ज़मीन कम है, आबादी बढ़ रही है: कहां रहेंगे लोग?

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दुनिया की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. लेकिन धरती पर ज़मीन तो बढ़ नहीं रही. ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर आबादी ऐसे ही बढ़ती रही, तो लोग रहेंगे कहां? उनके खाने के लिए अनाज कहां उगेगा? और अगर जंगल साफ़ करके रिहाइशी इमारतें बनाई जाती रहेंगी, तो, जो प्रदूषण इंसान पैदा कर रहा है, उसे सोखने के लिए ये क़ुदरती सिंक यानी पेड़ कहां लगाए जाएंगे?

ये वो बड़े सवाल हैं, जिनका सामना इक्कीसवीं सदी में इंसान को करना पड़ रहा है. वक़्त कम है. इंसान को इन सवालों के जवाब जल्द से जल्द तलाशने हैं. इससे पहले कि बात हाथ से निकल जाए, हमें वैकल्पिक इंतज़ाम करने होंगे. वरना दुनिया के कई इलाक़ों का हाल बेहद बुरा होगा.

बढ़ती आबादी से क्या चुनौतियां खड़ी होती हैं, ये देखना हो तो भारत के पड़ोसी देश मालदीव चले जाएं. राजधानी मालदीव को आसमान से देखें तो यूं लगता है कि बहुमंज़िला इमारतों वाला कोई शहर समंदर में तैर रहा है. चारों तरफ़ से समुद्र से घिरे इस शहर में अब इमारतें बनाने के लिए ज़मीन नहीं बची है. लिहाज़ा अब उसे आसमान का रुख़ करना पड़ रहा है.

माले की हालत ख़राब

पहले जहां माले में दो या तीन मंज़िला इमारतें ही दिखाई देती हैं. आज यहां आठ से पच्चीस मंज़िल ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं. फिर भी हाल बुरा है. हालत ये है कि सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए रास्ता इतना संकरा है कि एक बार में उनसे एक ही इंसान गुज़र सकता है. कई सड़कों के किनारे तो पैदल चलने वालों के लिए जगह तक नही छोड़ी गई है. तेज़ी से बढ़ती आबादी का नतीजा ये है कि माले में कई बार एक स्टूडियो अपार्टमेंट में चालीस लोग तक रहते हैं. माले शहर 5.7 वर्ग किलोमीटर मीटर में फैला है. 2014 में इतने छोटे से शहर में क़रीब एक लाख साठ हज़ार लोग रह रहे थे.

हम मालदीव का तसव्वुर समंदर से घिरे, क़ुदरती ख़ूबसूरती से लबरेज़ जज़ीरे के तौर पर करते हैं. मगर माले को देखने के बाद ये जहन्नुम जैसा लगता है. शहर के डिप्टी मेयर शमाऊ शरीफ़ कहते हैं कि हालात इतने ख़राब हैं कि शहर से निकले कचरे से एक इतना ढेर जमा हो गया है कि एक द्वीप ही बन गया है.

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Image caption माले में कचरे का ढेर

इतनी छोटी से जगह में इतने लोगों को बसाना बहुत बड़ी चुनौती है. इतनी कम जगह में रहने की वजह से शहर में अपराध और ड्रग की चुनौतियां पैदा हो गई हैं. माले में अक्सर पानी की किल्लत हो जाती है. हर नागरिक के लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाएं और तालीम के ठीक-ठाक इंतज़ाम तक नहीं हैं.

माले, इस बात की मिसाल है कि बढ़ती आबादी किस तरह से नई-नई चुनौतियां खड़ी कर रही है. दुनिया की आबादी हर साल क़रीब सवा आठ करोड़ की दर से बढ़ रही है. आज की तारीख़ में धरती पर 7.6 अरब लोग आबाद हैं. अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि 2050 तक धरती पर 9.8 अरब लोग रह रहे होंगे. इस सदी के आख़िर तक ये आंकड़ा 11 अरब के पार जाने का अंदाज़ा लगाया जा रहा है.

'13.4 अरब हेक्टेयर ज़मीन'

हर इंसान को रहने के लिए जगह चाहिए होगी. उसे काम चाहिए होगा. खाना-पानी, बिजली-पानी की ज़रूरत भी उसे होगी.

