नज़रिया: 'गुजरात चुनाव में कांग्रेस भले हारी, राहुल जीत गए'

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इस गुजरात चुनाव की खासियत क्या है? 22 साल बाद साल 2022 तक गुजरात में बीजेपी काबिज़. ये सच है लेकिन ज़्यादा क़ाबिले ग़ौर बात है राहुल गांधी का क़दम जमाना.

अभी तक 'पप्पू' कहलाने वाले राहुल गांधी से बीजेपी इतना घबरा गई कि पूरी केंद्र सरकार गुजरात का किला संभालने में लग गई. यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपने गढ़ में 34 रैलियाँ करनी पड़ीं.

गुजरात चुनाव सिर्फ़ बीजेपी के जीत के लिए नहीं बल्कि राहुल गांधी के राजनीति में धमक के साथ आने के लिए याद किया जाएगा. ये तो कांग्रेस को भी मालूम था कि वो गुजरात के चुनाव में जीत हासिल नहीं करेगी लेकिन बीजेपी को इतनी कड़ी टक्कर देगी ये किसी ने नहीं सोचा था.

गुजरात में दशकों से सबसे मज़बूत नेता मोदी को अदने से राहुल गांधी ने इतनी कड़ी टक्कर दी जिसके लिए बीजेपी तैयार नहीं थी. 1995 के बाद पहली बार कांग्रेस ने बीजेपी को इतना कड़ा मुकाबला दिया है.

मोदी नहीं, राहुल बदले और बदला ये सब

मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की पूरी सेना के सामने राहुल गांधी काफी हद तक अकेले ही डटे रहे. इस बार न उनका साथ देने के लिए उनकी माँ सोनिया गांधी आईं और न ही उनकी बहन प्रियंका गांधी गुजरात में दिखीं. कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता बाद में चुनाव प्रचार में दिखे. हालांकि, उनकी भूमिका भी अतिथियों जैसी थी.

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नए अंदाज़ में दिखे राहुल गांधी

इस चुनाव में राहुल गांधी की ख़ास बात जो दिखी वो थी उनकी रणनीति और दूसरा उनका व्यक्तित्व. 2014 के लोकसभा चुनाव और बाद के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी के भीतर नेतृत्व क्षमता में कमी साफ़तौर से दिख रही थी लेकिन गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी एक नए अंदाज़ में दिखे.

उनकी पार्टी ने 2012 के मुक़ाबले करीब बीसेक सीटें अधिक जीती हैं. हालाँकि, ये कहना मुश्किल है कि कांग्रेस का अपना जनाधार बढ़ा है या फिर ये तीन युवा नेताओं--हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी--की वजह से हुआ है.

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इसके अलावा, ग़ौर करने की बात है कि राहुल गांधी ने गुजरात के ग्रामीण इलाक़ों में किसानों के बीच ज़ोरदार अभियान चलाया. उन्होंने मूंगफली और कपास किसानों के मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठाया. इसका नतीजा ये हुआ कि ग्रामीण इलाक़ों में कांग्रेस का प्रदर्शन बीजेपी से बेहतर रहा है.

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लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि राहुल शहरी इलाक़ों में मोदी की ध्रुवीकरण की राजनीति की काट नहीं कर सके.

इसके बावजूद, जिस तरह से उन्होंने मोर्चा संभाला और गुजरात के ही नहीं बल्कि देश के सबसे कद्दावर नेता को कड़ी टक्कर दी, उससे तो ये साफ है कि राहुल गांधी को राजनीति के पेंच समझ में आने लगे हैं. इस चुनाव में राहुल गांधी ख़ास अंदाज़ में दिखे जो कि बीजेपी के लिए भी सबक बन सकते थे. कुछ ऐसे ही बातें जिनकी चर्चा सब कर रहे हैं.

भाषा की मर्यादा

गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने अपनी भाषा पर संयम रखा. इस चुनाव में हर तरफ से विवादित बयान बरस रहे थे लेकिन राहुल गांधी इस ट्रैप में नहीं फँसे. राहुल गांधी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी या किसी भी बड़े नेता पर व्यक्तिगत हमला नहीं बोला. हालांकि, बीजेपी नेता और ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी राहुल गांधी पर निशाना साधने से पीछे नहीं हटे.

