वो तस्वीरें जो खींची नहीं बनाई गई हैं

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Image caption एंड्रियास गर्सकी की तस्वीर मोंपारनासे टावर की है

कहते हैं कि एक तस्वीर हज़ार शब्दों के बराबर होती है. पर हम आप से कहें कि एक तस्वीर के भीतर हज़ार तस्वीरें होती हैं, तो आप सिरे से नकार देंगे.

मगर आप यक़ीन करें कि कुछ तस्वीरें ऐसी हैं, जिनके अंदर हज़ार तस्वीरें छुपी हुई हैं.

ऐसी ही एक तस्वीर है, पेरिस के मोंपारनासे इलाक़े में बने फ्लैट्स की. सीन नदी के किनारे बने ये फ्लैट्स पेरिस शहर में फ्लैट के सबसे बड़े ब्लॉक हैं. इन्हें 1959 से 1964 के बीच बनाया गया था. ये आधुनिक इमारतों की एक मिसाल हैं.

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मोंपारनासे के फ्लैट्स की एक तस्वीर बनाई थी जर्मन फ़ोटोग्राफ़र एंड्रियास गर्सकी ने. गर्सकी ने ये तस्वीर बनाई थी 1993 में. अब आप कहेंगे कि तस्वीर तो खींची जाती है, बनाई कैसे गई.

तो साहब यही तो इस तस्वीर की ख़ासियत है. मोंपारनासे के फ्लैट्स की ये तस्वीर एक विशाल कैनवास पर उकेरी गई पेंटिंग लगती है. असल में गर्स्की ने कई फ़ोटो को मिलाकर फ्लैट्स के इस हुजूम की एक विशाल तस्वीर बनाई है.

ये एक तस्वीर अपने आप में हज़ार तस्वीरें समेटे हुए है. हर फ्लैट से झांकती खिड़की या यूं कहें कि झांकती ज़िंदगी का अपना अलग रंग है. फ्लैट्स का ये हुजूम साथ मिलकर एक इमारत का रूप अख़्तियार कर लेती है. मगर इन्हें अलग करके देखें तो हर फ्लैट का अपना अलग वजूद नज़र आता है.

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Image caption 90 के दशक में गर्स्की और उनके साथियों की तस्वीरें बेहद लोकप्रिय थीं

एंड्रियास गर्स्की जर्मन फ़ोटोग्राफ़र्स के डसेलडॉर्फ़ स्कूल का हिस्सा थे. उनके कई और साथी भी थे जिन्होंने डसेलडॉर्फ़ के आर्ट स्कूल से पढ़ाई की थी. इनमें थॉमस रफ़ और थॉमस स्ट्रथ प्रमुख हैं. इन लोगों ने मिलकर अस्सी और नब्बे के दशक में फ़ोटोग्राफ़ी को नया आयाम दिया. इसे पेंटिंग की तरह ही कला का दर्जा दिलाया.

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Image caption गर्स्की के साथियों थॉमस रफ़ और थॉमस स्ट्रथ की द कॉनसोलैंडी परिवार की तस्वीर

गर्स्की, रफ़ और स्ट्रथ की खींचीं तस्वीरें कई बार करोड़ों रुपयों में बिकी हैं. इनके काम को मॉडर्न आर्ट का दर्जा दिया जाता है. हालांकि बहुत से लोग इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वो कहते हैं कि तस्वीरें कैसे पेंटिंग का मुक़ाबला कर सकती हैं. उन्हें कैसे संग्रहालयों और नीलामघरों में बराबरी का दर्जा दिया जा सकता है.

मगर नब्बे के दशक में गर्स्की और उनके साथियों की खींची तस्वीरों का जबरदस्त क्रेज हुआ करता था. लकड़ी के बड़े-बड़े फ्रेम में लगाकर इनकी तस्वीरें पेंटिंग की बराबरी किया करती थीं. करोड़ों रुपये में ख़रीदी-बेची जाती थीं.

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Image caption कैन्डीडा हॉफ़र की खींची तस्वीर

इन फ़ोटोग्राफ़र की जमात में कनाडा के होफर और योर्ग सास भी शामिल थे. इन सबको डसेलडॉर्फ़ स्कूल की पैदाइश माना जाता था.

