'जिन्ना को मालूम था, गवर्नर जनरल बनने से क्या हासिल होगा'

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अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई के दौर और तब की घटनाओं पर उस समय शेख़ मुजीबुर रहमान ने काफ़ी विस्तार से लिखा है. तब शेख मुजीब नौजवान थे.

बाद में जब बांग्लादेश की मुक्ति का आंदोलन छिड़ा तो शेख मुजीब ही इसके अगुआ थे. लोगों ने उन्हें प्यार से बंग बंधु कहा और वे स्वतंत्र बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति बने.

शेख मुजीब का लेखन बांग्लादेश आंदोलन पर भी है. पाकिस्तान के निर्माण को शेख मुजीब किस तरह से देखते थे, उन्होंने अपने 'अधूरी आत्मकथा' में इसका जिक्र किया है. बीबीसी बांग्ला सेवा की ख़ास पेशकश.

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Image caption नेहरू और जिन्ना

मुजीब की 'अधूरी आत्मकथा' से...

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन ने बातचीत के लिए क्रिप्स मिशन को भेजा था मगर कोई नतीजा नहीं निकला. जब युद्ध खत्म हुआ, लेबर पार्टी के क्लेमेंट ऐटली प्रधानमंत्री बने. उन्होंने ऐलान किया कि वह 15 मार्च 1946 को भारत में कैबिनेट मिशन भेजेंगे.

इस मिशन में तीन मंत्री होंगे जो भारत आकर विभिन्न पार्टियों से बात करेंगे ताकि कम से कम वक्त में भारत की आज़ादी के लिए रास्ता निकाला जा सके.

इस विषय पर ऐटली के भाषण में कहीं भी मुस्लिमों द्वारा की जा रही पाकिस्तान की मांग का ज़िक्र नहीं था. कांग्रेस ने संतोष के साथ उनके भाषण का स्वागत किया मगर मुहम्मद अली जिन्ना ने इसकी आलोचना की.

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Image caption युवा शेख़ मुजीबुर रहमान

बंगाल में मुस्लिम लीग

कैबिनेट मिशन 23 मार्च 1946 को भारत पहुंचा. भारत पहुंचकर उन्होंने जो बयान दिए, उनसे हमें निराशा पहुंची. जब हम उनके बयान सुनते तो हुसैन शहीद सोहरावर्दी के पास जाकर पूछते कि कैबिनेट मिशन की मंत्रणा का क्या नतीजा निकलने वाला है.

सोहरावर्दी शांतिपूर्वक जवाब देते हुए हमें बताते, "हमें डरने की ज़रूरत नहीं है. उन्हें हमारी पाकिस्तान की मांग माननी ही होगी." मैं उनसे रात 11 बजे मिलने जाया करता था. अचानक हमें पता चला कि जिन्ना साहब ने पूरे भारत से मुस्लिम लीग की केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों के सभी सदस्यों का सम्मेलन बुलाया है.

सम्मेलन दिल्ली में 7 से 9 अप्रैल 1946 को होना था. पिछले चुनाव में बंगाल में मुस्लिम लीग ने ज़बर्दस्त जीत हासिल की थी. ज़्यादातर मुस्लिम बहुल प्रांतों में भी यह सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी. सिर्फ़ बंगाल में ही सोहरावर्दी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग अपने बूते पर सरकार बना सकी थी.

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'ईस्ट पाकिस्तान स्पेशल' नाम की ट्रेन

जिन चार प्रांतों में मुसलमान बहुसंख्यक थे, उनमें सिर्फ बंगाल ही था जहां मुस्लिम लीग ख़ुद सरकार बना पाई. बाकी सभी जगहों पर इसे विपक्ष में बैठना पड़ा था. उस वक्त भारत 11 प्रांतों में बंटा हुआ था.

सोहरावर्दी ने बंगाल और असम से मुस्लिम लीग के विधायकों को दिल्ली ले जाने के लिए विशेष ट्रेन का इंतज़ाम करने के आदेश दिए. 'ईस्ट पाकिस्तान स्पेशल' नाम की ट्रेन कोलकाता के हावड़ा स्टेशन से चलने वाली थी. बंगाल में मुस्लिम लीग की जीत से पूरे भारत में मुसलमानों पर गहरा प्रभाव पड़ा था.

जैसे ही ट्रेन चलनी शुरू हुई, 'अल्लाहु अकबर', 'मुस्लिम लीग ज़िंदाबाद', 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद', 'मुहम्मद अली जिन्ना ज़िंदाबाद' और 'शहीद सोहरावर्दी ज़िंदाबाद' के नारों से स्टेशन गूंज उठा. बंगाल मुस्लिम लीग के नुमाइंदों के अभिवादन के लिए हज़ारों लोग आए थे.

