एक थे ओबामा...

  • 7 फरवरी 2014
बराक ओबामा

बहुत पुरानी बात है. कम से कम लगता तो ऐसा ही है जैसे बहुत-बहुत पुरानी बात हो. सन था 2008.

अमरीकी राजनीति के आसमान में अचानक से एक सितारा चमकने लगा. चमक ऐसी कि कैलिफ़ोर्निया से क़ाहिरा तक, बॉस्टन से बीजिंग तक, ड्रॉइंग रूम और गलियों में, गांवों और शहरों में, संसद और कारख़ानों में लोग उसकी बातें करने लगे.

नाम था ओबामा. लेकिन वो नाम कुछ भी हो सकता था- उम्मीद, भरोसा, सिद्धांत, ईमान और शायद सत्य भी. राजनीति में ये शब्द मायने भी रख सकते हैं. वो एहसास ही कुछ अलग सा था.

वो कहानियां सुनाता था, लहरों के ख़िलाफ़ तैरने की बात करता था. चेहरे पर चमक थी, हेमलिन शहर के बांसुरीवादक की तरह हज़ारों की भीड़ को अपने पीछे खींचता और मंत्रमुग्ध लोग तैयार रहते उसके साथ कहीं भी जाने को.

लड़कियां उसे सेक्सी कहती थीं, बुद्धिजीवी उसे दूरदर्शी कहते थे, बच्चे अचानक से सुपरमैन और स्पाइडरमैन को छोड़कर ओबामा बनना चाहते थे. अमरीका ने जॉन एफ़ कैनेडी को देखा था, बिल क्लिंटन को देखा था लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं देखा था.

20 जनवरी 2009 को वाशिंगटन की एक कंपकपाती सर्द सुबह नेशनल मॉल पर हज़ारों की भीड़ में मैं भी गवाह था उन पलों का जब उस बांसुरीवादक ने वादा किया अमरीका से और दुनिया से एक नई शुरूआत का, एक नई यात्रा का.

दीवार पर टंगी तस्वीर

कल अचानक से यू-ट्यूब पर पांच साल पुराने ओबामा दिखे. किसी मनपसंद पुरानी फ़िल्म की तरह मैंने उनके कुछ भाषणों को सुना और लगा जैसे हॉलीवुड के किसी कैरेक्टर को देख रहा हूं जो ओबामा की भूमिका निभा रहा है.

जो ओबामा इन दिनों मुझे दिखते हैं वो तो पुराने ओबामा की दीवार पर टंगी पीली पड़ती हुई ब्लैक ऐंड व्हाइट तस्वीर की तरह नज़र आते हैं.

बालों में सफ़ेदी आ गई है, चेहरे की चमक गायब है, भाषण उबाऊ हो रहे हैं, ओबामा हमेशा थके-थके नज़र आते हैं. उनकी लोकप्रियता आधी रह गई है और हर नए सर्वे में नीचे ही जा रही है. बांसुरीवादक के पीछे चलने वाली भीड़ छंट सी गई है.

देखा जाए तो जो अमरीका ओबामा को मिला था, उसके मुक़ाबले आज दिन काफ़ी सुधर गए हैं. दो युद्ध चल रहे थे, आर्थिक मंदी थी, लाखों की नौकरियां छिन गई थीं, क़िस्त नहीं चुका पाने की वजह से लोगों के सिरों से छत हट गई थी.

लोग अमरीकी सुपरपावर के ख़त्म होने की बात कर रहे थे. चीन, भारत और रूस के प्रभुत्व वाली नई दुनिया की बात ज़ोर पकड़ रही थी.

सिर पर सेहरा नहीं

आज एक युद्ध ख़त्म हो चुका है और अमरीका दूसरे से भी अपनी फ़ौज वापस लाने का एलान कर चुका है. अमरीकी अर्थव्यवस्था सुधार पर है, नई नौकरियां पैदा हो रही हैं. अमरीका का दबदबा पहले जितना तो नहीं लेकिन अभी भी बरक़रार है.

तो फिर ओबामा के सिर पर कामयाबी का सेहरा क्यों नहीं?

यू ट्यूब के भाषणों को मैंने फिर से देखा और बात कुछ हद तक समझ में आई.

ओबामा ने जो कहानियां सुनानी शुरू की थीं, दुनिया ने बरसों से वो कहानियां नहीं सुनी थीं. लेकिन व्हाइट हाउस में घुसने के बाद वो कहानियां उन्होंने अधूरी छोड़ दी हैं. बॉलीवुड की फ़िल्मों की तरह पुरानी कहानियां ही फिर से रीसाईकिल होने लगीं.

चेहरे पर झुंझलाहट

ओबामा ने बंदूक़ ख़त्म करने की बात की थी, आज हर दूसरे दिन कोई सनकी स्कूली बच्चों को बंदूक़ का निशाना बना रहा होता है.

वॉल स्ट्रीट के जिन गुंडों को ख़त्म करने की बात कही थी उन्होंने, वही आज फिर से दुनिया से हफ़्ता वसूली कर रहे हैं.

अमीरी-ग़रीबी की खाई पहले से ज़्यादा बड़ी हो गई है. जिस दुनिया को उन्होंने अमरीकन ड्रीम में हिस्सा देने का वादा किया था, वो दुनिया आज भी अमरीकी आप्रवासन नियमों के दीवार से सिर टकरा कर ज़ख़्मी हो रही है.

नायकों और महानायकों की कहानियां ज़रूरी होती हैं क्योंकि वो नींव बनती हैं आने वाले कल की. और ज़रूरी होता है कि वो कहानियां पूरी की जाएं.

शायद अपनी कहानी अभी तक पूरी नहीं कह पाने की झुंझलाहट है उनके चेहरे पर. शायद बंटे हुए अमरीका को एक नहीं कर पाने की हताशा है उनके भाषणों में. शायद अपने सिद्धांतों से हटना उन्हें भी कचोटता है. शायद एक आम राजनेता जैसा बर्ताव उन्हें भी सालता है.

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