जब दौलतमंद लंबी उम्र और तेज़ दिमाग ख़रीदेंगे..

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आज की दुनिया तकनीक के सुपर हाइवे पर दौड़ रही है. इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से लेकर बायो-टेक्नोलॉजी तक के पहिए इसे रफ़्तार दे रहे हैं. नित नए तजुर्बे किए जा रहे हैं.

मशीनें, इंसानों से ज़्यादा अक़्लमंद होती जा रही हैं. बायो-इंजीनियरिंग के ज़रिए इंसानों पर मशीनों जैसे प्रयोग किए जा रहे हैं, ताकि इंसान की अक़्ल को, उसके शरीर को और बेहतर बनाया जा सके.

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तकनीक के एक्सप्रेस वे पर दौड़ती दुनिया आख़िर किस तरफ़ जा रही है? इसका भविष्य क्या है?

हम अक्सर सुनते हैं कि तकनीक हमारी ज़िंदगी को बेहतर बना रही, चुनौतियां आसान कर रही है. बीमारी का इलाज हो, या चांद-तारों को छूने की तमन्ना, इंसान की हर मुश्किल का हल तकनीक से चुटकियों में तलाशा जा रहा है. हर तमन्ना को तकनीक से हासिल करने की कोशिश की जा रही है.

कैसी होगी दुनिया?

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अगर ऐसा ही होता रहा, तो आगे चलकर क्या होगा? दुनिया कैसी होगी? इंसान कैसे होंगे? तकनीक पर हमारी बढ़ती निर्भरता दुनिया को और बेहतर बनाएगी या फिर कुछ गड़बड़ भी हो सकती है?

जो पॉज़िटिव सोच रखने वाले हैं, तकनीक पर आंख मूंदकर यक़ीन करते हैं, वो कहते हैं कि दुनिया आगे चलकर आज से बेहतर ही होगी. इंसान की ज़िंदगी और आसान होगी.

मगर, ये ज़रूरी तो नहीं. हो सकता है कि आगे चलकर इंसान उस तकनीक, उस मशीन का ग़ुलाम बन जाए, जो ख़ुद इंसान ने ही ईजाद की! ये भी हो सकता है कि तकनीक इंसानियत की तबाही का सबब बन जाए.

बीबीसी की रेडियो सीरीज़ 'द इन्क्वायरी' के एक एपिसोड में इसराइल के इतिहासकार युवल नोआ हरारी से बात कर इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई. युवल हरारी, येरूशलम की हीब्रू यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाते हैं. उनकी दो क़िताबों, 'सैपियंसः ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमनकाइंड' और 'होमो डीअसः ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टुमारोट' की ख़ूब चर्चा हो रही है.

तकनीक और मानवता के भविष्य के बारे में युवल हरारी से बातचीत आप यहां सुन सकते हैं.

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तकनीक दूसरे दर्ज़े के नागरिक बनाएगी?

युवल हरारी ऐसे इतिहासकार हैं जो इतिहास के सबसे बड़े सबक़, 'जो इतिहास से नहीं सीखते, वो इतिहास को दोहराने के लिए शापित होते हैं' पर दिल से यक़ीन करते हैं.

युवल हरारी, इतिहास के आईने से इंसानियत के भविष्य में झांकने की कोशिश करते हैं. उनकी क़िताब होमो डिअस इसी कोशिश का नतीजा है.

युवल का कहना है कि हम इतिहास इसलिए तो पढ़ते हैं कि अतीत की ग़लतियों से सीखें, अपने आज को दुरुस्त करें, ताकि हमारा भविष्य बेहतर हो.

वे मानते हैं कि तकनीक आगे चल न सिर्फ़ दुनिया को बदल देगी, बल्कि मानव जाति को भी बदल डालेगी. वो कहते हैं कि तकनीक के कारण इंसानों के बीच असमानता बढ़ेगी. कुछ लोग तकनीक की मदद से बहुत आगे निकल जाएंगे, तो कुछ बहुत पीछे रह जाएंगे, दूसरे दर्जे के इंसान बन जाएंगे.

युवल कहते हैं कि आज तकनीक की तरक़्क़ी और इससे इंसानों की आसान होती ज़िंदगी को देखकर सबको हरा-हरा ही लग रहा है. मगर उन्हें तकनीक पर आधारित इस दुनिया के लिए आने वाले वक़्त में तमाम नई चुनौतियां खड़ी होती दिखाई दे रही हैं.

