'दंगाइयों से ज्यादा उस दोस्त से शिकायत है'
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मलका बेगम को दंगाइयों से ज़्यादा अपने दोस्त से शिकायत है.

  • 8 मार्च 2017

कुछ ही दिन पहले 2002 में हुए गुजरात दंगों की 15वीं बरसी मनाई गई. 27 फ़रवरी 2002 को गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एक डब्बे में आग लगने से 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी.

उसके बाद से अहमदाबाद और आस-पास के इलाक़े में दंगे भड़के जिनमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1200 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

मरने वालों में ज़्यादातर मुसलमान थे.

गुजरात दंगों और उनसे जुड़े कुछ ख़ास चेहरे जैसे एहसान जाफ़री, ज़किया जाफ़री, ज़ाहिरा शेख़, बिलक़ीस बानू वग़ैरह को हम सभी जानते हैं. भला दंगे के एक शिकार क़ुतुबुद्दीन अंसारी की वो तस्वीर कौन भूल सकता है.

लेकिन गुजरात के अलावा भी कई ऐसे दंगे हुए हैं जो उतने ही भयावह रहे हैं और पुलिस और सरकारों का रवैया क़रीब-क़रीब एक जैसा रहा है.

इसी तरह का एक दंगा बिहार के भागलपुर शहर में अक्तूबर 1989 में हुआ था. अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह पर राममंदिर बनाने के लिए देश भर में रामशिला पूजन का जुलूस निकाला जा रहा था. इसी जुलूस के दौरान भागलपुर शहर में दंगा शुरू हो गया जो कि गांवों तक फैल गया. इन दंगों में भी एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

मलका बेगम भागलपुर दंगे की एक शिकार हैं. मलका बेगम से बात की बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद ने.

मलका बेगम भागलपुर के चंदेरी गांव की रहने वाली हैं. मलका उस समय सिर्फ़ 16-17 साल की थीं.

मलका बेगम का पूरा परिवार उनकी आंखों के सामने मार दिया गया था. उनके गांव के 66 लोग दंगे में मारे गए और उन्हें मारकर एक तालाब में उनके शवों को फेंक दिया गया था. यहां तक की बच्चों को भी दंगाइयों ने नहीं बख़्शा था. तेज़ हथियार से उनके टुकड़े कर दिए गए थे.

मलका कहती हैं कि दंगाइयों ने तलवार से उनपर हमला जिसमें उनकी एक टांग कट गई. दंगाइयों ने उन्हें मरा हुआ समझकर तालाब में फेंक दिया.

मलका कहती हैं कि वो दर्द से इस क़दर तड़प रही थीं कि वो दुआ कर रहीं थीं कि तालाब में कोई सांप उन्हें काट ले और वो मर जाएं ताकि इस दर्द से उन्हें निजात मिले. लेकिन क़ुदरत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था. वो किसी तरह बच गईं.

लेकिन दंगाइयों से ज़्यादा उन्हें अपने उन दोस्तों से शिकायत है जिन्होंने उनको दंगाइयों के हवाले कर दिया.

वो कहती हैं कि दंगे शुरू होने के बाद वो बचपन की अपनी एक दोस्त के पास मदद मांगने गईं.

मलका की हिंदू दोस्त ने न सिर्फ़ भगा दिया बल्कि दंगाइयों को बता दिया कि मलका यहां हैं.

मलका के अनुसार उनकी दोस्त ने चिल्लाकर कहा, ‘’जल्दी आओ, यहां पर भी एक मुसलमनिया छुपी है.’’

उनकी जान तो बच गई लेकिन उसके बाद शुरू हुई एक लंबी क़ानूनी लड़ाई.

वो कहती हैं कि उन्होंने जिन लोगों के नाम लिए थे वो सभी उन्हें डराने धमकाने लगे और जब उनसे भी बात नहीं बनी तो उन्होंने मलका को लालच देना शुरू किया.

मलका कहती हैं कि उन्हें 10 लाख रुपए तक देने की पेशकश की गई लेकिन वो पीछे नहीं हटीं, हालांकि मलका ख़ुद एक बहुत ही ग़रीब परिवार से थीं.

एक तरफ़ जब क़ानूनी लड़ाई चल रही थी मलका ने भारत प्रशासित कश्मीर के एक सैनिक से शादी कर ली.

उनसे दो बच्चे भी हुए. एक बेटी, फ़ातिमा और एक बेटा इम्तियाज़. लेकिन यहां भी शायद उन्हें धोखा ही मिला. शादी के केवल तीन साल बाद उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया और उनके अनुसार वो मुआवज़े के तौर पर सरकार से मिली रक़म भी लेकर भाग गए.

लेकिन इन सारी परेशानियों के बीच भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लड़ाई जारी रखी.

अदालत ने आख़िरकार 16 लोगों को चंदेरी हत्याकांड मामले में सज़ा सुनाई जिसे पटना उच्च न्यायालय ने भी बरक़रार रखा.

अदालत के इस फ़ैसले में मलका बेगम की गवाही का बहुत अहम रोल था.

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