'दुश्मन भारत को दे दी अफ़ग़ानों ने सरज़मीन'

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अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगती सीमा पर पाकिस्तान की ओर से तोरख़म चौकी पर गेट बनाने से दोनों देशों के बीच पैदा हुए तनाव की पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में सबसे ज़्यादा चर्चा है.

'जंग' लिखता है कि पाकिस्तान ने साफ़ कर दिया है कि वो दोनों देशों के बीच आवाजाही को दस्तावेज़ी रूप देने लिए बॉर्डर मैनेजमेंट को लागू करेगा और इसके लिए न सिर्फ़ गेट बनाएगा, बल्कि वहां गार्ड भी बिठाएगा.

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान से लगने वाली 2,250 किलोमीटर लंबी सीमा पर सिर्फ़ एक नहीं, बल्कि तोरख़म जैसे चार गेट बनाए जाएंगे.

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अख़बार लिखता है कि अब तक दोनों देशों के बीच खुली सीमा की वजह से पाकिस्तान बेपनाह नुक़सान उठा चुका है और अब भी तीस लाख अफ़ग़ान शरणार्थी पाकिस्तान में मौजूद हैं, जिनसे देश पर आर्थिक और सामाजिक तौर पर बुरा असर पड़ रहा है.

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि अफ़ग़ानिस्तान को एतराज़ है कि पाकिस्तान ज़ीरो लाइन पर गेट नहीं बना सकता है, जबकि भारत के साथ गेट ज़ीरो लाइन पर ही है.

अख़बार ने अफ़ग़ान राजदूत की तरफ़ से दी गई इस धमकी का भी ज़िक्र किया है कि पाकिस्तान ने गेट बनाया तो उसे गंभीर नतीजे भुगतने होंगे.

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अख़बार लिखता है- 'क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा, अब अफ़ग़ानिस्तान भी अमरीका की तर्ज़ पर पाकिस्तान को धमकाने लगा है.'

'एक्सप्रेस' कहता है कि देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ये ज़रूरी हो गया है कि पाकिस्तानी सरहद पर प्रभावी निगरानी की व्यवस्था लागू हो.

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अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान का ये रुख़ बिल्कुल ठीक है कि दहशतगर्दी के ख़ात्मे के लिए बॉर्डर पर आवाजाही को रेग्युलेट किया जाए और तोरख़म में गेट बनाना इसी सिलसिले की कड़ी है.

अख़बार कहता है कि अफ़ग़ागिस्तान को ये समझना होगा कि अगर वो किसी और ताकत के हाथों में खेल कर पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते बिगाड़ता है तो इसका नुक़सान उसे भी उठाना पड़ेगा.

'औसाफ़' लिखता है कि 'पाकिस्तान ने हमेशा अफ़ग़ानिस्तान का साथ दिया है, लेकिन अमरीकियों के आने बाद अफ़ग़ानिस्तान ने अपनी सरज़मीन दुश्मन भारत को पेश कर दी है.'

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अख़बार लिखता है कि करज़ई से लेकर अशरफ़ ग़नी की सरकार तक अफ़ग़ान सरज़मीन से पाकिस्तान को दहशतगर्दी के सिवाय कुछ नहीं मिला.

वहीं 'दुनिया' ने अपने संपादकीय में सिंध असेंबली में हुई हाथापाई पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार लिखता है कि ये हालात तब पैदा हुए जब पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सदस्य शमीम मुमताज ने एमक्यूएम पार्टी के अल्पसंख्यक सदस्य दीवान चंद चावला की बात का जवाब देते हुए कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग वाले किस मुंह से बात कर रहे हैं.

अख़बार लिखता है कि सदन में पूरा ध्यान देश और समाज की स्थिति बेहतर करने के लिए लगाना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए कि वहां ताक़त दिखाई जाए.

'अख़बार-ए-मशरिक' ने ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में बारिश और तूफ़ान की वजह से कई लोगों की मौत का विषय उठाते हुए कहा है कि प्रांतीय सरकार के पास प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की कई योजना नहीं है.

रुख़ भारत का करें तो 'रोज़नामा खबरें' ने गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड पर 14 साल बाद आए अदालत के फ़ैसले पर संपादकीय लिखा है.

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Image caption गुलबर्ग हत्याकांड में 11 लोगों को उम्रक़ैद और 12 को सात-सात साल की सज़ा हुई है

अख़बार लिखता है कि इंसाफ़ की प्रक्रिया थका देने वाली प्रक्रिया है और इसमें इंसान अपना सब कुछ दांव पर लगा दे, फिर भी पक्का पता नहीं कि इंसाफ़ मिल पाएगा या नहीं.

संवदेशनशील मामलों में फ़ास्ट ट्रैक सुनवाई पर ज़ोर देते हुए अख़बार लिखता है कि नाइंसाफ़ी की कोख से हिंसा जन्म लेती है, इसलिए किसी भी समाज में अमन और शांति बनाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी है कि वक़्त पर इंसाफ़ मिले.

वहीं 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने गुजरात के दंगा पीड़ितों के लिए आवाज़ उठाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द होने पर लिखा है- तीस्ता का ट्रस्ट निशाने पर.

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अख़बार के मुताबिक़ सबरंग ट्रस्ट को इस पर हैरानी नहीं है क्योंकि संभावना थी कि उसके साथ ऐसा होगा.

अख़बार कहता है कि दंगा पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने के लिए 14 बरसों में तीस्ता ने जो कुछ किया वो कोई दूसरा नहीं कर सकता था और इसीलिए संकुचित नज़रिया रखने वाले और सांप्रदायिक लोग उनसे खार खाए बैठे थे.

अख़बार के मुताबिक तीस्ता इस मुद्दे को अदालत में ले जाएंगी और अब देखना है कि अदालत इस पर क्या फ़ैसला करती है.

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