'मुझे सोनिया गांधी की तरह अपनाया'

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सिर्फ़ 28 साल की उम्र में 2001 में दक्षिणी पश्चिमी इंग्लैंड के शहर ग्लॉस्टर से चुनाव जीतकर हाउस ऑफ़ कॉमन्स में पहुँचने वाले लेबर पार्टी के सांसद परमजीत ढांढा बड़े जोश के साथ बताते हैं कि वे अब भी इंग्लैंड के मुक़ाबले भारतीय क्रिकेट टीम को सपोर्ट करते हैं.

1960 के दशक में पंजाब से लंदन आए माँ-बाप की संतान परमजीत कहते हैं, "मुझे ब्रिटेन से बहुत प्यार है लेकिन मेरे जैसा एक व्यक्ति जिसके माँ बाप भारतीय हों, जो साउथॉल जैसी जगह पला-बढ़ा हो, जो भारतीय टीम को खेलते हुए देखकर बड़ा हुआ हो उसके लिए भारतीय टीम को सपोर्ट करना स्वाभाविक है. यह ठीक वैसे ही है, जैसे वेल्स या आयरिश लोग अपनी टीमों को सपोर्ट करते हैं लेकिन वे फिर भी ब्रिटिश हैं".

इसी वर्ष जून महीने में ब्रितानी संसद के स्पीकर का चुनाव लड़कर और प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन को कैबिनेट में एशियाई मूल के लोगों को न रखने के लिए ललकार कर ढांढा ब्रितानी मीडिया में ख़ासे चर्चा में रहे हैं.

केवल दो बार संसद की सदस्यता के अनुभव के साथ स्पीकर के चुनाव में कूद पड़ने और सांसदों को फ़ेसबुक और ट्विटर अपनाने की सलाह देने वाले ढांढा कहते हैं, "मैं आपको एक राज़ की बात बताता हूँ, मुझे पता था कि मैं जीतने वाला नहीं हूँ. लेकिन मैं बहस जीतना चाहता था, मुझसे कई सांसदों ने कहा कि मैं बहस को जीतने में कामयाब रहा."

परमजीत ढांढा

परमजीत अक्सर भारत जाते रहते हैं

ब्रिटेन की प्रतिष्ठित नॉटिंघम यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद इनफॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी में एमए करने वाले ढांढा 18 साल की उम्र से ही लेबर पार्टी से जुड़े रहे हैं और उन्हें 1997 के चुनाव अभियान में (जब टोनी ब्लेयर पहली बार प्रधानमंत्री बने थे) ज़ोरदार काम करने की वजह से पार्टी के भीतर पहचान मिली.

2001 में ग्लॉस्टर से पार्टी का टिकट मिलने का क़िस्सा सुनाते हुए ढांढा काफ़ी भावुक हो जाते हैं, "मैंने ख़ुद को चिकोटी काटकर देखा कि ये सच ही तो है न. मैंने जल्दी से अपने घर फ़ोन करके पिताजी को बताया कि मैं ग्लॉस्टर का एमपी बनने वाला हूँ, मैंने फ़ोन पर, बैकग्राउंड में, अपनी माँ के रोने की आवाज़ सुनी, ये कुछ ऐसे पल हैं जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता."

ग्लॉस्टर से पार्टी का टिकट मिलना आसान नहीं था क्योंकि वहाँ 95 प्रतिशत से अधिक मतदाता ब्रितानी मूल के गोरे लोग हैं. ढांढा के बारे में कहा गया कि वे विदेशी मूल का व्यक्ति होने के कारण चुनाव नहीं जीत पाएँगे लेकिन लगातार दो बार जीतकर वे अपने आलोचकों को चुप करा चुके हैं.

वे कहते हैं, "मैंने लोगों को बताया कि मैं विदेशी नहीं बल्कि ब्रितानी हूँ. मैं दुनिया की राजनीति पर नज़र रखता हूँ. भारत में लोगों ने जिस तरह सोनिया गांधी को अपने दिलों में एक भारतीय की तरह जगह दी है, उसी तरह ग्लॉस्टर के लोगों ने मुझे अपना प्रतिनिधि माना है."

