दुनिया भर में क्यों हो रही है नए देशों की मांग?

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Image caption बलूचिस्तान में भी पाकिस्तान से अलग देश बनाने की मांग उठ रही है.

दुनिया के कई हिस्सों में लोग अपने लिए अलग देश मांग रहे हैं. पड़ोसी देश पाकिस्तान को ही लीजिए. बलोच लोग अलग बलूचिस्तान बनाना चाहते हैं. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के पठान मिलकर अलग पख़्तूनिस्तान बनाना चाहते हैं.

कश्मीरी पिछले कई दशकों से आज़ादी की मांग कर रहे हैं. चीन में शिन्जियांग सूबे के लोग चीन से अलग देश बनाना चाहते हैं. श्रीलंका में बरसों तक तमिलों ने अलग देश के लिए हिंसक संघर्ष किया.

रूस मे चेचेन्या के लोग अलग मुल्क की मांग पर अड़े हैं. उधर, यूक्रेन में रूस से लगे पूर्वी इलाक़े के लोग अलग होकर अपना देश बनाना चाहते हैं.

स्कॉटलैंड ग्रेट ब्रिटेन से अलग देश बनना चाहता है. यूरोप में ही स्पेन के कैटालोनिया सूबे के राष्ट्रपति कार्ल्स पूजडेमॉन ने जून महीने में एलान किया था कि वो अक्टूबर में स्पेन से अलग होने के लिए कैटेलोनिया में जनमत संग्रह कराएंगे.

इसी तरह इराक़ी कुर्द अपने अलग वतन की मांग को लेकर रायशुमारी कराने की बात कर रहे हैं.

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Image caption नए देशों की मांग मानने के लिए सरकारें तैयार नहीं

सरकारें मांगें मानने को तैयार नहीं

अलग देश की इन मांगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि जिन देशों में ये मांग उठ रही है, वहां की सरकारें इन्हें आज़ादी देने को राज़ी नहीं. तो अब चाहे जितनी बुलंद आवाज़ हो, चाहे जितनी लंबी लड़ाई हो, मगर इन इलाक़ों के अलग देश बनने की उम्मीद कम ही है.

सवाल ये है कि किसको अपना अलग देश बनाने का अधिकार है?

बीबीसी रेडियो की सिरीज़ द इन्क्वायरी में इस बार जेम्स फ्लेचर ने इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की.

पहले के ज़माने में लोग ताक़त के बल पर ज़मीनें और देश हथिया लेते थे. बड़े-बड़े लड़ाके हुए जिन्होंने विशाल बादशाहतें क़ायम कीं. जैसे यूनान का सिकंदर महान या फिर मंगोलिया के चंग़ेज़ ख़ां और मध्य एशिया का तैमूर लंग.

जो भी जंग में जीत हासिल करता था, वो बादशाह बन जाता था. जीते हुए इलाक़े में उसकी हुकूमत हो जाती थी.

मगर बीसवीं सदी में इंसानियत ने इसी वजह से भारी नुक़सान उठाया. ताक़त के बूते पर अपने देश के विस्तार की वजह से दो विश्व युद्ध हुए, जिनमें पांच करोड़ से ज़्यादा लोग मारे गए.

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आधुनिक समय में नए देशों की मांग

इसके बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई. तमाम देशों को लगा कि आगे से ताक़त के बल पर कोई अपनी सीमाओं का विस्तार न कर सके, इसके लिए नये सिद्धांत की ज़रूरत है. इन देशों ने तय किया कि लोगों को अपना भविष्य ख़ुद तय करने का हक़ मिलना चाहिए.

डॉक्टर जेम्स इर्विंग कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा महसूस किया गया कि लोगों को अपनी सरकार चुनने का हक़ होना चाहिए.

डॉक्टर इर्विंग लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अंतरराष्ट्रीय क़ानून के विशेषज्ञ हैं. वो बताते हैं कि इसीलिए ख़ुद अपना भविष्य तय करने के अधिकार का ज़िक्र संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में है.

पचास और साठ के दशक में तमाम देश आज़ाद हुए. वो यूरोपीय देशों के ग़ुलाम थे. मगर वो देश अपना भविष्य ख़ुद तय करने, अपनी हुकूमत ख़ुद चलाने की मांग कर रहे थे. भारत भी उनमें से एक था.

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नए देश की मांग का आधार

नए अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के हिसाब से उन्हें ये हक़ मिलना चाहिए था. उन्हें ये अधिकार मिला भी. तभी तो भारत जैसे एशियाई और अफ़्रीकी देशों को यूरोपीय देशों की ग़ुलामी से आज़ादी मिली. 1945 में जहां संयुक्त राष्ट्र के केवल 51 सदस्य देश थे, वहीं आज ये संख्या 193 है.