फिर हर इंसान को सफ़र करने के लिए सड़कें, खेलने-कूदने के लिए पार्क चाहिए होंगे. जो ज़्यादा क़िस्मतवाले होंगे उन्हें दूसरे काम करने के लिए भी जगह मिल जाएगी.

लेकिन सबको इतनी सुविधाएं मुहैया कराना मुमकिन नहीं होगा. उन्हें बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा पाना ही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती होगी.

अक्सर लोग इस बात को मज़ाक़ में उड़ा देते हैं कि एक वक़्त में धरती पर इंसानों के रहने के लिए जगह नहीं होगी. ये बात सही है कि 11 अरब लोगों के रहने के लिए धरती पर जगह तो होगी ही. आज की तारीख़ में धरती पर 13.4 अरब हेक्टेयर ज़मीन ऐसी है, जहां पर बर्फ़ या पानी नहीं है.

लेकिन इस ज़मीन का बड़ा हिस्सा, इंसानों के रहने लायक़ नहीं है. कहीं जंगल हैं, तो कहीं भयंकर सर्दी पड़ती है. कुछ पहाड़ी इलाक़े हैं, तो कई रेगिस्तान भी हैं, जहां रहना मुमकिन नहीं.

जैसे, साइबेरिया का बड़ा इलाक़ा भयंकर ठंड के चलते रहने लायक़ नहीं. इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के बीच का बड़ा हिस्सा इतना सूखा है कि इंसानी बस्तियां वहां नहीं बसाई जा सकतीं. इसीलिए ऑस्ट्रेलिया की आबादी का ज़्यादातर हिस्सा समुद्र के किनारे स्थित शहरों में रहता है.

कुदरती संसाधनों के दोहन का मसला

शहरों के विस्तार की भी एक सीमा है. माले हो या मुंबई, इनका दायरा तो हमेशा नहीं बढ़ाया जा सकता. मुंबई से नवी मुंबई हुआ. ग्रेटर बॉम्बे हुआ. अब बंबई कोई रबर का तंबू तो नहीं, जिसे खींचकर हमेशा ही बढ़ाया जा सकता है. वहीं माले तो चारों तरफ़ से समंदर से घिरा हुआ है, इसका विस्तार हो ही नहीं सकता. ऐसे ही कई और शहर और क़स्बे हैं, जो समंदर, जंगल या पहाड़ों से घिरे होने की वजह से और नहीं बढ़ाए जा सकते.

संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या विभाग के जॉन विलमॉथ कहते हैं कि जितने लोग होंगे, उन सभी को रहने के लिए क़ुदरती संसाधनों की ज़रूरत होगी. हालांकि विलमॉथ कहते हैं कि आबादी का ज़िक्र होते ही, हम सिर्फ़ जनसंख्या नियंत्रण के तौर-तरीक़ों के बारे में सोचने लगते हैं. ये नज़रिया एकदम ग़लत है. हमें इस चुनौती को नए सिरे से समझने की ज़रूरत है. तभी इसका निदान निकल पाएगा.

कैलिफ़ोर्निया एकेडमी ऑफ़ साइंस के निदेशक जोनाथन फोले कहते हैं कि जिन देशों की आबादी सबसे तेज़ी से बढ़ रही है, वो प्रति व्यक्ति के हिसाब से क़ुदरती संसाधनों का सबसे कम इस्तेमाल कर रहे हैं. जोनाथन कहते हैं कि अमीर देशों के लोग क़ुदरती संसाधनों का ज़्यादा दोहन कर रहे हैं.

दुनिया भर में जो शहर और क़स्बे आबाद हैं, वो ज़मीन का महज़ 3 फ़ीसद है. कुल ज़मीन का 35 से 40 फ़ीसद तक हिस्सा खेती के लिए इस्तेमाल होता है. लोग आशंका जताते हैं कि आबादी बढ़ने के साथ-साथ खेती वाले इलाक़ों का दायरा भी बढ़ेगा.

