40 साल पुरानी फ़िल्म ने दिखाई थी आज की तस्वीर

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आज सोशल मीडिया का ज़माना है और न्यूज़ चैनल्स के बीच टीआरपी जुटाने की होड़ मची हुई है.

ख़बरों को लेकर चल रहे इस शोर-शराबे में अक्सर ख़बरों को सनसनीख़ेज़ बनाकर पेश किया जाता है, ताकि उसे देखने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा दर्शक जुटाए जा सकें.

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फिर न्यूज़ चैनल्स पर ख़बरों को तमाम तमाशों के ज़रिए पेश किया जाता है. कई बार तो ख़बरों को परोसने का तरीक़ा ऐसा हो जाता है कि उसे आराम से नौटंकी करार दिया जा सकता है.

इसी तरह सोशल मीडिया पर भी ख़बरों की सच्चाई जाने बग़ैर उन पर हंगामा मचा दिया जाता है. तलवारें खिंच जाती हैं और लोग टाइमलाइन पर ही एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं.

लेकिन क्या आज से चालीस साल पहले इस मंज़र का तसव्वुर किया जा सकता था? आप कहेंगे कि तब न तो सोशल मीडिया था और न ही न्यूज़ चैनल्स, तो ऐसा ख़याल भला किसी को कैसे आता?

जानकर ताज्जुब होगा कि एक फ़िल्म ऐसी बनी थी, जिसने चालीस बरस पहले ही आज के ख़बरिया चैनल्स का मंज़र पेश किया था.

उस दूरंदेशी भरी हॉलीवुड फ़िल्म का नाम था, 'नेटवर्क'. चालीस साल पहले भारत में सिर्फ़ एक सरकारी टीवी चैनल हुआ करता था दूरदर्शन. अमरीका समेत तमाम पश्चिमी देशों में कई प्राइवेट टीवी चैनल आ गए थे. हालांकि वो भी आज की गलाकाट प्रतियोगिता जैसे तमाशे नहीं दिखाते थे.

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उसी दौर में पैडी चेवस्की की लिखी कहानी पर आधारित फ़िल्म 'नेटवर्क' रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म का निर्देशन सिडनी लुमेट ने किया था.

पैडी और सिडनी, दोनों ने ही अमरीका में पचास और साठ के दशक में टेलिविज़न की दुनिया में ख़ूब नाम कमाया था और सत्तर का दशक आते आते दोनों को ये यक़ीन हो चला था कि तब से टीवी के धंधे की क्वालिटी गिर रही है.

'नेटवर्क' फ़िल्म जैसे उसी पतन का विरोध नज़र आती थी. ये एक ब्लैक कॉमेडी फ़िल्म थी, जिसे ख़ूब पसंद किया गया.

इस फ़िल्म ने 1976 में 4 ऑस्कर पुरस्कार जीते थे. दो और वर्गों के लिए भी ये फ़िल्म नॉमिनेट हुई थी. फ़िल्म को आला दर्जे का क़रार दिया गया था. यहां तक कि फ़िल्म आलोचकों ने भी इसकी जमकर तारीफ़ की थी.

2006 में अमरीका के राइटर्स गिल्ड ने पैडी चेवस्की की कहानी को अमरीका की दस सबसे अच्छी कहानियों की लिस्ट में शुमार किया था. पिछले साल बीबीसी कल्चर के क्रिटिक पोल में 'नेटवर्क' 100 बेहतरीन अमरीकी फ़िल्मों में 73वें नंबर पर रही थी.

1976 में जब ये फ़िल्म आई थी तो अपने ज़माने से बहुत आगे के दौर की तस्वीर इसमें दिखी थी. फ़िल्म की कहानी एक टीवी चैनल पर आधारित थी, जो ज़्यादा से ज़्यादा दर्शक जुटाने के चक्कर में तमाम तजुर्बे कर रहा था.

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ये तजुर्बे चौंकाने वाले भी थे. डराने वाले भी थे और कई बार बेहूदगी की हदों को पार करने वाले भी. मगर जो सबसे डराने वाली बात है वो ये कि चालीस साल पहले टीवी चैनल में जिस तरह की चीज़ें होती दिखाई गई थीं, वो आज बेहद आम हैं.

उस दौर की ये चौंकाने वाली कहानी, आज आम चलन में आ गई मालूम होती है.