हाल ही में जर्मनी के स्टाडेल में इनके काम की नुमाइश लगी थी. इस प्रदर्शनी की देखरेख करने वाले मार्टिन एंगलर बताते हैं कि डसेलडॉर्फ़ की कला अकादमी में इस चलन की शुरुआत जर्मन फ़ोटोग्राफ़र्स बर्न्ड और हिला बेकर ने की थी.

बर्न्ड बेकर को 1976 में डसेलडॉर्फ़ की अकादमी में फ़ोटोग्राफ़ी के प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त किया गया था. हालांकि बर्न्ड ने पढ़ाई पेंटिंग में की थी. उनकी पत्नी हिला भी उनके साथ काम किया करती थीं. हालांकि हिला अकादमी में किसी पद पर नहीं थीं.

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Image caption थॉमस रफ़ के खींचे गए पोट्रेट्स में से एक

हिला और बर्न्ड की मुलाक़ात पढ़ाई के दौरान ही 1957 में हुई थी. 1961 में दोनों ने शादी कर ली थी. इसके बाद दोनों ने कुछ वक्त अमरीका में बिताया था. वापस आकर बेकर दंपति ने डसेलडॉर्फ अकादमी में काम करना शुरू कर दिया था.

न्यूयॉर्क में रहने के दौरान बेकर दंपति ने फ़ोटोग्राफ़ी को लेकर नई चीज़ें सीखी थीं. इसे उन्होंने जर्मनी में आज़माना शुरू कर दिया.

वो लोग पुराने पड़ चुके कारखानों और मशीनों की तस्वीरें लिया करते थे. फिर कई तस्वीरों को मिलाकर बड़ी, पेंटिंग जैसी तस्वीर तैयार करते थे.

बर्न्ड और हिला बेकर का मानना था कि जर्मनी के पुराने कारखाने एक गुजरते हुए दौर के गवाह हैं. इनकी तस्वीरें लेकर इन्हें संजोया जाना चाहिए. इसीलिए उन्होंने एक साथ एक तरह की कई तस्वीरें लेकर फिर उन्हें जोड़कर एक तस्वीर बनाने का काम शुरू किया. इन तस्वीरों को वो टाइप कहा करते थे.

उन्होंने कई तस्वीरों को मिलाकर कुछ इस अंदाज़ में पेश करना शुरू किया जैसे पेटिंग हो. इसीलिए उनकी फ़ोटोग्राफ़ी उस दौर में अलग पहचान बनाने लगी. जब बर्न्ड और हिला ने डसेलडॉर्फ़ की अकादमी में पढ़ाना शुरू किया, तो बहुत से छात्रों ने उनकी खींची तस्वीरों में दिलचस्पी लेनी शुरू की.

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Image caption 'हाफ़ टिंबर हाउस'

फिर अस्सी और नब्बे के दशक में बेकर दंपति के छात्रों ने इस चलन को आगे बढ़ाया. कई तस्वीरों को मिलाकर एक बड़ी तस्वीर बनाने का काम शुरू किया.

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मार्टिन एंगलर कहते हैं कि बेकर दंपति ने अपनी तस्वीरों के जरिए ये संदेश दिया कि किसी की राय किसी एक तस्वीर से नहीं, बल्कि कई तस्वीरों से बनती है. उनके इस संदेश को उनके शागिर्दों ने बख़ूबी समझा और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया.

बेकर दंपति की तर्ज पर ही गर्स्की और थॉमस रफ़ और स्ट्रथ ने कई फ़ोटो को मिलाकर एक बड़ी फ़ोटो बनाने का काम किया. इन सबके काम की एक नुमाइश अगले साल लंदन की हेवार्ड आर्ट गैलरी में लगने वाली है. यानी कैमरे से खींची गई ये तस्वीरें पेंटिंग से मुक़ाबला करेंगी.

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Image caption थॉमस स्ट्रूथ की ये तस्वीर

एंगलर कहते हैं कि जब आप किसी विशाल तस्वीर या पेंटिंग के करीब जाते हो, तो असल में उससे दूर होते जाते हो. क्योंकि पास जाने पर आपको कुछ समझ में नहीं आता. इसीलिए गर्स्की और उनके साथियों के काम की अहमियत बढ़ जाती है. वो छोटी-छोटी तस्वीरों को बड़ा करते हैं. इसके जरिए वो बारीकियों को समझाते हैं.

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