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दुनिया की बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए 27 से 49 लाख हेक्टेयर और ज़मीन की ज़रूरत होगी. आज की तारीख़ में धरती पर 17 लाख वर्ग मील ज़मीन ऐसी है, जिस पर खेती हो सकती है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च के मुताबिक़, जिस तेज़ी से आबादी बढ़ रही है और शहरीकरण हो रहा है, उस रफ़्तार से ये सारी ज़मीन 2050 तक इस्तेमाल होने लगेगी.

सवाल ये है कि हम इक्कीसवीं सदी में ज़मीन का कैसे बेहतर इस्तेमाल करें कि सबको रहने खाने के लिए मिल जाए.

खेती लायक़ ज़मीन का दायरा बढ़ाया जाए

आज दुनिया में जितने भी जंगल कट रहे हैं उनमें से 80 फ़ीसद के पीछे वजह खेती और जानवरों के चरने के लायक़ ज़मीन की ज़रूरत है. जंगल कटने का सबसे बड़ा नुक़सान ये है कि जो पेड़ ग्रीनहाउस गैसें सोखकर धरती की आबो-हवा साफ़ करते हैं, वो कम हो रहे हैं.

लेकिन स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जोनाथन फोले कहते हैं कि इस बात को नए नज़रिए से देखा जाना चाहिए.

फोले के मुताबिक़, हम आज जिस तरह से ज़मीन का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो तरीक़ा ग़लत है. आज खेती लायक़ कुल ज़मीन का 75 फ़ीसद हिस्सा चरागाह के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है. फिर इन जानवरों को इंसान खाते हैं. आज दुनिया में जितना अनाज पैदा होता है, उसका चालीस प्रतिशत हिस्सा फेंक दिया जाता है. मतलब ये कि जितनी ज़मीन पर ये अनाज पैदा होता है, वो उसका बेजा इस्तेमाल हो रहा है.

फोले के मुताबिक़ इस समस्या का सीधा सा हल है-इंसान मांस कम खाए और खाना कम बर्बाद करे.

जोनाथन फोले बताते हैं कि इस दिशा में काम शुरू भी हो गया है. चीन ने तय किया है कि वो अपने यहां मांस की खपत कम करेगा. अमरीका और यूरोपीय देश खाने की बर्बादी रोकने के लिए ज़रूरी क़दम उठा रहे हैं. खान-पान बदलना, ज़मीन की किल्लत से निपटने का एक तरीक़ा हो सकता है. खाने की बर्बादी रोककर भी हम इस चुनौती से निपट सकते हैं.

बढ़ते मध्यम वर्ग के लिए जगह की ज़रूरत

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Image caption दुनिया में उगाया जाने वाला 40 फीसदी खाना फेंक दिया जाता है

आज चीन और भारत जैसे देश तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहे हैं. इन देशों का रहन-सहन बेहतर हो रहा है. इन देशों में मध्यम वर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है. 2030 तक दुनिया भर में मध्यम वर्ग की आबादी क़रीब 5 अरब पहुंचने की उम्मीद है.

इन लोगों की आमदनी बढ़ने से टीवी, फ्रिज, मोबाइल फ़ोन, कंप्यूटर और कारों की फरोख़्त बढ़ रही है. बिजली की मांग बढ़ रही है. इस ज़रूरत को पूरा करना भी एक बड़ा चैलेंज है.

संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी जॉन विलमॉथ कहते हैं कि आज हमें इस बात की फिक्र कम करनी चाहिए कि हम हर इंसान के खाने के लिए ज़रूरी अनाज उगा पाएंगे या नहीं, फिक्र इस बात की ज़्यादा होनी चाहिए कि बढ़ती आबादी जितनी बिजली इस्तेमाल करेगी, उसका धरती की आबो-हवा पर क्या असर होगा?

बिगड़ता पर्यावरण, हमारे बिजली और दूसरी चीजों के इस्तेमाल करने से और ख़राब हो रहा है. हम क्लाइमेट चेंज की चुनौती से कैसे निपटें ये बड़ा सवाल है. इसका जवाब ही ये तय करेगा कि हम बढ़ती आबादी की चुनौती से कैसे निपटेंगे.

समंदर में डूब जाएंगे कई शहर

धरती का तापमान बढ़ने से ध्रुवों पर जमा बर्फ़ पिघल रही है. इससे समुद्र का स्तर बढ़ रहा है. दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के किनारे बसे शहरों में रहता है. समंदर में पानी बढ़ने से इन लोगों पर सीधा ख़तरा है.