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Image caption शेख़ मुजीबुर रहमान अपने परिवार के साथ

बाद में झंडे के टुकड़े-टुकड़े

कुछ महीनों बाद, 29 जुलाई 1946 को मुहम्मद अली जिन्ना ने ऐलान किया कि 16 अगस्त 'डायरेक्ट एक्शन डे' होगा. उन्होंने बयान जारी करके सभी को इस दिन को शांतिपूर्ण मनाने की अपील की. वह ब्रिटिश सरकार को दिखाना चाहते थे कि भारत के 10 करोड़ मुस्लिम किसी भी क़ीमत पर पाकिस्तान चाहते हैं.

कांग्रेस और हिंदू महासभा के नेताओं ने बयान जारी करके यह कहना शुरू किया कि 'डायरेक्ट एक्शऩ डे' को उनके ख़िलाफ़ मनाया जा रहा है. हमें उस दिन कार्यक्रमों का आयोजन करने के लिए कहा गया था. हमने अपने संदेश को मुस्लिम और हिंदू दोनों इलाक़ों में फैलाना शुरू किया.

हमने उन्हें बताया कि हम हिदुओं के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, इसलिए हमारे साथ इस दिन को मनाएं. मगर हिंदू महासभा और कांग्रेस हिंदुओं को यह समझाने में कामयाब रही कि हम उनके ख़िलाफ़ हैं.

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Image caption बंगाल में छिड़ चुके थे दंगे

दंगा क्या होता है नहीं मालूम था

उस वक़्त सोहरावर्दी साहब बंगाल के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने हमसे यह सुनिश्चित करने को कहा कि लोग इस दिन को शांतिपूर्वक मनाएं. उन्होंने एलान किया कि 16 अगस्त को सरकारी छुट्टी रहेगी. मुझे कलकत्ता इस्लामिया कॉलेज का प्रभार संभालने के लिए कहा गया था, जहां पर छात्र सुबह 10 बजे इकट्ठा होने थे.

मगर हमें सुबह 7 बजे कलकत्ता यूनिवर्सिटी जाना पड़ा जहां मुस्लिम लीग का झंडा फ़हराया जाना था. मैं नूरुद्दीन के साथ कलकत्ता यूनिवर्सिटी गया और मुस्लिम लीग का झंडा फ़हराया. किसी ने हमें नहीं रोका. मगर बाद में पता चला कि झंडे के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे.

जब हम इस्लामिया कॉलेज के परिसर में दाख़िल हुए, कुछ छात्र दौड़ते हुए कॉलेज आए. वे सब ख़ून से सने हुए थे. उनमें से कुछ पर चाकू के ज़ख़्म थे तो कुछ के सिर पर वार किया गया था. हम इन हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं थे.

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एक छात्र ने हमसे कहा था कि समूह में चलने पर हिंदू किसी पर हमला नहीं करेंगे, लेकिन अकेले या समूह में चलने वालों पर हमला किया गया. हमें पता चला कि वेलिंगटन चौराहे पर स्थित मस्जिद पर हमला हुआ है और हिंदुओं की भीड़ कॉलेज की तरफ़ बढ़ रही थी.

हम 40 या 50 लोग धर्मताला चौराहे की ओर बढ़ रहे थे और हमारे पास हथियार नहीं थे. मुझे तब तक साफ़-साफ़ पता नहीं था कि दंगा क्या होता है या भीड़ की हिंसा का क्या मतलब है. हमने देखा कि हज़ारों हिंदू मस्जिद पर हमला कर रहे थे.

मस्जिद के इमाम दौड़ते हुए हमारे पास आए, डंडे और तलवार लिए लोग उनका पीछा कर रहे थे. हममें से कुछ लोगों ने 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' चिल्लाया. इतनी देर में कई लोगों ने ऐसा किया. इसी बीच हिंदुओं की भीड़ हम तक पहुंच गई. हमारे पास उनको रोकने के अलावा कोई चारा नहीं था.

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Image caption अलग-अलग समुदाय के लोग कर रहे थे दंगे

नोआखाली में दंगे

तब तक हमला केवल पत्थर फेंकने तक सीमित था. कुछ समय के साथ हमारे समर्थन में एक भीड़ पहुंच गई. इसके बाद हिंदुओं ने आगे बढ़ना बंद कर दिया और वैसे ही हमने भी किया. पूरा कलकत्ता एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो चुका था और मुझे यक़ीन है कि मुस्लिम दंगों के लिए तैयार नहीं थे.

दंगों के दौरान हमने कई मुस्लिम और हिंदू परिवारों को बचाया. कलकत्ता शहर की सड़कों पर लाशें बिछी हुई थीं. एक इलाके के बाद दूसरा इलाका आग में था. यह एक भयानक दृश्य था. कलकत्ता तबाह हो गया था. मुसलमान मुस्लिम इलाकों में शरण ले रहे थे और हिंदू लोगों के पास हिंदू जा रहे थे.

