और ब्यौरा इन कैसेट्स में मिला.

कहानी को आज के संदर्भ में बनाने के लिए मैं उन लोगों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए 25 साल बाद फिर से कुर्दिस्तान गया.

मसूद बारज़ानी इराक़ी कुर्दिस्तान के स्वायत्त क्षेत्र के राष्ट्रपति बन गए हैं.

सामी अब्दुल रहमान की 2004 में एक आत्मघाती बम हमले में उनके बेटों के साथ मौत हो गई है.

इरबिल के एक विशाल सार्वजनिक पार्क में उनका नाम लिखा है. मैंने उनके बेटे सिरवान का साक्षात्कार भी लिया.

अभिनेता हामा अली को मैंने सुलेमानिया में ढूंढ निकाला. उन्होंने अपने दो महीने की बच्ची और परिवार को ढूंढ लिया था और अब वो नाना बनने वाले हैं.

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लेकिन मैं दो चीजों को नहीं खोज सका. एक, वो इराक़ी सैनिक जो लड़ाई के मैदान में दो दिनों तक अपने साथियों की लाशों के साथ बुरी तरह घायल पड़ा मिला था जिसे पशमर्गा लड़ाकों ने कार में डालकर सरकार के नियंत्रण वाले इलाक़े में भेज दिया था. पता नहीं वो बचा कि नहीं.

और दूसरा आठ साल का एक बच्चा, जिससे पहाड़ों में मुलाक़ात हुई थी. वो अपने हाथ में एक सूटकेस लिए था. इस अफ़रा-तफ़री में अपने परिवार से बिछड़ गया था. पता नहीं उसका क्या हुआ?

कुछ ऐसी ही चीजें हैं जिन्हें मैं कभी नहीं जान पाउंगा.

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