क्या हमें शव जलाने-दफ़नाने बंद कर देने चाहिए?

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किसी का गुज़र जाना जज़्बाती तौर पर उन लोगों के लिए बेहद तकलीफ़देह होता है, जिनका वो क़रीबी होता है.

तमाम यादें ज़हन में ताज़ा हो जाती हैं. साथ गुज़ारे लम्हे याद आते हैं. फिर दुनिया छोड़कर जा चुके शख़्स को आख़िरी विदाई दी जाती है.

दुनिया भर में अंतिम संस्कार के कई तरीक़े अपनाए जाते हैं. कहीं दफ़न किया जाता है. तो कहीं पर जलाया जाता है. पारसियों में तो शव को ऊंची जगह पर ले जाकर छोड़ दिया जाता है, ताकि उसे दूसरे जीव खा सकें.

पारसी मानते हैं कि आत्मा के शरीर छोड़ने के बाद शरीर का ऐसा इस्तेमाल होना चाहिए, जो क़ुदरत के काम आ सके. इसीलिए वो शव को यूं ही छोड़ देते हैं, ताकि परिंदे उसे खाकर पेट भर सकें.

अंतिम संस्कार वो मौक़ा होता है, जिसमें इंसान आख़िरी बार क़ुदरत से कुछ लेता है. दफ़न होने के लिए दो गज़ ज़मीन, लकड़ी का ताबूत, कफ़न के लिए कपड़ा या जलाने के लिए लकड़ी या कोई दूसरा ईंधन. लोग अपने धर्म या इलाक़े की परंपरा के मुताबिक़ अंतिम संस्कार करते हैं.

प्रकृति पर बढ़ रहा है बोझ

दुनिया में जितनी तेज़ी से आबादी बढ़ रही है, उतनी ही तेज़ी से क़ुदरत पर अंतिम संस्कार का बोझ भी बढ़ रहा है. पर्यावरण के लिए, ये बेहद नुक़सानदेह और ख़र्चीली प्रक्रिया बनती जा रही है. मगर ये ऐसी ज़रूरत है जिससे बचा भी नहीं जा सकता.

दुनिया भर में रोज़ाना क़रीब डेढ़ लाख लोग मरते हैं. इन्हें दफ़नाने, या जलाने या किसी और तरीक़े से अंतिम संस्कार की ज़रूरत होती है. इस वक़्त दुनिया की आबादी क़रीब 7.5 अरब है. इक्कीसवीं सदी के आख़िर तक इंसानों की आबादी 11 अरब होने की उम्मीद है. यानी लोगों के मरने की तादाद भी बढ़ेगी और उनके अंतिम संस्कार की ज़रूरत भी.

कई देशों में दफ़न करने के लिए जगह नहीं बची है. मसलन ब्रिटेन के बारे में कहा जा रहा है कि अगले बीस सालों में यहां के आधे क़ब्रिस्तानों में जगह नहीं बचेगी. लंदन में तो पुरानी क़ब्रों को खोदकर पुरानी लाशों को और गहरे दफ़न किया जा रहा है ताकि नए शवों को दफ़नाया जा सके.

दफ़न करने के लिए ज़रूरी ज़मीन घटती जा रही है. फिर क़ब्रिस्तानों का रख-रखाव भी बड़ा मसला है. धरती की आबो-हवा को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है.

अब जैसे अमरीका को ही लीजिए. यहां किसी ताबूत को दफ़न करने से पहले कंक्रीट की क़ब्र बनाई जाती है. अमरीका में लोगों को दफ़नाने में हर साल 16 लाख टन कंक्रीट और 14 हज़ार टन स्टील का इस्तेमाल होता है.

जलाना बेहतर तरीका नहीं

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वैसे जलाकर अंतिम संस्कार भी पर्यावरण के लिहाज़ से कोई बहुत अच्छा तरीक़ा नहीं. एक शव को जलाने में जितना ईंधन इस्तेमाल होता है, उससे सर्दियों में एक घर को हफ़्ते भर तक गर्म रखा जा सकता है.

