विद्रोही लड़ाका बन गया चित्रकार

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दिन में विद्रोही लड़ाका और रात में कलाकार. सीरिया के इस युवक की सड़क पर की गई कलाकारी देश के गृहयुद्ध के तीखे विरोधाभासों को उभारती है.

सीरिया की राजधानी दमिश्क के एक उपनगर में लागातार बमबारी होती रहती है, पानी, बिजली, खाने पीने की तमाम चीजों की किल्लत आम है. ऐसे में बमबारी से तबाह हो चुके मकानों की दीवारों पर बनाई गई ये तस्वीरें वातावरण से मेल नहीं खाताी हैं.

यह तस्वीर दिखाती है कि नरमुंडों के ढेर पर खड़ी एक छोटी लड़की दीवार पर एक शब्द लिख रही है-होप यानी आशा.

इसके चित्रकार अबू मलिक अल-शमी पर दुनिया का ध्यान गया और उनकी तुलना बैंकसी से की जाने लगी.

वे भी बैंकसी की तरह ही राजनीतिक रूप से जागरूक स्ट्रीट कलाकार हैं. उनकी पेंटिग यकायक दीवारों पर दिखने लगीं. पर इन चित्रों का विषय सीरिया के गृह युद्ध से लिया गया है.

साल 2014 से 2016 के बीच दमिश्क से 10 किलोमीटर दूर दराया में तमाम जगह ये भित्ति चित्र उभर आए हैं.

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Image caption यह भित्ति चित्र एक स्कूल में बनाया गया. छात्र लिख रहा है, "हम मजाक में कहा करते थे, हे भगवान! इस स्कूल को बर्बाद कर दो......और उसने कर दिया."
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Image caption कैप्शन में लिखा हुआ है, "हैप्पी मदर्स डे". अरब जगत मे यह 21 मार्च को मनाया जाता है.

चित्रकार अल शमी अब 22 साल के हो चुके हैं.

पर 2011 में लड़ाई शुरू होने के पहले वे दमिश्क के हाई स्कूल में पढ़ते थे. वे सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने लगे और अपने हुनर का इस्तेमाल करते हुए क्रांतिकारी विचारों को फैलाने लगे.

वे 2013 में अपनी पेंसिल और स्केचबुक के साथ दराया चले गए और फ्री सीरिया आर्मी में शामिल हो गए.

उन्हें पहले ही दिन बंदूक चलाने को दिया गया, दूसरे दिन उन्हें लड़ाई की अगली पंक्ति में भेज दिया गया.

लेकिन साल 2014 में उनकी मुलाक़ात मज़्द से हुई, जिनका उपनाम 'दराया की आंख' था. उन्होंने स्ट्रीट आर्ट पर काम करने के लिए अल शमी की हौसला आफ़ज़ाई की.

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Image caption अबू मलिक अल-शमी के पहले भित्ति चित्र में एक लड़की एक सैनिक को प्रेम के बारे में बता रही है
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Image caption इस चित्र में अरबी में लिखा हुआ है, "इस साल हम ईद किस तरह मना रहे हैं?"

अल शमी यह मानते हैं कि घर की छत पर चित्र बनाना ख़तरनाक था, क्योंकि बम गिरते रहते थे, गोलियां चलती रहती थीं.

उन्होंने कहा, "सबसे अच्छा समय सूर्यास्त या सूर्योदय का होता था, जब शहर में पूरी शांति रहती थी. कभी कभी हम यह काम रात को भी करते थे. मैं चांदनी रात को दीवारों पर चित्र उकेरता था, कभी कभी मोबाइल फ़ोन की रोशनी का सहारा भी लेता था."

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Image caption दीवार पर लिखा है, "हमारे गुलाब उनके लिए हैं, जिन्होंने उसे अपने ख़ून से सींचा है."
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Image caption इस चित्र में सीरिया संघर्ष के बदलते हुए स्वरूप को दिखाया गया है

ऐसा समय भी आया जब शमी और उनके साथियों के पास ग्रैफ़िटी बनाने के लिए रंग नहीं था. उनके पास सिर्फ़ लाल, काला, हरा, पीला और भूरा रंग था.

वे साल 2015 में ज़ख़्मी हो गए. दराया में पिछले दो साल में उन्होंने 30 से ज़्यादा भित्ति चित्र बनाए.

उनके दोस्त मज़्द 2016 की जनवरी में मार गए.

सरकारी सेना ने अगस्त में शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया. शमी और दूसरे सैकड़ों लोग भाग कर विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इडलिब चले गए.

भित्ति चित्र, ख़ास कर ग्रैफ़िटी, काफ़ी कम समय तक ही रह पाता है. यह शहर सरकारी सेना के नियंत्रण में है. ऐसे में शमी के चित्र बेहद ख़तरनाक स्थिति में हैं.

इसलिए शहर छोड़ने के पहले अल शमी ने अपने ग्रैफ़िटी के फ़ोटो ले लिए. वे अब इडलिब में दीवारों पर चित्र बना रहे हैं.

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Image caption इस चित्र में X से रूसी और सीरियाई युद्धक विमानों और O से अलेप्पो में बच्चों के जलाए टायर दिखाते हैं.

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