इस चुनाव में बीजेपी ने राहुल गांधी के धर्म से लेकर मंदिर जाने तक पर प्रहार किया. और तो और प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के समय भी हमला बोला और औरंगज़ेब राज की शुरुआत बताया था. मगर राहुल गांधी तब भी शांत दिखे. साथ ही उन्होंने कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ताओं को साफ हिदायत दी थी कि कोई भी प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर हमला नहीं करेगा.

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मणिशंकर अय्यर पर की कार्रवाई

प्रधानमंत्री मोदी को 'नीच आदमी' कहने वाले कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के विवादित बयान पर राहुल गांधी ने बिना समय खोए कार्रवाई की. उन्होंने फ़ौरन निंदा की साथ ही अय्यर को पार्टी के प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया. राहुल गांधी ने एक तरफ़ अनुशासन का नया उदाहरण पेश किया दूसरी तरफ़ कांग्रेस पार्टी के अंदर बाहर सबको संकेत भी दिया कि उन्हें हल्के में न लिया जाए.

मज़ेदार बात ये भी थी कि बीजेपी ने अभी तक विवादित बयान देने पर किसी नेता के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की है. इस कार्रवाई से राहुल गांधी को वोट मिले या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन उनकी काम ने नई मिसाल ज़रूर पेश की.

जब राउल विंसी कहलाते थे राहुल गांधी

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विकास के मुद्दे

गुजरात मॉडल पर लोकसभा चुनाव जीतने वाली बीजेपी को राहुल गांधी ने विकास के मुद्दे पर ही पकड़ा. चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने गुजरात का चुनाव गुजरात के मुद्दों पर ही लड़ने की कोशिश की. उन्होने अपनी रैलियों में गुजरात विकास पर सवाल उठाए जबकि बीजेपी गुजरात अस्मिता, नीच आदमी, पाकिस्तान, सोमनाथ मंदिर जैसे मुद्दों पर ही दिखी.

स्थानीय मुददों का ज़िक्र प्रधानमत्री मोदी की रैली में शायद एक या दो बार ही हुआ जबकि राहुल ने विकास के मुद्दे पर ही गुजरात को फोकस में रखा. और बीजेपी को जवाब देने के लिए उकसाते दिखे.

गुजरात चुनाव की रणनीति

गुजरात में पाटीदार, आदिवासी, ओबीसी, दलित कांग्रेस और बीजेपी दोनों से नाराज़ चल रहे थे. गुजरात के वोट बैंक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन चारों समुदायों को बीजेपी और कांग्रेस अपने समर्थन में खींचने में लगी थी. इस रेस में राहुल गांधी ने बीजेपी से बाज़ी मारी.

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राहुल गांधी का मंदिरों का लगातार दौरा करके, बीजेपी के हिन्दुत्व के एजेंडे को टक्कर देना भी उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है. गले में रुद्राक्ष की माला पहने, लोगों से मिलते-जुलते, सेल्फ़ी खिंचवाते राहुल गांधी ने बीजेपी की पेशानी में बल डाल दिया है.

गुजरात में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के बाद बीजेपी के समर्थक भी राहुल गांधी की तारीफ़ करते नज़र आ रहे हैं. महाराष्ट्र में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना ने 'नतीजे की परवाह किये बग़ैर गुजरात चुनाव संग्राम लड़ने के लिए' कांग्रेस के नए अध्यक्ष की सराहना की.

राहुल गांधी के पक्ष में क्या और चुनौतियां कैसी?

शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक संपादकीय में लिखा है, 'जब हार के डर से बीजेपी के बड़े-बड़े महारथियों के चेहरे स्याह पड़ गए थे तब राहुल गांधी नतीजे की परवाह किये बग़ैर चुनावी रण में लड़ रहे थे. यही आत्मविश्वास राहुल को आगे ले जाएगा.'

गुजरात चुनाव से एक बात तो तय है कि बीजेपी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के दावे को अब टक्कर मिलने वाली है.

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साथ ही, नए अंदाज़ में राहुल गांधी बीजेपी के लिए समस्या बन रहे हैं. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थक हैं या विरोधी, मगर इस चुनाव में जिस तरह से राहुल गांधी ने अपनी परिपक्व राजनीति का प्रदर्शन किया, उसे किसी तरह से नकारा नहीं जा सकता.

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