अंतिम संस्कार, हमारे पर्यावरण पर भारी बोझ बनते जा रहे हैं. नीदरलैंड की रिसर्चर एलिज़ाबेथ कीज़र ने इस बारे में दो रिसर्च किए हैं. इनकी रिपोर्ट साल 2011 और 2014 में छपी थी. उन्होंने दफ़न करने और जलाकर अंतिम संस्कार से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को 18 पैमानों पर कसकर देखा.

इसमें शव को जलाने की प्रक्रिया पर्यावरण के लिए सबसे नुक़सानदेह दिखी. लेकिन ख़ुद एलिज़ाबेथ के मुताबिक़ दफ़न करने से पर्यावरण को ज़्यादा और गहरा नुक़सान होता है.

एलिज़ाबेथ के रिसर्च के मुताबिक़ अपनी पूरी ज़िंदगी में एक इंसान औसतन क़ुदरत पर जितना बोझ डालता है, अंतिम संस्कार तो उसका महज़ हज़ारवां हिस्सा है. लेकिन अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया क़ुदरत पर बहुत भारी पड़ती है. लोग फूल तोड़कर ले जाते हैं. सफर करते हैं, जिसमें ईंधन जलता है और पर्यावरण को नुक़सान होता है.

आख़िर जाते-जाते क़ुदरत को इतनी तकलीफ़ देने से बचा जा सकता है क्या?

अंतिम संस्कार का नया तरीका

अमरीका और ब्रिटेन में इन दिनों अंतिम संस्कार का एक नया तरीक़ा चलन में आ रहा है. इसे 'ग्रीन फ्यूनरल' या इको-फ्रैंडली अंतिम संस्कार कहा जा रहा है.

एक मशीन ईजाद की गई है, जो देखने में बैंक के लॉकर जैसी दिखती है. इसमें रखकर शव को पानी और केमिकल की मदद से गलाया जाता है. इसे 'अल्कलाइन हाइड्रोलिसिस' कहते हैं. अंतिम संस्कार की इस प्रक्रिया के बाद सिर्फ़ हड्डियां बच जाती हैं.

अमरीका के मिनेसोटा राज्य के क़स्बे स्टिलवाटर में एक अंतिम संस्कार केंद्र है. इसका नाम है ब्रैडशॉ सेलेब्रेशन ऑफ़ लाइफ़ सेंटर. यहां पर गलाकर अंतिम संस्कार करने वाली मशीन लगी है. ये मशीन दुनिया भर में लगी ऐसी 14 मशीनों में से एक है.

इस मशीन को लगाने में ब्रैडशॉ ने क़रीब 7.5 लाख डॉलर या क़रीब 5 अरब रुपए ख़र्च किए हैं. ये कंपनी चलाने वाले जैसन ब्रैडशॉ कहते हैं कि वो इससे कम ख़र्च में भी ये मशीन लगा सकते थे.

लेकिन उन्होंने ज़्यादा पैसे ख़र्च करके इसे भव्य तरीक़े से लगाया. ताकि इसे देखने वाले, इसके बारे में जानने वाले, या फिर इसमें अपने परिजनों को अंतिम विदाई देने वाले इसे देखकर इसकी भव्यता से प्रभावित हों.

केमिकल से गलाकर अंतिम संस्कार करने वाली ये मशीन 6 फुट ऊंची, 4 फुट चौड़ी और 10 फुट गहरी है. इसका दरवाज़ा किसी पनडुब्बी में लगे हैच जैसा है.

इस मशीन में शव को रखकर फिर बाहर कंप्यूटर के ज़रिए इसे चलाया जाता है.

मशीन, शव को गलाने की प्रक्रिया में कई दौर से गुज़रती है. पहले मशीन में पानी भरा जाता है. फिर इसे गर्म किया जाता है और फिर इसमें केमिकल मिलाया जाता है. सारी प्रक्रिया ऑटोमैटिक तरीक़े से होती है. मशीन, लाश का वज़न करके फिर उसी ज़रूरत के हिसाब से पानी इस्तेमाल करती है.

पूरी प्रक्रिया में 90 मिनट लगते हैं. इसके बाद मशीन इतने ही वक़्त में ठंडी होती है. और जब इसे खोला जाता है, तो जिस ट्रे में शव को रखकर मशीन बंद की गई थी, उसमें सिर्फ़ हड्डियां बिखरी दिखती हैं.