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कहीं भस्मासुर न साबित हो जाए

युवल हरारी के मुताबिक़, आगे चलकर इंसानों के बीच ग़ैरबराबरी बढ़ेगी. कुछ इंसानों का दर्जा बाक़ियों के मुक़ाबले बहुत ऊंचा हो जाएगा.

ये भी हो सकता है कि तकनीक आगे चलकर इंसानियत के लिए भस्मासुर साबित हो जाए और उसे ख़त्म कर दे.

वैसे मानवता का इतिहास ग़ैरबराबरी का ही रहा है. ये स्थिति आज से हज़ारों साल पहले भी थी, आज भी है और शायद आगे भी रहेगी.

युवल हरारी इसकी मिसाल के तौर पर रूस के सनगीर में मिले अवशेषों का ज़िक्र करते हैं. वो बताते हैं कि पुरातत्वविदों को सनगीर में तीस हज़ार साल पुरानी इंसानी बस्ती के अवशेष मिले.

वहां पचास साल के एक आदमी के कंकाल के साथ हाथी दांत की मालाएं, छोटी मूर्तियां और दूसरे गहने मिले. वहीं पास ही में कुछ लोगों के पास कुछ नहीं मिला. यानी तीस हज़ार साल पहले के उस दौर में भी इंसानों के बीच अमीर और ग़रीब की खाई थी.

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युवल मानते हैं कि इंसान की तरक़्क़ी के साथ-साथ समाज में असमानता बढ़ती गई. जब इंसान ने शिकार करने के बजाय खेती करनी शुरू की, तो हालात और बिगड़ गए. कुछ ज़मींदारों, राजाओं और पुजारियों ने खेती की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया.

बाक़ी लोग उनके मज़दूर रह गए. उस ज़मीन पर पैदा हुए अनाज पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का हक़ होता था. बाक़ी लोग राजाओं, ज़मींदारों और पुजारियों की दया पर निर्भर थे.

बराबरी का क्या होगा?

लेकिन उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में औद्योगिक क्रांति और साम्राज्यवाद के विस्तार ने इंसानों के बीच बराबरी का माहौल बनाया. नए कारखानों में काम करने के लिए लोग चाहिए थे. जंग लड़ने के लिए भी भारी तादाद में इंसानों की ज़रूरत थी. इस ज़रूरत ने समाज में बराबरी लाने में मदद की.

नए हुक्मरानों को आम जनता की ज़रूरत हर तरह से थी. इसलिए हुकूमतों ने आम लोगों की ज़िंदगी पर ध्यान देना शुरू किया. उनकी पढ़ाई के लिए स्कूल खोले. सेहत का ख़याल रखने के लिए अस्पताल बनवाए. शहरों में सड़कें, इमारतें, सीवेज सिस्टम बनवाए गए. टीकाकरण के अभियान चलाए गए.

आख़िर लोग सेहतमंद नहीं होंगे, तो कारखानों में काम कैसे करेंगे? अपने देश की तरफ़ से जंग कैसे लड़ेंगे? आम जनता को भी अपनी अहमियत का एहसास हुआ और उसने हुकूमत से अधिकार मांगे. उसे वो अधिकार मिले भी.

युवल हरारी के मुताबिक़ औद्योगिक क्रांति से समाज में बराबरी के सिद्धांत को बल मिला.

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लेकिन एक बार फिर आम जनता की हालत कमज़ोर हो रही है. उसके हाथ से अधिकार निकलते जा रहे हैं. समाज में एक बार फिर ग़ैरबराबरी बढ़ रही है. अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई गहरी और चौड़ी होती जा रही है.

हमारे प्रधानमंत्री मोदी हों या और दिग्गज, सभी ये कहते हैं कि तकनीक के इस्तेमाल से समाज में बराबरी आएगी. सबके हाथ में अपना भविष्य होगा.

मगर युवल हरारी मानते हैं कि तकनीक से तो इंसानों के बीच खाई गहरी और चौड़ी होगी.

वो इसकी मिसाल के तौर पर हमारी ज़िंदगी में रोबोट और बनावटी अक़्लमंदी के बढ़ते दखल को गिनाते हैं.