जर्मनी की किएल यूनिवर्सिटी और ब्रिटेन के टिंडाल सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के रिसर्च के मुताबिक़ आज दुनिया भर में 62 करोड़ से ज़्यादा लोग समुद्र के किनारे बसे निचले शहरों में रह रहे हैं. 2060 तक इन शहरों की आबादी एक अरब तक पहुंच जाएगी.

शहरों की बढ़ती आबादी की चुनौती में हम बदलते पर्यावरण की दिक़्क़त को जोड़ दें, तो, चुनौती और बढ़ जाती है.

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Image caption जलवायु परिवर्तन से शहरों में बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं

किएल यूनिवर्सिटी की बारबरा न्यूमैन कहती हैं कि समुद्र के किनारे वाले इलाक़े पर्यावरण के नज़रिए से बड़ी चुनौती झेल रहे हैं. बढ़ती आबादी से इनकी सूरत बिगड़ रही है.

वो कहती हैं कि तटीय इलाक़ों में बालू के टीले हमें समंदर की लहरों से बचाते हैं. मगर बस्तियां बसाने के लिए ये टीले हटाए जा रहे हैं. इससे शहरों पर ख़तरा बढ़ रहा है.

बारबरा कहती हैं कि बढ़ती आबादी की वजह से तटीय इलाक़ों के लोग ज़्यादा ख़तरे में पड़ते जा रहे हैं. जैसे मालदीव की राजधानी माले या फिर अमरीका के फ्लोरिडा का मयामी. इन शहरों के समंदर में डूबने का ख़तरा मंडरा रहा है.

वहीं, समुद्र से दूर, भीतरी इलाक़ों का हाल भी बुरा है. मसलन, बांग्लादेश में 80 फ़ीसद देश पर बाढ़ का ख़तरा मंडराता रहता है. हर साल लाखों लोग बाढ़ के शिकार होते हैं.

ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी हर साल बाढ़ से अरबों रुपए का नुक़सान होता है.

बारबरा कहती हैं कि हमें क़ुदरती माहौल को बचाते हुए विकास का रास्ता तलाशना होगा. वो नीदरलैंड्स की मिसाल देती हैं. जहां पर निचले इलाक़ों में समुद्र के पानी के आने के लिए जगह छोड़ी गई है. वो कहती हैं कि दूसरे देशों को भी इससे सीख लेनी चाहिए.

आबो-हवा बदलने से उजड़ रही हैं बस्तियां

हर साल क़ुदरती आपदाओं की वजह से दो करोड़ से ज़्यादा लोग अपना घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर होते हैं.

वर्ल्ड रिफ्यूजी काउंसिल के लॉयड एक्सवर्थी, सीरिया की मिसाल देते हैं. वो कहते हैं कि उत्तरी सीरिया में भयंकर सूखे की वजह से बड़ी संख्या में लोग अलेप्पो जैसे शहरों की तरफ़ भागने को मजबूर हुए. आज सीरिया में छिड़ा गृह युद्ध इसी का नतीजा है.

एक्सवर्थी मानते हैं कि दुनिया भर में सूखा, बाढ़ और तूफ़ान की वजह से बड़ी तादाद में लोग उजड़ रहे हैं. पर्यावरण बदलने की वजह से हालात और बिगड़ने का डर है.

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Image caption उजड़ रहे हैं लोग

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक़ 2016 में साढ़े छह करोड़ से ज़्यादा लोग हिंसा और ज़ुल्म की वजह से बेघर हो हए. ये उससे एक साल पहले के आंकड़े से तीन लाख ज़्यादा है. ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद बेघर होने वाली आबादी की सबसे बड़ी तादाद है.

एक्सवर्थी कहते हैं कि दुनिया के कई देशों में बुनियादी सुविधाओं की भारी किल्लत है. कई देशों की सरकारें तो आंखें मूंदे बैठी हैं और कुछ भी नहीं कर रही हैं. नतीजा ये कि उजड़ रही इस आबादी का बोझ दूसरे देशों को उठाना पड़ रहा है. यूरोप और अमरीका आज बड़ी तादाद में शरणार्थियों के आने से परेशान हैं.