कठिन परिस्थितियाँ

अपने माता-पिता से बहुत गहरा लगाव रखने वाले ढांढा अपने बचपन के कठिन दिनों आज तक नहीं भूले हैं, "मेरे पिताजी ट्रक चलाते थे और मेरी माँ ईलिंग हॉस्पिटल में फ़र्श पर पोंछा लगाने का काम करती थीं."

भारत में लोगों ने जिस तरह सोनिया गांधी को अपने दिलों में एक भारतीय की तरह जगह दी है उसी तरह ग्लॉस्टर के लोगों ने मुझे अपना प्रतिनिधि माना है

परमजीत ढांढा

वे याद करते हैं, "ट्रेड यूनियन वालों ने मेरी माँ से संपर्क किया, उनसे कहा कि आप मिलनसार हैं हम आपको ट्रेनिंग देंगे आपको काम चलाने भर अँगरेज़ी सिखाएँगे ताकि आप अपने साथी कर्मचारियों के हितों का ध्यान रख सकें. शायद यह मेरे जीवन में राजनीति की शुरूआत थी, मेरे अंदर जो ट्रेड यूनियन वाला हिस्सा है, मज़दूर आंदोलन वाला पक्ष मेरी माँ से मिला है."

1990 के दशक में ट्रक चलाते हुए उनके पिताजी का एक्सीडेंट हुआ जिसके बाद परमजीत ढांढा ने "दूसरे देशों से आकर मेहनत से रोज़ी कमाने में लगे लोगों के काम की स्थितियों में सुधार करने के इरादे से राजनीति में जाने का फ़ैसला कर लिया."

आत्मविश्वास से भरे परमजीत अपनी बात कहने से कभी नहीं चूकते और अपने आत्मविश्वास का सारा श्रेय अपने माता-पिता को देते हैं, "जिस तरह मैं पला बढ़ा हूँ उसी की वजह से मुझमें आत्मविश्वास है. मेरे माता-पिता पंजाब के ग्रामीण खेतिहर इलाक़े से हैं . उन्होंने अपने जीवन में कितना संघर्ष किया, रंगभेद और ग़रीबी का सामना किया, छोटी-छोटी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जीतोड़ मेहनत की. जब आपने अपने माता-पिता को इतना संघर्ष करते हुए देखा हो तो आप बहुत सारी चुनौतियों के आदी से हो जाते हैं."

जड़ों से जुड़ाव

पंजाब में फगवाड़ा के पास चहेरू गाँव है जहाँ से परमजीत ढांढा का परिवार लंदन आया, अक्सर भारत जाने वाले ढांढा अब भी चहेरू गाँव को बहुत प्यार से याद करते हैं कि किस तरह लोग वहाँ चारपाई पर खुले में पेड़ के नीचे सोते हैं.

लेबर पार्लियामेंट्री फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया के सक्रिय सदस्य के तौर पर अक्सर दिल्ली, मुंबई, बंगलौर और हैदराबाद का दौरा करते रहने वाले ढांढा अगले वर्ष ब्रिटेन में होने वाले आम चुनाव के बाद अपने दो छोटे बच्चों और पत्नी को भारत ले जाना चाहते हैं.

अपनी जड़ों से वे कितना जुड़ाव महसूस करते हैं, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं, "जब हम गाँव जाते हैं तो सड़क के किनारे दो तरफ़ बड़े-बड़े पेड़ दिखते हैं, ये पेड़ मेरे पिताजी ने भारत छोड़ने से पहले लगाए थे मानो वे कहना चाहते थे कि मेरी जड़ें यहाँ हैं. मुझे लगता है कि हमें भी पेड़ों की तरह याद रखना चाहिए कि हमारी जड़ें कहाँ हैं. हमें उस पर गर्व होना चाहिए".

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