पूरा शव गलकर पानी के साथ बाहर निकल चुका होता है. देखने में ये चाय या बीयर जैसा लगता है. इससे कोई नुक़सान भी नहीं होता. बल्कि कई लोग तो अपने बाग़ीचों में इसका छिड़काव करते हैं, क्योंकि ये पेड़-पौधों के लिए बहुत फ़ायदेमंद होता है.

शवों को गलाने की ये प्रक्रिया दफन होने के बाद शवों के साथ होने वाले केमिकल रिएक्शन जैसा ही है. बस दफन हुए शरीर को गलने में बरसों लगते हैं. ब्रैडशॉ सेंटर में लगी मशीन में ये काम 90 मिनट में हो जाता है.

ब्रैडशॉ सेलेब्रेशन ऑफ़ लाइफ़ सेंटर में जहां ये मशीन लगाई गई है, वो किसी ड्राईक्लीनिंग होम जैसा दिखता है. वैसी ही बू यहां से आती महसूस होती है.

ब्रैडशॉ सेंटर में बची हुई हड्डियों को सुखाकर इसका चूरा बनाकर गुज़र चुके शख़्स के परिजनों को सौंपा जाता है.

कम नुकसानदेह तरीका

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पर्यावरण के लिहाज़ से ये अंतिम संस्कार का सबसे कम नुक़सानदेह तरीक़ा है. इसमें शव जलाने से पैदा होने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड के सातवें हिस्से तक ही CO2 निकलती है.

ख़र्च के लिहाज़ से भी ये बेहद सस्ता तरीक़ा है. जहां यूरोप में एक शव को दफ़न करने में क़रीब 64 यूरो ख़र्च होते हैं. वहीं जलाकर अंतिम संस्कार करने में 48 यूरो. लेकिन अगर शव को गलाकर अंतिम संस्कार किया जाए, तो इसका ख़र्च क़रीब ढाई यूरो ही पड़ेगा.

शवों को गलाने वाली इस मशीन को ब्रिटेन की कंपनी रेज़ोमेशन लिमिटेड ने बनाया है. अब तक दुनिया भर में ऐसी 14 मशीनें लग चुकी हैं. जल्द ही ऐसी एक मशीन ब्रिटेन के बर्मिंघम में लगने वाली है.

रेज़ोमेशन कंपनी की स्थापना सैंडी सुलिवन ने की थी. 2001 में मैड काऊ डिज़ीज़ और बीएसडब्ल्यू जैसी बीमारियों की वजह से ब्रिटेन में बड़ी तादाद में गायों को मारकर जलाया गया था.

इन जानवरों को जलाने की तस्वीरों से बड़ा हंगामा खड़ा हो गया था. इससे पर्यावरण को भारी नुक़सान का अंदेशा जताया गया था. इससे बीमारी फैलने का भी डर जताया गया था.

उस वक़्त सैंडी सुलिवन WR2 नाम की कंपनी में काम कर रहे थे. इस कंपनी ने केमिकल से शवों को गलाने का पेटेंट ले रखा था. इस तकनीक से कंपनी, लैब में इस्तेमाल हुए जानवरों के शव गलाती थी. इस प्रक्रिया को अल्कलाइन हाइड्रोलिसिस कहा जाता है.

वैसे इसमें इंसानों के अंतिम संस्कार का ख़्याल मशहूर मेयो क्लिनिक के निदेशक डीन फ़िशर को आया था. उन्होंने ऐसी पहली मशीन फ्लोरिडा में देखी थी. लेकिन उन्हें लगा कि मशीन की बनावट में बदलाव की ज़रूरत है.

उस वक़्त एक मशीन में एक साथ कई शवों को गलाया जा सकता था. मगर डीन फ़िशर को लगा कि ये अंतिम संस्कार करने का सही तरीक़ा नहीं होगा. उन्होंने मशीन में कुछ बदलाव करने का सुझाव दिया.

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सैंडी सुलिवन की कंपनी WR2 2006 में बंद हो गई. जिसके बाद उन्होंने अपनी अलग कंपनी खोलकर, शवों को गलाने वाली मशीन बनाने के आइडिया पर काम शुरू किया.

उन्होंने काफ़ी मशक़्क़त करके वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से आख़िर में वो मशीन तैयार कर ही ली, जिसे आज ब्रैडशॉ सेंटर में लगाया गया है. सैंडी बताते हैं कि इसके लिए उन्हें कई पापड़ बेलने पड़े.