दुनिया के सामने आज चुनौती है कि वो युद्ध, अकाल और सूखे की वजह से भाग रहे लोगों के रहने-खाने का इंतज़ाम करे. पिछले साल जितने लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा, उनमें से सवा दो करोड़ लोगों ने दूसरे देशों में जाकर शरण ली. इन लोगों के रहने-खाने और दूसरी ज़रूरतों का इंतज़ाम उन देशों पर भारी पड़ रहा है, जहां ये शरणार्थी जा रहे हैं. 2016 में घर छोड़ने वाले साढ़े छह करोड़ लोगों में से एक लाख 89 हज़ार और तीन सौ लोगों को ही दूसरे देशों ने अपनाया. बाक़ी के लोग अस्थाई शरणार्थी कैंप में रहने को मजबूर हैं. उन्हें पानी-बिजली और खाने जैसी दूसरी ज़रूरतें भी नही मिल पा रही हैं.

अपनी ज़मीन न होने की वजह से ही इन शरणार्थियों को जीने की बुनियादी चीज़ें नहीं मिल पा रही हैं. इनकी वजह से ही ग्रीस और युगांडा जैसे देश अपनी ज़मीन का सही इस्तेमाल नही कर पा रहे हैं. क्योंकि, इन देशों में शरणार्थियों की बाढ़ आई हुई है.

ऐसी चुनौती जिसकी कोई सरहद नहीं

जिन शहरों को शरणार्थियों की चुनौती नहीं झेलनी पड़ रही, उनके लिए भी हालात कोई अच्छे नहीं. मालदीव की राजधानी माले को ही लीजिए. सब लोगों को रहने की जगह देने के अलावा उनके लिए स्कूल-कॉलेज और अस्पताल मुहैया कराना भी एक चुनौती है.

इन्हीं सुविधाओं की तलाश में दुनिया भर में लोग गांवों से शहरों की तरफ़ भागते हैं. इससे शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ता है.

शहरों में बेतादाद लोगों को तो बसाया नहीं जा सकता. हर शहरी को सभी सुविधाएं मिलें, इसके लिए बड़ी प्लानिंग की ज़रूरत होती है. उनके लिए पानी-बिजली का इंतज़ाम, कचरा ठिकाने लगाने की व्यवस्था जैसी कई ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता है. कई शहरों की बेतादाद आबादी की वजह से बड़े-बड़े स्लम आबाद हो गए हैं. मुंबई-दिल्ली की झुग्गी बस्तियां इसकी मिसाल हैं.

आज एशिया और अफ्रीका में शहरीकरण बाक़ी दुनिया के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से हो रहा है. 2020 तक अफ्रीका शहरी आबादी वाला दूसरा बड़ा महाद्वीप होगा. अफ्रीका में 56 करोड़ लोग शहरों में रह रहे होंगे. वहीं एशिया में क़रीब ढाई अरब शहरी आबादी होगी.

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अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के जोएल कोहेन कहते हैं कि आज इस हालात से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है. हमें फिलहाल इस बात पर ज़्यादा ज़ोर नहीं देना चाहिए कि बढ़ती आबादी के लिए ज़मीन कहां से आएगी. हमें ये सोचना होगा कि शहरों की बढ़ती आबादी को बुनियादी सुविधाएं कैसे दे पाएंगे?

वैसे, हर जगह, हर देश की अपनी अलग चुनौती है. यूरोप और अमरीका, शरणार्थियों से परेशान हैं. तो माले की दिक़्क़त ये है कि वो चौतरफ़ा समंदर से घिरा है. भारत जैसे देश में शहरों की बुनियादी सुविधाएं, बढ़ती आबादी के लिहाज़ से कमतर साबित हो रही हैं.

इंसान के विकास में ज़मीन का बड़ा अहम रोल रहा है. इसकी किल्लत से तरह-तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं.

धरती पर फिलहाल जितने इंसान हैं, उनके लिए पर्याप्त क़ुदरती संसाधन हैं. ज़रूरत है, इनके सही बंटवारे और इस्तेमाल की. शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है.

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