जेम्स इर्विंग कहते हैं कि ये उपनिवेश राज करने वाले यूरोपीय देशों से दूर थे, इसलिए इन्हें आज़ादी आसानी से मिल गई. मगर इससे नई दिक़्क़त भी खड़ी हुई. उन इलाक़ों के आत्मनिर्णय के अधिकार का क्या होगा, जो आज़ाद देशो के भीतर हैं?

स्पेन के कैटालोनिया, पाकिस्तान का बलोचिस्तान या चीन का शिन्जियांग ऐसी ही मिसालें हैं. इन इलाक़ों के लोग अपने लिए आज़ाद मुल्क मांग रहे हैं. मगर उन देशों की हुकूमतें इन्हें अलग करने के लिए राज़ी नहीं.

इस चुनौती की सबसे बड़ी मिसाल है, सर्बिया का कोसोवो इलाक़ा. यूगोस्लाविया से अलग होकर जो छह देश बने थे उनमें सर्बिया भी एक था. मगर सर्बिया के कोसोवो इलाक़े ने अलग देश की मांग की. सर्बिया ने इस आवाज़ को दबाने की कोशिश की.

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संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र और नैटो की अगुवाई में सेनाएं, कोसोवो की मदद करने पहुंच गईं.

ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले जेम्स कर-लिंडसे कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद तमाम देशों में इस बात पर रज़ामंदी हुई कि किसी भी देश की सीमा में ज़बर्दस्ती कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.

मगर ये सिद्धांत लोगों के आत्म निर्णय के अधिकार के ख़िलाफ़ है. कोसोवो ऐसा ही तो कर रहा है. कोसोवो के लोग आत्म निर्णय के अधिकार के तहत अलग देश चाहते हैं. मगर दूसरे अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के तहत सर्बिया की सरहदों में ज़बरन बदलाव करना ग़लत होगा.

जेम्स कर-लिंडसे कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इन दोनों सिद्धांतों के बीच का रास्ता निकाला. किसी देश की सीमा में बदलाव किए बगैर, ख़ुदमुख़्तारी मांगने वाले लोगों को आज़ादी के बजाय ज़्यादा अधिकार देकर उन्हें शांत करने की कोशिश की गई. उन्हें स्वायत्त शासन का अधिकार दिया गया.

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कई नए देशों का हुआ गठन

आज की तारीख़ में कोसोवो ने ख़ुद को आज़ाद मुल्क घोषित कर रखा है. कई देशों ने उसे मान्यता भी दी हुई है. मगर, संयुक्त राष्ट्र कोसोवो को अलग देश नहीं मानता.

2008 में सर्बिया ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में कोसोवो की आज़ादी के एलान के ख़िलाफ़ अर्ज़ी दी. अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा कि इसमें कुछ भी ग़लत नहीं. कोई भी अपने आप को आज़ाद देश घोषित कर सकता है. ये किसी अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के ख़िलाफ़ नहीं है.

यूं तो आप जिस मकान में रहते हैं उसके ही अलग देश होने का एलान कर सकते हैं. आपको ये हक़ है. मगर बड़ा सवाल ये है कि आख़िर आपके मकान को अलग देश मानेगा कौन?

किसी भी इलाक़े को जब तक दूसरे देश अलग देश के तौर पर मान्यता नहीं देते, तब तक उसका ख़ुद को आज़ाद कहना बेमानी है. भले ही वो इलाक़ा ख़ुदमुख़्तार हो. बाक़ी अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करता हो. मगर उसे अलग देश नहीं माना जा सकता.

इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, पूर्वी अफ्रीका का सोमालीलैंड इलाक़ा. सोमालीलैंड ने 1991 में ख़ुद के सोमालिया से अलग देश होने का एलान कर दिया था. वहां लोकतांत्रिक शासन है. कई बार साफ़-सुथरे चुनाव हो चुके हैं. अच्छी हुकूमत है.

राज-पाट बढ़िया चल रहा है. बाक़ी सोमालिया के मुक़ाबले सोमालीलैंड तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहा है. यानी सोमालीलैंड में वो सब कुछ है जो किसी देश में होना चाहिए. मगर सोमालीलैंड को कोई भी देश मान्यता नहीं देता. इसलिए वो अलग देश नहीं है. उसके पासपोर्ट की कोई मान्यता नहीं.

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संयुक्त राष्ट्र की मान्यता ज़रूरी

ब्रिटेन की कीले यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली रेबेका रिचर्ड्स कहती हैं कि सबसे ज़रूरी है संयुक्त राष्ट्र की मान्यता और सदस्यता. किसी भी इलाक़े के अलग देश बनने की ये सबसे बड़ी शर्त है.