इंसानों पर मशीनें भारी

आज ऐसी मशीनें बनाई जा रही हैं, जो इंसानों की जगह ले रही हैं. कारखानों में रोबोट काम कर रहे हैं. बैंकों में, शेयर बाज़ार में कंप्यूटर इंसानों का काम कर रहे हैं. जंगें लड़ने के लिए भी इंसानों की ज़रूरत कम से कमतर होती जा रही है. आज दुश्मन के ठिकानों पर बम बरसाने के लिए पायलट का विमान उड़ाकर वहां जाना ज़रूरी नहीं. ये काम ड्रोन आसानी से कर सकता है.

युवल हरारी कहते हैं कि जैसे-जैसे तकनीक बेहतर होगी, बहुत से ऐसे काम जो आज इंसान करते हैं, वो मशीनें करेंगी. कारखानों में मशीनों को ही रखा जाएगा. कारें चलाने के लिए ड्राइवर की ज़रूरत नहीं रह जाएगी. और जिन लोगों की ज़रूरत नहीं होगी, उनकी सरकार क्यों सुनेगी.

कारखाने के मालिक को कामगारों की हड़ताल का ख़ौफ़ नहीं रहेगा. अस्पतालों में डॉक्टरों की ज़रूरत नहीं होगी. बैंकों में कर्मचारियों की जगह ऑटोमेटिक मशीनें काम करेंगी. बैंक के कर्मचारी हड़ताल करेंगे, तो वो करते रहें, उनकी कोई सुनवाई नहीं होगी. क्योंकि हड़ताल के बावजूद बैंक, मशीनों के ज़रिए काम निपटा सकेंगे. जंग लड़ने के लिए मोर्चे पर रोबोट भेजे जाएंगे.

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सोचिए आज से तीस साल बाद अगर तकनीक ने इतनी तरक़्क़ी कर ली तो क्या होगा?

युवल हरारी कहते हैं कि, ऐसे में इंसानों का ऐसा वर्ग तैयार होगा, जिसकी समाज को, देश को ज़रूरत ही नहीं होगी. उनकी किसी को फ़िक्र नहीं होगी. उनकी आवाज़ कोई सुनेगा नहीं. न उनकी पढ़ाई की किसी को फ़िक्र होगी, न उनकी सेहत और न ही उनके बेहतर रहन-सहन को लेकर कोई सोचेगा. क्योंकि तकनीक की दुनिया में ये इंसान ही ग़ैरज़रूरी हो जाएंगे.

ख़तरा कौन?

युवल हरारी कहते हैं कि सिर्फ़ मशीनें ही इंसानियत के लिए ख़तरा नहीं. ख़ुद इंसान ही इंसान के लिए ख़तरा बन जाएंगे.

युवाल इसके लिए एक बार फिर हमें इतिहास के झरोखे से देखने को कहते हैं. वो कहते हैं कि मौत हर इंसान को बराबरी पर ला खड़ी करती है.

पहले के दौर में बीमारियों का बोलबाला था. तो आम इंसान हो या कोई राजा, ज़मींदार, किसी की भी मौत पीलिया, मलेरिया, गैंगरीन या दूसरी बीमारियों से हो सकती थी. यानी मौत सबको बराबर कर देती थी.

मगर अब हालात बदल गए हैं. जिसके पास पैसे हैं, वो बेहतर इलाज हासिल कर सकता है. कैंसर से लड़ सकता है. तकनीक की मदद से इंसान अपनी ज़िंदगी को न सिर्फ़ बेहतर बना रहा है, बल्कि उम्र भी बढ़ा रहा है.

एक सर्वे के मुताबिक़, अमरीका में जो सबसे ज़्यादा रईस एक फ़ीसद आबादी है, वो बाक़ी लोगों से पंद्रह साल ज़्यादा लंबी उम्र जीते हैं. ये बहुत बड़ा फ़ासला है.

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युवल के मुताबिक बायोइंजीनियरिंग के ज़रिए इंसान के अंगों में हेर-फेर किया जा रहा है. नक़ली हाथ-पैर ही नहीं, दिल, गुर्दे और लिवर भी लैब में तैयार हो रहे हैं. यानी वो दिन दूर नहीं जब प्रयोगशाला में इंसान की उम्र बढ़ाने का फॉर्मूला तैयार किया जा सकेगा.