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सोहरावर्दी दिन-रात कड़ी मेहनत कर रहे थे. जल्द ही कलकत्ता में दंगों की समाप्ति के बाद नोआखाली में दंगे भड़क गए थे. वहां मुसलमानों ने हिंदू घरों को लूटना और उन्हें जलाना शुरू कर दिया था.

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बंगाल का विभाजन

ढाका एक दंगे के बाद दूसरे दंगे का गवाह था. बिहार भी जल रहा था. बिहार के अधिकतर ज़िलों में मुसलमानों पर नियोजित तरीके से हमला किया गया था. जून 1947 में यह तय हो गया था कि भारत का विभाजन होगा. यह तय था कि पंजाब और बंगाल का दो हिस्सों में विभाजन होगा.

कांग्रेस इस पर सहमत थी. सिलहट को छोड़कर असम का कोई भी हिस्सा पाकिस्तान में नहीं था. कलकत्ता और उसके आस-पास का इलाका भारत के हिस्से में था. इस इलाके के मुस्लिम लीग के नेता बंगाल के विभाजन का विरोध कर रहे थे.

बर्धमान ज़िले को छोड़ने पर राज़ी थे लेकिन कलकत्ता को इसमें क्यों नहीं रहना चाहिए? बंगाल के विभाजन को लेकर कांग्रेस और हिंदू महासभा ने सार्वजनिक राय बनानी शुरू कर दी थी. हमने भी इस प्लान के ख़िलाफ़ सार्वजनिक बैठक करने का फैसला कर लिया था.

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कांग्रेस और मुस्लिम लीग

निश्चित रूप से बंगाली नेताओं को यह मालूम नहीं था कि बंगाल दो भागों में विभाजित होगा. वे सोचते थे कि पूरा बंगाल और असम पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा. उस समय मुस्लिम लीग के अबुल हाशिम और हुसैन शाहिद सोहरावर्दी और कांग्रेस के शरत बोस एवं किरण शंकर रॉय ने हालात पर चर्चा के लिए मुलाकात की.

उनकी चर्चा का विषय था कि क्या कोई विकल्प खोजा जा सकता है. बंगाल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता सर्वसम्मति से एक फॉर्मूले पर पहुंच गए थे. जहां तक मुझे याद है यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि बंगाल एक स्वतंत्र और संप्रभु देश होगा.

जनता एक विधानसभा का चुनाव करेंगे. वह विधानसभा तय करेगी कि बंगाल चाहे तो हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल हो सकता है या फिर स्वतंत्र रह सकता है. सोहरावर्दी और शरत बोस इस फॉर्मूले को दिल्ली ले गए जहां उनका इनका इरादा जिन्ना और गांधी से मिलने का था.

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जिन्ना बनना चाहते थे गवर्नर जनरल

बोस ने जिन्ना के लिए एक ख़त छोड़ा जिस पर जिन्ना ने कहा था कि कांग्रेस अगर इस फॉर्मूले पर राज़ी है तो मुस्लिम लीग को भी कोई आपत्ति नहीं होगी. लेकिन अंग्रेज़ ऐसा कोई नया फॉर्मूला नहीं अपनाना चाहते थे जिस पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों की सहमति न हो.

इसके बाद सरदार वल्लबभाई पटेल ने शरत बोस को कहा कि वह ऐसी हरकतें न करें क्योंकि वे कलकत्ता चाहते हैं और बोस के सामने पटेल सख़्त थे. इस बार वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने सभी चीज़ों का हल निकाल दिया.

वह इंडिया और पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनना चाहते थे लेकिन जिन्ना ऐसा नहीं होने देना चाहते थे क्योंकि उनका इरादा पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनने का था. शायद उन्होंने लॉर्ड माउंटबेटन के बारे में जाना नहीं था. उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि नाराज़ माउंटबेटन पाकिस्तान को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

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हालांकि, रेडक्लिफ़ को सीमा के निर्धारण की ज़िम्मेदारी दी गई थी लेकिन ऐसा माना जाता है कि माउंटबेटन चुपचाप कांग्रेस के साथ नक्शे पर काम कर रहे थे. हममें से जितने भी युवा थे वह जिन्ना के ख़िलाफ़ नहीं थे. हमें उम्मीद थी कि वह पहले प्रधानमंत्री बनेंगे और बाद में राष्ट्रपति बनेंगे.

मुझे संदेह था कि अगर लॉर्ड माउंटबेटन गवर्नर जनरल बने तो पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाएंगे. मेरा स्वयं का विश्वास है कि जिन्ना हमारी तुलना में ज़्यादा चालाक थे और केवल वही जानते थे कि गवर्नर जनरल बनने से क्या हासिल होगा.

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