कब होगी हेलिकॉप्टर एयरलाइनर्स की शुरुआत?

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एयरपोर्ट बनाना बड़ा महंगा काम है. इसके लिए ढेर सारी ज़मीन चाहिए. जहां पर विमानों के उड़ने उतरने के लिए रनवे बनाए जा सकें. फिर विमान खड़े करने के लिए हैंगर के लिए ज़मीन चाहिए.

मुसाफ़िरों के आने-जाने, ठहरने और सामान रखने के लिए जगह का इंतज़ाम करना होता है. इन सबके लिए ढेर सारी ज़मीन चाहिए. बनाने के लिए ख़ूब सारा पैसा चाहिए.

दुनिया भर में हवाई उड़ान के कारोबार में तेज़ी पचास और साठ के दशक में आई थी, जब आम लोगों की जेब में भी इतने पैसे थे कि वो विमानों से सफ़र कर सकें.

उस वक़्त भी विमानों का शोर बड़ा मसला था और ये आज भी बड़ी दिक़्क़त है. जब हवाई अड्डों पर उड़ान भरने वालों की भीड़ बढ़ी तो विमान बनाने वाली कंपनियों ने बड़े-बड़े विमान बनाने शुरू किए.

इनके ज़रिए सैकड़ों यात्रियों को आराम से एक जगह से दूसरे ठिकाने तक पहुंचाया जा सकता था. मगर विमानों से जो शोर होता था, उसे फिर भी दूर नहीं किया जा सका.

ऐसे में सवाल ये है कि आख़िर हेलिकॉप्टर एयरलाइन्स क्यों नहीं शुरू हुईं? हेलिकॉप्टर, विमानों से कम शोर मचाते हैं. कम जगह से उड़ान भर सकते हैं, बेहद कम जगह पर उन्हें उतारा भी जा सकता है. फिर भी हेलीपोर्ट और हेली लाइन्स की शुरुआत करने की नहीं सोची गई.

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ऐसा नहीं है कि हेलीपोर्ट और हेलिकॉप्टर एयरलाइन्स के बारे में किसी ने नहीं सोचा. मगर दिक़्क़त ये है कि हेलिकॉप्टर से बहुत कम लोगों को एक बार में हवाई सफ़र कराया जा सकता है.

अब इतना बड़ा हेलिकॉप्टर कैसे बने कि वो एक साथ बड़ी संख्या में मुसाफ़िरों को उड़ान पर ले जा सके. तकनीकी चुनौतियां, इस कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाने में आड़े आती हैं.

फिर भी कई बार इस सोच को हक़ीक़त बनाने की कोशिश हुई है. पचास के दशक में 'फेयरी रोटोडाइन' के नाम से एक एयरक्राफ़्ट बना था. जिसमें हेलिकॉप्टर और विमान की ख़ूबी का मेल कराने की कोशिश की गई थी.

इसके ऊपर एक हेलिकॉप्टर जैसा रोटर था और साथ ही दोनों तरफ़ विमान जैसे पंख भी थे. दोनों में इंजन लगे हुए थे. ये दोनों इंजन, ऊपर लगे रोटर के मददगार थे जो एयरक्राफ़्ट को बिना रनवे पर दौड़े उड़ने की ताक़त देते थे.

रोटोडाइन में एक साथ चालीस लोगों को उड़ाने का इंतज़ाम था. जिस वक़्त रोटोडाइन का डिज़ाइन तैयार हुआ, तमाम जेटलाइनर्स चलन में आ चुके थे.

एयरपोर्ट बनाने में जितनी जगह लग रही थी उस पर लोगों को ऐतराज़ होने लगा था. लेकिन रोटोडाइन के ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलने में कई तकनीकी चुनौतियां थीं.

रॉयल एरोनॉटिकल सोसाइटी के माइक ओ डोनोह्यू कहते हैं कि इसे बनाने वालों का इरादा इसे रोटर की मदद से उड़ने के लिए ऊपर उठाने का था. इसके बाद इसके साइड में लगे इंजनों से वो इसे रफ़्तार देना चाहते थे.

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रोटोडाइन का डिज़ाइन तैयार करने वाले चाहते थे कि आप शहर के बीचो-बीच से इस पर सवार हों और फिर अपने सफ़र पर निकल जाएं. मगर इसकी सबसे बड़ी दिक़्क़त थी इसके इंजन से होने वाला शोर.

माइक कहते हैं कि दो मील दूर खड़े होकर भी इसके शोर की वजह से बात करना मुश्किल था. अब इतना हंगामा बरपाने वाले एयरक्राफ़्ट का नाकाम होना तो तय ही था. ऐसा ही हुआ. रोटोडाइन का ख़्वाब सच होने से पहले ही चकनाचूर हो गया.

हालांकि इसकी नाकामी के बावजूद, हेलिकॉप्टर एयरलाइन का ख़्वाब देखने वालों के इरादों में कमी नहीं आई.