फ़िल्म की शुरुआत कमेंट्री करते हुए टीवी के एंकर हावर्ड बील से होती है. ये किरदार पीटर फिंच ने निभाया था, जिनकी फ़िल्म रिलीज़ होने के कुछ ही दिनों बाद मौत हो गई थी. उन्हें मरणोपरांत ऑस्कर दिया गया था.

हावर्ड न्यूयॉर्क स्थित एक चैनल का एंकर है, जिसका नाम है यूबीएस है. उसे दो हफ्ते का नोटिस दिया गया है कि वो अपना काम सुधारे वरना उसे नौकरी से दफ़ा कर दिया जाएगा.

जिसके बाद हावर्ड ऑन एयर घोषणा करता है कि वो अपने आखिरी कार्यक्रम में लाइव ख़ुदकुशी करेगा क्योंकि उसके शो की रेटिंग लगातार गिरती जा रही है. जब हावर्ड ये एलान कर रहा होता है तो शो के प्रोड्यूसर आपस में बातें करने में मगन होते हैं.

हालांकि हावर्ड अपने दावे से तुरंत ही मुकर जाता है. बाद में हावर्ड कहता है कि वो ख़ुद को नहीं मारेगा मगर वो अपने दिल की बात ज़रूर कहेगा.

टीवी चैनल के दर्शकों को उसकी बातों पर सदमा लगने के बजाय मज़ा आता है.

उसके एलान के बाद यूबीएस चैनल वाले उसे नौकरी से नहीं हटाते क्योंकि अब उसके शो के नंबर आने लगे हैं. अब चैनल वाले चाहते हैं कि हावर्ड ऑन एयर जो भी उसके दिल में आता है वही बोले.

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टीवी चैनल का मालिक मैक्स शूमाकर इस बात से हैरान होता है कि होवार्ड के नर्वस ब्रेकडाउन का फ़ायदा टीवी चैनल की रेटिंग्स बढ़ाने के लिए किया जा रहा है. लेकिन महत्वाकांक्षी प्रोड्यूसर डायना क्रिस्टियनसेन तो इससे इतनी उत्साहित हैं कि वो उस शो का पूरा मेकओवर कर देती है.

वो शो का नया फॉरमैट बनाती हैं ताकि और दर्शक जुटाए जा सके. डायना का किरदार अभिनेत्री फाय डनअवे ने निभाया था.

न्यूज़ शो को रातों रात करेंट अफेयर्स और वेराइटी शो में तब्दील कर दिया जाता है. जिसमें सिबिल नाम के भविष्यवाणी करने वाले को भी बैठाया जाने लगता है. सिबिल अगले दिन की बड़ी ख़बरों की भविष्यवाणी करता है. शो में गॉसिप करने वाली एक महिला किरदार को भी शामिल कर लिया जाता है. उसका नाम होता है मिस माता हारी.

शो की प्रोड्यूसर डायना कहती हैं कि हावर्ड की हालत भले ही ठीक न हो, मगर वो आम लोगों का ग़ुस्सा बख़ूबी ज़ाहिर करता है. हावर्ड का तकियाकलाम, ''आई एम मैड एज़ हेल, एंड आई एम नॉट गोइंग टू टेक दिस एनी मोर'' आज अमरीकी फ़िल्म इंस्टीट्यूट के बेस्ट फ़िल्म डायलॉग में 19वें नंबर पर दर्ज है.

साल 2000 में रॉजर एबर्ट ने शिकागो सन टाइम्स में लिखा कि 25 साल बाद देखने पर यूं लगता है कि पैडी और सिडनी मानो आने वाले वक्त के न्यूज़ टीवी चैनल्स की भविष्यवाणी कर रहे थे.

क्या किसी को यक़ीन था कि आने वाले वक़्त में टीवी एक तमाशे में तब्दील हो जाएगा और आज चालीस साल बाद फ़िल्म 'नेटवर्क' को देखें तो सवाल उठता है कि क्या पैडी चेवस्की ने आज के दौर की पॉडकास्टिंग या डोनल्ड ट्रम्प जैसे बेहूदा बयान देने वाले नेताओं को संजय की दृष्टि से देख लिया था. ऐसे नेता अपनी बेबाक बयानबाज़ी को लोगों के ग़ुस्से को ज़ाहिर करने का तरीक़ा बताते हैं. वो 'नेटवर्क' फ़िल्म के एंकर हावर्ड जैसे ही तो मालूम होते हैं.