सैंडी कहते हैं कि जिस तरह उन्नीसवीं सदी के आख़िर में कुछ लोग शव जलाकर अंतिम संस्कार करने को लेकर लड़े थे. उसी तरह उन्हें इस मशीन को इस्तेमाल करने के लिए लोगों को राज़ी करने की लड़ाई लड़नी पड़ी.

ब्रिटेन में 1879 से पहले शव दफ़न ही किए जाते थे. उस साल वोकिंग क़स्बे में कुछ लोगों ने क्रीमेशन सोसाइटी बनाई और शवों को जलाकर अंतिम संस्कार शुरू किया. बहुत से लोगों ने ऐतराज़ जताया. मामला सरकार से होते हुए संसद तक पहुंचा. सरकार ने कहा कि जब तक हम इस बारे में क़ानून नहीं बना लेते, तब तक शव नहीं जलाए जाएं.

मगर एक पादरी ने इस पाबंदी के बावजूद अपने बेटे का शव जलाकर अंतिम संस्कार किया. विलियम प्राइस नाम के इस पादरी को पकड़कर कोर्ट में पेश किया गया.

वहां प्राइस ने कहा कि इस वक़्त ऐसा कोई क़ानून नहीं जो उसे उसके बेटे को जलाकर अंतिम विदाई देने से रोके. अदालत ने भी माना कि ऐसा कोई क़ानून नहीं. इसके बाद से ही ब्रिटेन समेत कई देशों में जलाकर अंतिम संस्कार किया जाने लगा.

साठ का दशक आते-आते ब्रिटेन में जितने लोग दफ़नाए जा रहे थे, उससे कहीं ज़्यादा जलाए जा रहे थे. अमरीका ने अंतिम संस्कार के इस तरीक़े को देर से अपनाया. मगर आज वहां भी जलाकर अंतिम संस्कार ज़्यादा होता है. लोग अपने क़रीबियों को दफ़न करने का विकल्प कम चुनते हैं.

सैंडी कहते हैं आज 'अल्कलाइन हाइड्रोलिसिस' यानी शवों को गलाकर अंतिम संस्कार को लेकर यही हालात हैं. सैंडी चाहते हैं कि सरकार इस बारे में क़ानून बना दे. ताकि वो क़ानून के दायरे में रहकर कारोबार कर सकें.

फिलहाल ब्रिटिश सरकार ने सैंडी सुलिवन को सैंडवेल नाम के क़स्बे में अपनी रेज़ोमेशन मशीन लगाने की इजाज़त दे दी है. अमरीका और कनाडा में तो ऐसी मशीनें पहले से ही काम कर रही हैं. इस मशीन को लगाने की क़ीमत, शवों को जलाने का इंतज़ाम करने के के मुक़ाबले काफ़ी कम है.

हालांकि कई लोग मानते हैं कि ये मशीन कारोबार के लिहाज़ से बहुत फ़ायदेमंद नहीं. ब्रिटेन के वोकिंग क़स्बे में 'क्रीमेशन सेंटर' चलाने वाले हार्वे थॉमस पूछते हैं कि इसमें नया क्या है? वो कहते हैं, 'हम शवों को ठिकाने लगाने की एक प्रक्रिया छोड़कर दूसरी ही तो अपना रहे हैं'. हार्वे कहते हैं कि शव जलाने में जहां एक घंटे लगते हैं. वहीं शव को रेज़ोमेशन की मशीन में गलाने में तीन से चार घंटे लगते हैं. ऐसे में ये मशीन लगाकर आप कम अंतिम संस्कार कर पाएंगे. इससे मुनाफ़ा कम होगा.

वैसे ब्रिटेन में जहां इस बारे में बहस ही चल रही है. वहीं कनाडा और अमरीका में शवों को गलाने वाली मशीन का चलन बढ़ता जा रहा है. 14 अमरीकी राज्यों ने शव गलाने की प्रक्रिया को क़ानूनी मंज़ूरी दे दी है. कनाडा के तीन सूबों में भी इन्हें चलाने की इजाज़त मिल गई है.