रेबेका कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता कई बातों के लिए ज़रूरी है. अगर ये हासिल नहीं है तो कोई भी देश विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं से क़र्ज़ नहीं ले सकता. उसका अपनी सीमाओं पर कोई अख़्तियार नहीं होता. अंतराष्ट्रीय कारोबारी क़ानूनों का उसे फ़ायदा नहीं मिलता. आप दूसरे देश के साथ आसानी से कारोबार नहीं कर सकते.

तो, अगर संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता नहीं है, तो किसी भी देश को सही मायनों में देश नहीं कहा जा सकता.

आज सोमालीलैंड जैसे क़रीब दर्जन भर ऐसे गैर मान्यता प्राप्त देश हैं. कोसोवो भी इनमें से एक है. जबकि कोसोवो को कई देश मान्यता दे चुके हैं. मगर रूस, कोसोवो को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता को वीटो करता रहा है.

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क्योंकि वो सर्बिया का साथी है. पर कई देशों से मान्यता मिलने की वजह से कोसोवो को विश्व बैंक से क़र्ज़ मिल जाता है. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी में भी वो सदस्य है. इसकी बड़ी वजह ये है कि अमरीका और ब्रिटेन जैसे ताक़तवर देश कोसोवो का समर्थन करते हैं.

साफ़ है कि किसी भी इलाक़े को अलग देश का दर्जा हासिल करने के लिए बड़े देशों का समर्थन मिलना ज़रूरी है. और बड़े देश ये काम अपना नफ़ा-नुक़सान देखकर करते हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है ईस्ट तिमोर.

ईस्ट तिमोर कभी पुर्तगाल का उपनिवेश था. साठ के दशक में इंडोनेशिया ने उस पर हमला करके कब्ज़ा कर लिया. इंडोनेशिया उस वक़्त शीत युद्ध में पश्चिमी देशों का साथी था. इसलिए अमरीका जैसे बड़े देशों ने इंडोनेशिया की इस हरकत पर आंख मूंद ली.

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शीत युद्ध के बाद नए देशों की मांग

जब शीत युद्ध ख़त्म हो गया तो पश्चिमी देशों को इंडोनेशिया की वैसी ज़रूरत नहीं रही. इसलिए वो ईस्ट तिमोर के आत्म निर्णय के अधिकार के समर्थक हो गए. 1999 में वहां जनमत संग्रह हुआ. 2002 में संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों ने ईस्ट तिमोर को अलग देश के तौर पर मान्यता दे दी.

अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार मिलेना स्टीरियो कहती हैं कि जो भी देश आज़ादी हासिल करने में कामयाब रहे हैं, उन्हें ऐसा अधिकार बड़ी ताक़तों के समर्थन से हासिल हुआ.

मिलेना, अमरीका की क्लीवलैंड यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं. वो कहती हैं कि ईस्ट तिमोर और कोसोवो इसकी मिसाल हैं. ईस्ट तिमोर आज अलग देश है. वहीं कोसोवो संयुक्त राष्ट्र की मान्यता के बग़ैर भी सर्बिया से अलग अपनी हुकूमत इसीलिए चला पा रहा है, क्योंकि बड़े देश उसके समर्थन में हैं.

इन मिसालों से साफ़ है कि किसी भी इलाक़े को अलग देश बनना है तो सबसे पहले उसे बड़े और ताक़तवर देशों का समर्थन जुटाना होगा.

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सिर्फ़ मानवाधिकारों के उल्लंघन का शोर मचाकर या अलोकतांत्रिक हालात की शिकायत करने भर से नया देश नहीं बन जाता.

बलोच लोग पाकिस्तानी फ़ौज के ज़ुल्म की चाहे जितनी शिकायत करें, चेचेन्या के लोग चाहे आज़ादी की जितनी मांग करें, या इराक़ी कुर्द स्वतंत्रता का शोर चाहे जितनी ताक़त से मचाएं, जब तक बड़े देश और संयुक्त राष्ट्र उन्हें समर्थन और मान्यता नहीं देते, तब तक उनका अलग देश का सपना अधूरा ही रहना है.

हां, आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत इन इलाक़ों को थोड़े ज़्यादा अधिकार भले मिल सकते हैं. स्पेन भी शायद कैटेलोनिया के लोगों को ऐसा करके मना लेगा.

अलग देश के तौर पर अपनी हुकूमत चलाने की दो प्रमुख शर्तें हैं. पहली तो ये कि बड़ी ताक़तें आपके समर्थन में हों. दूसरी ये कि संयुक्त राष्ट्र संघ आपको मान्यता दे. इनके बग़ैर कोई देश, अलग देश नहीं कहा जा सकता.

(बीबीसी न्यूज़ के ख़ास कार्यक्रम द इनक्वायरी में ये पूरी रिपोर्ट आप सुन सकते हैं.)

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