इस फ़िल्म ने कई और ऐसी तस्वीरें पेश की थीं जो आज के दौर में सच होती दिखती हैं. जैसे कि एंकर हावर्ड अपने शो में एलान करते हैं कि अमरीका में कारोबार सिर्फ़ अमरीकियों को करना चाहिए.

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तो उन्हें टीवी चैनल के बोर्ड की बैठक में तलब किया जाता. फिर उसे समझाने की कोशिश होती है कि उसका बयान पूंजीवाद के ख़िलाफ़ है. उसे बताया जाता है कि वो एक बूढ़ा होता शख्स है जो सिर्फ़ देश और नागरिकों के नज़रिए से देख रहा है. जबकि पूंजीवाद की नज़र में न कोई देश है और न ही किसी देश के नागरिक.

पूंजीवाद के मुताबिक़ तो केवल बड़ी-बड़ी कंपनिया हैं. आज आप देखिए कि आईबीएम, एटी ऐंड टी, ड्यूपोन्ट, डाउ, यूनियन कार्बाइड और एक्सन. ये सिर्फ़ कंपनियां नहीं, ये एक राष्ट्र जैसे हैं. आज पूरी दुनिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बंट चुकी है.

आज दुनिया कारोबार के क़ानून के हिसाब से चल रही है. ये दुखद सच है.

लेकिन 'नेटवर्क' फ़िल्म की सबसे सटीक भविष्यवाणी, डायना के एक और शो का आइडिया है. जिसका नाम डायना ने 'माओ त्से तुंग ऑवर' सोच रखा है.

इसमें वो एक आपराधिक संगठन एकुमेनिकल लिबरेशन आर्मी के अपराध की लाइव तस्वीरें दिखाती है. ज़रा सोचिए आज के तमाम रियालिटी शोज़ में यही तो हो रहा है. सच्ची तस्वीरों का सीधा प्रसारण.

डायना को ये ख़याल उस वक़्त आता है जब वो लिबरेशन आर्मी के एक बैंक लूटने की वारदात की फुटेज देखती है. वो सवाल पूछती है कि क्या ये तस्वीरें उस वक़्त ली गईं जब वो बैंक लूट रहे थे?

आज कोई भी आतंकी संगठन अपनी करतूतों को बिना टीवी कैमरों के अंजाम ही नहीं देना चाहता. आज हर टीवी चैनल और मीडिया ऐसी तस्वीरों को फ़ौरन से पेशतर दिखाना चाहता है.

'नेटवर्क' फ़िल्म में दिखाया गया है कि डायना एक ऐसी ख़ूबसूरत शिकारी महिला है जिसके सीने में दिल नहीं. वो बेहद महत्वाकांक्षी है. वो किसी भी क़ीमत पर आगे बढ़ना चाहती है. तरक्क़ी करना चाहती है. कामयाबी हासिल करना चाहती है.

आज टीवी की दुनिया में आपको ऐसे तमाम किरदार मिल जाएंगे. यानी 'नेटवर्क' फ़िल्म में जिस तरह की टीवी प्रोड्यूसर को देखकर लोग चौंके थे, आज वही रोल मॉ़डल है. जो अपने एंकर की ख़राब दिमाग़ी हालत को भी रेटिंग के लिए इस्तेमाल करने से नहीं चूकती और जब उससे भी रेटिंग आनी बंद हो जाती है तो वो अपने एंकर हावर्ड के क़त्ल की साज़िश रचती है.

फाय डनअवे ने डायना का किरदार बख़ूबी निभाया था. वो एक मज़बूत लड़की है. अपने इरादों को लेकर उसका दिल साफ़ है. फिर चाहे उसकी पेशेवर महत्वाकांक्षाएं हों या मर्दों से उसके रिश्ते. वो सत्तर के दशक की बंदिशों से आज़ाद महिला है.

आज चालीस साल बाद 'नेटवर्क' फ़िल्म को देखकर किसी का भी दिल घबराने लगेगा. लेकिन टीवी और मीडिया में हम आज जो दौर देख रहे हैं, उनकी इस फ़िल्म ने चार दशक पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी.

शायद फ़िल्म के कहानीकार और निर्देशक ने फ़िल्म बनाते वक़्त ये न सोचा हो, मगर आज उनकी हर बात, हर किरदार सच्चाई में तब्दील हो गए हैं. भले ही ये अफ़सोस की बात हो, मगर है ये तल्ख़ सच्चाई.

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