'मैं लड़का भी हूं, मैं लड़की भी हूं'

दस साल के लियो ने अपनी ज़्यादातर ज़िदगी एक लड़की के रूप में गुज़ारी है. लेकिन इस बार गर्मियों में वो अपनी इंद्रियों के बारे में खुलकर बोलने लगे.

उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ अजीब सा महसूस होता था.

माता-पिता की मदद के लिए किए गए एक शोध के बाद, उन्होंने तय कर लिया कि वो 'नॉन बाइनरी' हैं. यानी कि उनमें महिला और पुरुष दोनों के गुण हैं.

अब वे लड़कों जैसे कपड़े पहनने लगे और लड़के के नाम को अपना लिया.

जानते हैं लियो की कहानी ख़ुद उनकी ज़ुबानी...

मैं लड़का नहीं हूं.

पहले मुझे लगता है कि मैं लड़का हूं, क्योंकि मैं पूरी तरह से लड़की नहीं था.

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कई दिनों तक तो मैं खुद को लड़का जैसा जताने की कोशिश करता रहा. फिर लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं है.

उसके बाद हमने कुछ शोध किया. शोध में हमें 'जेंडर नॉन बाइनरी' शब्द मिला. ... और यह सच है, मैं ख़ुद ही ऐसा हूं.

मुझे नहीं याद कि किस उम्र में मुझे यह पता चला कि मैं अजीब महसूस कर रहा था.

मैंने इसके बारे में सबसे पहले अपने टीचर को बताया.

दरअसल मैं एकदम निराश हो चुका था. मैंने पूछा कि हम जो नाटक कर रहे हैं उसमें किसी भी लड़की को लड़के की भूमिका अदा करने की जिम्मेदारी क्यों नहीं मिली. ये तो सही नहीं है.

फिर मैंने टीचर को खींचा और बोला, "मैं लड़की नहीं हूं."

उन्हें मेरी बात से ऐसा नहीं लगा कि मैं झूठ बोल रहा था. फिर भी, क्योंकि ऐसा होना आम नहीं है.

इसलिए मुझे नहीं लगता कि वो पूरी तरह से समझ पाई होगी कि मुझे कैसा महसूस होता था.

मैंने यह बात मां को बताई. मुझे पता था कि वो इसमें मेरा पूरा साथ देंगी. मम्मी ने पूरी दिलचस्पी ली.

कुछ परिवारों में लोग इस बात पर सीधा हंसना शुरू कर देंगे या वो इस पर यकीन नहीं करेंगे.

इस लिहाज से मैं सच मैं बहुत तक़दीर वाला हूं कि मुझे समझदार माता-पिता मिले.

मेरे स्कूल में भी सभी बहुत अच्छे थे. जब मेरे टीचर ने क्लास के बाक़ी बच्चों को यह बात बताई, तो मेरे सभी दोस्तों ने कहा, "वाह, ये बात तो बहुत दिलचस्प है."

मेरे क्लास में किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. हम 10 लड़के और 9 लड़कियां थीं. हम बस साथ में खेलते-कूदते थे, हमें निजी बातों से बहुत मतलब नहीं होता था.

एक बार मैं और मेरी एक दोस्त, जो कि एक लड़की थी, रेत में खेल रहे थे.

उसने मुझसे पूछा, "तो तुम एक लड़के हो?"

नॉन बाइनरी लोगों को मर्द या औरत होने का एहसास नहीं होता है. वो दोनों की तरह महसूस कर सकते हैं या फिर दोनों के बीच का कुछ. उनके लिंग में भी समय के साथ बदलाव आ सकता है या फिर इस बदलाव का उसके महिला या मर्द होने से कोई संबंध नहीं भी हो सकता है.

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खैर...मैंने अपनी दोस्त को जवाब दिया, "नहीं, मैं लड़का या लड़की नहीं हूं. मैं नॉन बाइनरी हूं, इसलिए मैं दोनों के बीच में हूं."

उसने कहा, "ओह, तो तुम दोनों में से कुछ नहीं हो."

पर असल में, मैं ऐसा नहीं सोचता कि मैं दोनों में से कुछ भी नहीं हूं. बल्कि मैं सोचता हूं कि मैं दोनों ही हूं.

हक़ीकत में मैं लड़कों का टॉयलेट इस्तेमाल करना चाहता हूं, क्योंकि यह लड़कियों के टॉयलेट के मुक़ाबले ज़्यादा सुविधानजनक है. मुझे इसकी इजाज़त नहीं है. पर मुझे लगता है कि ऐसा होना चाहिए.

फिर भी मैं समझ सकता हूं. क्योंकि कई लड़कों को अपने टॉयलेट में किसी ऐसे को देखकर परेशानी हो सकती है, उनके मुताबिक़ जिसे मर्दों के शौचालय में नहीं होना चाहिए.

जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो इस पर सोचूंगा.

किसी एक शरीर में दो लिंग नहीं हो सकते. मैं चाहता हूं कि इसके लिए बीच का कोई रास्ता हो. जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मेरे लिए यह बता पाना मुश्किल होगा कि मैं एक लड़की नहीं हूं.

फिलहाल मुझे एक ब्रा पहनना पड़ती है. लेकिन अगर मैं एक स्पोर्ट्स शर्ट पहन लूं तो इससे बचा जा सकता है.

लोगों का ध्यान सबसे ज़्यादा स्तनों पर ही जाता है. जब लोग 'boy' और 'she' जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो मैं उन्हें ठीक करता हूं.

मैं कहता हूं, "सॉरी, मैं कोई लड़का या लड़की नहीं हूं."

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दाढ़ी रखने की बात मुझे पसंद आती है.

मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे, मर्द या औरत जैसे किसी लिंग के साथ जोड़ें.

लेकिन मैं जानता हूं कि वो ऐसा करेंगे. इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है.

हालांकि अब मैं पहले से ज़्यादा खुश हूं. मैं बहुत ज़्यादा मज़े में रहता हूं और बिना किसी शर्म के लोगों से इस पर बात कर सकता हूं.

मुझे लोगों को समझाने की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं बस इतना चाहता हूं कि लोग जाहिलों की तरह बर्ताव न करें.

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