वैसे ये क़ानूनी मंज़ूरी हासिल करना आसान नहीं रहा. अंतिम संस्कार के नियम-क़ायदे वही लोग बनाते हैं, जो इसके कारोबार से जुड़े होते हैं. वो अपने धंधे पर कोई असर नहीं पड़ने देना चाहते. इसीलिए 'ग्रीन फ्यूनरल' या इको-फ्रैंडली अंतिम संस्कार को अभी कई अमरीकी राज्यों में मंज़ूरी मिलनी बाक़ी है.

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इस मशीन के विरोधी लोग शव गलाने के बाद निकले पानी को सीवेज में मिलाने पर सबसे ज़्यादा ऐतराज़ जताते हैं. जबकि इसमें न तो इंसान के टिश्यू होते हैं और न ही डीएनए. जबकि जलाने के बाद शव से पारा निकलता है, जो क़ुदरत के लिए काफ़ी नुक़सानदेह हो सकता है.

शवों को गलाने या इको-फ्रैंडली अंतिम संस्कार का कैथोलिक समुदाय में कड़ा विरोध हो रहा है. हालांकि कई पादरी और धर्म गुरू ऐसे हैं, जो इसकी वक़ालत करते हैं.

असल में लोग कैसे अंतिम संस्कार करें, ये इस बात पर निर्भर करता है कि शव को लोग किस नज़रिए से देखते हैं. कई लोगों के लिए मुर्दा शरीर बेहद पवित्र होता है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए.

'अल्कलाइन हाइड्रोलिसिस' को लेकिन जब न्यूयॉर्क में बहस छिड़ी थी, तो कुछ लोगों ने 1973 की हॉलीवुड फ़िल्म सॉयलेंट ग्रीन के पोस्टर निकालकर प्रचारित करने शुरू कर दिए. इस फ़िल्म में दिखाया गया था कि अमरीका में शवों को गलाकर उनसे हाई एनर्जी से भरपूर बिस्कुट बनाए जाने लगे हैं.

वहीं ग्रीन-फ़्यूनर के समर्थक वो लोग हैं जो क़ुदरत के साथ छेड़खानी के विरोधी हैं. जिन्हें पर्यावरण की फ़िक्र है.

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बहुत से अंतिम संस्कार केंद्र इसके बारे में खुलकर बात नहीं करते. उन्हें इस प्रक्रिया के विरोध का डर है. हालांकि कुछ लोग तो हमेशा ही एक पहल का विरोध करते आए हैं. लेकिन अगर इसे बायो-क्रीमेशन, या ग्रीन क्रीमेशन कहकर प्रचारित किया जाए, तो बहुत से लोग ऐसे होंगे, जो अपने परिजनों के शव गलाकर उनका अंतिम संस्कार करना चाहेंगे.

मिनेसोटा के स्टिलवाटर कस्बे के ब्रैडशॉ सेलेब्रेशन ऑफ़ लाइफ़ सेंटर की शुरुआत जिम ब्रैडशॉ ने की थी. 73 बरस के जिम रिटायर हो चुके हैं. कारोबार आज उनके बेटे जैसन देखते हैं.

जिम कहते हैं कि पिछले पचास सालों में उन्होंने बहुत से बदलाव देखे हैं. हर बदलाव का विरोध हुआ है. जिम उम्मीद जताते हैं कि लोग आगे चलकर शवों को गलाकर अंतिम संस्कार करने के तरीक़े को अपना लेंगे.

हालांकि ख़ुद जिम ने अब तक अपने अंतिम संस्कार का तरीक़ा तय नहीं किया है. वो मज़ाक़ में कहते हैं कि ब्रैडशॉ सेंटर में एक ताबूत पड़ा है, जिसे आजकल कोई नहीं पूछता. तो, वो सोच रहे हैं कि वो अपने आप को दफ़न करने का फ़ैसला करके जाएं. ताकि इस ताबूत का इस्तेमाल हो जाए.

वैसे जिम ब्रैडशॉ को जलाकर अंतिम संस्कार पसंद नहीं. उन्हें तो लगता है कि उन्हें बस कफ़न में लपेटकर मिट्टी में दफ़न कर दिया जाए, तो बेहतर रहेगा.

कैफ़ी आज़मी साहब ने सही ही कहा है,

इंसां की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं...दो गज़ ज़मीन भी चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद!

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