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राहुल गांधी का रास्ता बनाएँगे प्रणब मुखर्जी?

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23 जुलाई 2012 14:45 IST

अपूर्व कृष्ण

बीबीसी संवाददाता, लंदन

प्रणब मुखर्जी

क्या प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन राहुल गांधी की राह बनाने के लिए भेजा गया है?

ब्रिटेन में प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित अख़बार 'द टाइम्स' का यही कहना है. टाइम्स ने प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति निर्वाचित होने की खबर की सुर्खी यूँ लगाई है – ‘नए राष्ट्रपति ने अगली गांधी पीढ़ी का रास्ता खोला’.

अख़बार ने प्रणब मुखर्जी के लिए 'फ़िक्सर' और 'पॉवरब्रोकर' जैसे शब्दों का प्रयोग किया है और कहा है कि प्रणब मुखर्जी को जोड़तो़ड़ करके राष्ट्रपति बनाया गया है.

रविवार को हुई मतगणना के बाद प्रणब मुखर्जी को भारत का तेरहवाँ राष्ट्रपति घोषित किया गया है. वे 25 जुलाई को शपथ लेने वाले हैं.

पिछले चार दशकों से केंद्र की राजनीति से जुड़े प्रणब 70 के दशक से अब तक केंद्र में कांग्रेस की या कांग्रेस के नेतृत्व में बनने वाली हर सरकार में मंत्री के पद पर रहे हैं.

यूपीए-2 की सरकार में तो प्रणब मुखर्जी को नंबर दो होने के अलावा सरकार को राजनीतिक संकट से उबारने वाले 'संकट-मोचक' के रूप में देखा जाता रहा है.

प्रणब की भूमिका की चर्चा

अख़बार लिखता है कि भारत के राजनेताओं ने एक अत्यंत दक्ष ‘फ़िक्सर’ को राष्ट्राध्यक्ष बनाकर, सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के लिए गांधी की पाँचवीं पीढ़ी को चुनाव में मतदाताओं के सामने उतारने का रास्ता साफ़ कर दिया.

टाइम्स ने प्रणब मुखर्जी की जीत को इन शब्दों में बयान किया है – "एक पावरब्रोकर और पूर्व कांग्रेसी वित्तमंत्री, 76 वर्षीय प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनवाया गया, चतुराई से की गई जोड़-तोड़ से."

अख़बार लिखता है कि हालाँकि राष्ट्रपति का पद एक रस्मी पद है लेकिन यदि 2014 के चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिसकी कि पूरी संभावना है, तो प्रणब मुखर्जी गठबंधन की बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

टाइम्स साथ ही लिखता है कि उससे पहले, अभी तत्काल, उनकी प्रोन्नति से कांग्रेस अपने आपको एक साल के बाद फिर से राजनीतिक तौर पर पुनर्जीवित कर सकती है, जिस साल में उसका शासन और अर्थव्यवस्था दोनों की गति धीमी पड़ गई.

अख़बार का कहना है – इस बात की पूरी संभावना है कि 42 वर्षीय राहुल गांधी को अब कोई महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा.

टाइम्स लिखता है कि राहुल गांधी चुनाव में जीत दिलवा पानेवाला नेता बन सकने में नाकाम रहे हैं मगर उनके समर्थकों का मानना है कि प्रादेशिक चुनावों मे उनकी नाकामी को तब भुला दिया जाएगा जब उन्हें कांग्रेस का प्रधानमंत्री पद का युवा उम्मीदवार बनाकर उतारा जाएगा. हालाँकि आलोचकों का कहना है, इसके सिवा पार्टी के पास और विकल्प क्या है?

अख़बार ने मनमोहन सिंह सरकार के कामकाज की आलोचना की चर्चा करते हुए पिछले दिनों टाइम पत्रिका में मनमोहन सिंह को – अंडरऐचीवर – करार दिए जाने और राष्ट्रपति ओबामा की उस टिप्पणी का ज़िक्र किया है जिसमें ओबामा ने विदेशी सुपरमार्केट को अनुमति देने जैसे आर्थिक सुधारों को लागू नहीं कर सकने के लिए भारत को झिड़का था.

मगर अख़बार का कहना है कि विशेषज्ञों की राय में सुधारों की राह में असल बाधा प्रणब मुखर्जी थे जिन्होंने विदेशी अधिग्रहणों पर, पहले के समय से टैक्स लगाने जैसे फ़ैसले लिए जिसका असल उद्देश्य वोडाफ़ोन को निशाना बनाना था.

टाइम्स लिखता है कि मनमोहन सिंह, जिन्हें भारत में 20 साल पहले हुए सुधारों का जनक माना जाता है, अब आर्थिक मामलों को अपने हाथ में ले चुके हैं और उम्मीद की जा रही है कि वे प्रणब मुखर्जी के उन फ़ैसलों को बदल देंगे.

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