युवल हरारी के मुताबिक़ अगर एक बार इंसान अपनी उम्र सवा सौ या डेढ़ सौ साल तक बढ़ा सका, तो आगे चलकर वो इसे दस लाख साल तक भी बढ़ा सकेगा.

इससे समाज में असमानता और बढ़ेगी.

ग़ैरबराबरी बढ़ेगी?

क्योंकि उम्र बढ़ाने और सेहतमंद रहने का फॉर्मूला कोई सस्ता तो होगा नहीं. हर इंसान को ये हासिल नहीं होगा. सिर्फ़ वही लोग इस तकनीक से उम्र बढ़ा सकेंगे, जिनके पास पैसे होंगे. तकनीक की वजह से ये लोग सुपरमैन, सुपरह्यूमन या परामानव बन जाएंगे. उनका दिमाग़ भी बाक़ी इंसानों से बेहतर होगा.

आगे चलकर दिमाग़ को कंप्यूटर से जोड़ा जा सकता है. या ये भी हो सकता है कि कुछ इंसानों के दिमाग़ एक-दूसरे से जोड़कर दिमाग़ का एक नेटवर्क तैयार कर लिया जाए.

वैसे तो ये सारी चीज़ें इंसानियत का भला कर सकती हैं.

लेकिन चुनौती तब होगी, जब ये तकनीक सिर्फ़ मुट्ठी भर लोगों को हासिल होगी. या कुछ देशों के पास ही ये तकनीक होगी. तब वो तरक़्क़ी की रेस में बाक़ी इंसानों और देशों से आगे निकल जाएंगे.

अगर ऐसा हुआ तो युवल हरारी के मुताबिक़, इंसानियत दो हिस्सों में बंट जाएगी.

एक तो वो जो तकनीकी रूप से सुपरह्यूमन होंगे. दूसरे वो जो कमज़ोर और दूसरे दर्जे के इंसान होंगे. जिनके पास बेहतर संसाधन होंगे, वो इसकी मदद से बाक़ी दुनिया को अपना ग़ुलाम बना लेंगे.

वैसे साम्राज्यवाद के दौर में भी हम ऐसी ग़ैरबराबरी देख चुके हैं. मगर उस वक़्त के सामंत या राजा असल में बाक़ी इंसानों से बेहतर नहीं थे.

पर भविष्य में तो कुछ इंसान ही तरक़्क़ी करके दूसरों से बेहतर हो जाएंगे. अगर ऐसा हुआ, तो ये इंसानियत के लिए बेहद ख़तरनाक होगा.

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मशीनें इंसानों को कंट्रोल करेंगी

वैसे, डर इस बात का भी है कि एक दौर ऐसा आए कि तकनीक ही इंसान की माई-बाप बन जाए. आज मशीनें ऐसे-ऐसे काम कर रही हैं, जो इंसान के बस की बात नहीं.

बैंकों में कंप्यूटर लाखों-करोड़ों खातों को मैनेज कर रहे हैं. शेयर बाज़ार मशीनों की वजह से चल रहे हैं. रोबोट, कारखानों को चला रहे हैं.

तो क्या ऐसा दौर भी आ सकता है, जब मशीनें, इंसानों को कंट्रोल करें?

युवल हरारी मानते हैं कि ये तो बहुत दूर की कौड़ी है. हॉलीवुड की मैट्रिक्स जैसी फ़िल्में ऐसे मंज़र पेश कर चुकी हैं. मगर हक़ीक़त में ऐसा होना मुमकिन नहीं लगता. मान लें कि मशीनें ताक़तवर हो जाएंगी तो भी वो इंसानों का क्या करेंगी. क्या उन्हें खाएंगी?

शायद ऐसा न हो.

मगर मशीनें और तकनीक जिस तरह से इंसानों पर हावी हो रही हैं, उससे इंसानियत के लिए आगे का दौर बेहद बुरा हो सकता है. इंसानियत के ख़ात्मे का ख़तरा भी मंडरा रहा है.

युवल हरारी कहते हैं कि वक़्त हमारे चेत जाने का है. अभी से ही ज़रूरी क़दम उठाने का है, ताकि भविष्य में ऐसा न हो.

मूल अंग्रेज़ी भाषा में 'द इन्क्वायरी' कार्यक्रम को सुनने के लिए क्लिक करें.

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