मीटिंग में टोक कर, कैसे रखें अपनी बात

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जब भी कुछ लोगों के बीच किसी मसले पर चर्चा चलती है, तो वहां मौजूद हर शख़्स अपनी राय रखना चाहता है. इसी तरह ऑफ़िस में अगर कोई कॉन्फ्रेंस चल रही हो तो वहां मौजूद सभी से उम्मीद की जाती है कि वो अपनी राय रखें.

लेकिन होता ये है कि जब कोई अपनी बात कहना शुरू करता है, तो वह तब तक चुप ही नहीं होता जब तक कि सबको अपनी बात पर राज़ी ना कर ले. अपनी बात के पक्ष में वो दलील पर दलील दिए जाता है और वहां मौजूद दूसरे लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे होते हैं.

ऑफिस मीटिंग और काफ्रेंस आदि में वक़्त की कमी होती है. इसलिए कम समय में ही सभी को अपनी राय रखनी होती है. अब ऐसे में अगर कोई बोलता ही जा रहा है तो उसे रोका कैसे जाए?

क्योंकि इसके लिए ना तो अलग से कोई भाषा है और ना ही कोई ऐसा इशारा आज तक ईजाद हुआ है जिससे बोलने वाले को चुप कराया जा सके.

इसका एक ही तरीक़ा है. और वह तरीका है सामने वाले को टोकना. लेकिन तमीज़ के दायरे में रहकर किसी को कैसे रोका जाए?

इसके बहुत से तरीक़े हैं.

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सिल्वेन बैरेट, जर्मनी के फ़्रैंकफर्ट में एक असेट मैनेजमेंट कंपनी में काम करते है. उनका कहना है अगर आप किसी को भी बोलते वक़्त टोकते हैं, तो, सबसे पहले ये जान लीजिए कि आप किस देश और संस्कृति के शख़्स को टोक रहे हैं. क्योंकि हर समाज और देश का अपना अलग मिज़ाज होता है.

इस मुश्किल से पार पाने के लिए उन्होंने अलग तरीक़ा खोज निकाला है. बैरेट कहते हैं जर्मन लोगों के मुक़ाबले फ़्रेंच लोगों के साथ टोका-टाकी करना आसान होता है.

वे कहते हैं, "फ़्रेच लोग एक ही वक़्त पर एक साथ बोलते हैं. वहां एक दूसरे को आसानी से टोका जा सकता है. जबकि जर्मन लोगों के साथ ऐसा नहीं. आपको उनकी बात मुकम्मल हका इंतज़ार करना ही पड़ेगा. उनकी सभ्यता में किसी को बीच में टोकना बदतमीज़ी माना जाता है. इसलिए आपको विनम्र होना ही पड़ता है".

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ब्रिटिश लेखक रिची फ्राइमेन कहते हैं कि आपके पास किसी को टोकने की कोई ठोस वजह होनी चाहिए, ताकि लोग आपको सुनें और फ़ैसला करने में आपकी राय कारगर साबित हो.

साथ ही रिची यह सलाह भी देते हैं कि आपको पता होना चाहिए कि किस संस्कृति के लोग आपस में एक दूसरे को कैसे टोकते हैं. अगर आपको इसका अंदाज़ा नहीं भी है, तो आप किसी एक्सपर्ट की राय भी ले सकते हैं.

एक बार जब आपने किसी को टोककर बोलने से रोक दिया तो फिर मैदान आपके हवाले होता है. वहां आपको ये साबित करना ही होता है कि आपकी बात में ज़्यादा वज़न है, इसलिए आपको सुना जाए. तभी आपकी बात का, आपके टोकने का मक़सद सही साबित होगा.

अगर आपने किसी को टोककर अपनी बात कही और वो किसी काम की भी नहीं थी तो फिर हो सकता है आपको शर्मिंदगी का सामना करना पड़े.

आज नई तकनीक का ज़माना है. वक़्त तेज़ी से दौड़ रहा है. कारोबार की दुनिया भी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है.

ऐसे में बड़े पैमाने पर वीडियो और टेली-कॉन्फ्रेंसिंग होती है. इसमें अलग-अलग देशों के लोग शामिल होते हैं. इसमें किसी को टोकना ज़्यादा मुश्किल होता है.

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वहां आपके पास मौक़ा नहीं होता कि आप अपनी बात कहने के लिए हाथ उठा लें या कोई इशारा ही कर दें कि आप कुछ कहना चाहते हैं.

ऐसे में ना ही बोलने वाले को ये अंदाज़ा हो पाता है कि दूसरे को भी कुछ कहना है या वो उसे टोकना चाहते हैं. बात अगर बड़े ग्रुप में हो रही हो तो मामला और पेचीदा हो जाता है. फिर तो जब तक बोलने वाला चुप ना हो जाए तब तक आपको मौक़ा मिल ही नहीं सकता.

फ्राइमेन कहते हैं मीटिंग में अपनी बात रखने का सबसे अच्छा मौक़ा तब होता है, जब सभी अपनी अपनी बात कर रहे हों, हंसी मज़ाक़ चल रहा हो. या तब जब मुकम्मल खामोशी छा गई हो.

साथ ही ये सलाह भी दी जाती है कि हर बार अपनी बात कहने के लिए एक ही तरह के शब्द या तरीक़े का इस्तेमाल ना किया जाए. जैसे बहुत से लोग अपनी बात कहने से पहले अपना गला साफ़ करते हैं या हमेशा कहते हैं कि 'मैं एक बात कहना चाहती हूं'.

इससे लोग आपके टोकने से पहले ही समझ जाते हैं कि अब आप बोलना चाहते हैं. कई बार ऐसी बातों का मज़ाक़ भी बनाया जाता है. इसीलिए इससे बचना चाहिए.

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अगर आपको लगता है आप काफ़ी देर से बोल रहे हैं. आपकी बातों में लोग दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं, तो माहौल को हल्का करें.

इससे सुनने वालों का मूड थोड़ा सा बदलेगा. या आप कह सकते हैं कि 'मैं जानता हूं, मेरी बात काफ़ी लंबी हो रही है. लेकिन, अगर आप सबकी इजाज़त हो तो मैं इसे जारी रखूं', वगैरह...

इसी तरह अगर आपको लग रहा है कि सामने वाले की बात उस वक़्त के लिए मुफ़ीद नहीं है, तो आप उससे दरख्वास्त कर सकते हैं कि आपकी राय पर हम बाद में विचार कर लेंगे. पहले उन मुद्दों पर बात कर लें जो ज़्यादा अहमियत रखते हैं.

इन सारी बातों का एक ही मक़सद है, अपनी बात रखना आपका हक़ है. लेकिन दूसरे को भी उसकी बात कहना का मौक़ा दिया जाए.

इसके लिए ज़रूरी है कि आप अगर उसे बोलने से रोकना चाहते हैं, तो इस बात का ख़्याल ज़रूर रखें कि उसे ठेस न पहुंचे, बुरा न लगे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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