आज एक नई तकनीक की मदद से ऐसे हेलिकॉप्टर बनाने की कोशिश हो रही है जो विमान की तरह रफ़्तार से उड़ सकें. इस तकनीक का नाम है टिलट्रॉटर.

इसकी मदद से किसी हेलिकॉप्टर की साइड में पंख लगाए जाते हैं. फिर इनकी मदद से हेलिकॉप्टर को उसकी जगह से उड़ाया जाता है. आगे चलकर यही रोटर, घुमाकर पंख की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं.

लेकिन बड़ी दिक़्क़त ये है कि इससे ज़्यादा रफ़्तार नहीं हासिल की जा सकती है.

इस तकनीक की मदद से बोइंग ने V-22 नाम का हेलिकॉप्टर बनाया है. इसे अमरीकी नौसेना इस्तेमाल कर रही है. कभी-कभी अमरीकी राष्ट्रपति भी इसमें उड़ान भरते हैं.

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इटली की कंपनी 'अगस्ता वेस्टलैंड' ने भी इस तकनीक से नया हेलिकॉप्टरनुमा विमान बनाने का एलान किया है. कंपनी का इरादा इसकी मदद से बीस लोगों को एक साथ हवाई सफ़र कराने का है.

इसकी रफ़्तार तीन सौ मील प्रति घंटे या क़रीब पांच सौ किलोमीटर प्रति घंटे रहने की उम्मीद है. ये प्रोजेक्ट 2021 में पूरा होने की बात कही जा रही है. इसे रोटोडाइन एयरक्राफ़्ट की अगली पीढ़ी का एयरक्राफ़्ट बताया जा रहा है.

इसी तरह का एक और एयरक्राफ़्ट है 'करीम एरोट्रेन'. जानकार कहते हैं कि इसका डिज़ाइन वक़्त से काफ़ी आगे का है. इसका टिलट्रॉटर काफ़ी बड़ा है जिससे मुसाफ़िरों को विमान में बैठने जैसा तजुर्बा होगा.

इसके डिज़ाइनर हैं मशहूर एरोनॉटिकल इंजीनियर अब्राहम करीम. जिन्होंने अमरीका के मशहूर प्रीडेटर ड्रोन का डिज़ाइन तैयार किया था.

एरोट्रेन का मॉडल पहली बार 2001 में दुनिया के सामने आया था. तब से तकनीक ने काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. मगर अब तक एरोट्रेन का ख़्वाब अधूरा ही है. अगर ये सपना पूरा हो सका तो शायद दुनिया को पहला हेलिकॉप्टर एयरलाइनर मिल जाएगा.

ऐसे डिज़ाइन और एयरक्राफ़्ट विकसित करने में तकनीक तो आड़े आती ही है. वक़्त और पैसा भी बहुत लगता है. इतना पैसा ख़र्च करने के लिए कम ही लोग तैयार होते हैं. फिर इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आप ऐसा एयरक्राफ़्ट बना ही लेंगे जो होगा विमान जैसा, मगर उड़ान भरेगा हेलिकॉप्टर की तरह.

हालांकि इतनी चुनौतियों के बावजूद लोगों के हेलिकॉप्टर जैसे विमान बनाने के इरादे डिगे नहीं हैं.

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इटली के डिज़ाइनर विक्टर यूरिब, एयरबस के लिए एक ऐसे ही एयरक्राफ़्ट का डिज़ाइन तैयार कर रहे हैं. इसके इंजन ऊपर के बजाय नीचे की तरफ़ लगाए जाएंगे.

हालांकि माइक ओ डोनोह्यू कहते हैं कि अभी इतने ताक़तवर इंजन नहीं बने हैं जो किसी एयरक्राफ़्ट को नीचे से सीधे ऊपर उठा दें.

एयरबस की ही तरह बोइंग कंपनी भी अमरीकी सरकार के साथ मिलकर एक नया डिज़ाइन तैयार कर रही है. इसका नाम उन्होंने डिस्क रोटर रखा है.

ये किसी अंतरिक्षयान जैसा दिखता है. जिसके ऊपर की तरफ़ लगे रोटर को उड़नतश्तरी जैसी दिखने वाले चीज़ से ढंका गया है. इसके ब्लेड काफ़ी लंबे हैं और किसी हेलिकॉप्टर के पंख की ही तरह घूमते हैं.

इनके घूमने से ऊपर की डिस्क भी घूमती है. ये डिस्करोटरर किसी आम विमान की तरह ही उड़ता है. लैंडिंग के वक़्त ये फिर हेलिकॉप्टर का रूप धर लेता है.

ये दोनों ही नए डिज़ाइन बेहद ऊंचे दर्जे के हैं. अब देखना ये होगा कि क्या ये डिज़ाइन, सच का सामना कर पाएंगे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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