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यूनिवर्सिटी विशेषः पटना विश्विद्यालय

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली 21वीं सदी की सच्चाईयों से रूबरू हो पाई है, क्या हमारे छात्र नई दुनिया की चुनौतियों का सामना करने को तैयार हैं. इसी पर बीबीसी हिंदी ने छेड़ी है बहस और हमारी टीमें सात विश्वविद्यालयों का दौरा करके लौटी हैं.

शुरूआत हम कर रहे हैं पटना विश्वद्यालय से जहां पहुंचे मणिकांत ठाकुर और ऐशवर्य कपूर. तकनीकी पक्ष संभालने का जिम्मा था रूचिका निंबेकर पर. लेकिन बहस से पहले मणिकांत ठाकुर कुछ बातें बता रहे हैं पटना विश्वविद्यालय के बारे में...

बिहार का 93 साल पुराना पटना विश्वविद्यालय, भारत के सात पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है. विडंबना ही कहेंगे कि अब यह अपने उच्च शिक्षा सम्बन्धी गौरवशाली अतीत का एक खंडहर-सा रह गया है.

वर्ष 1917 में जब इसकी स्थापना हुई थी, तब यह नेपाल, बिहार और उड़ीसा - इन तीनों क्षेत्रों का अकेला विश्व विद्यालय था.

दिलचस्प बात है कि उस समय इस क्षेत्र की मैट्रिक (स्कूल) परीक्षाओं का संचालन भी इसी विश्वविद्यालय के तहत होता था. वर्ष 1952 में पटना विश्व विद्यालय का एक अलग स्वरुप बना. पटना शहर के पुराने 10 कालेजों और पोस्ट - ग्रैजुएट (स्नातकोत्तर) विभागों को एक साथ एक परिसर (कैम्पस) के दायरे में लाया गया.

अंग्रजों के शासनकाल में बनी शानदार इमारतों वाला यह शैक्षणिक कैम्पस गंगा नदी के तट पर स्थित है.

पटना सायंस कॉलेज, कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, पटना कॉलेज, बी. एन. कॉलेज, ला कॉलेज, मगध महिला कॉलेज, ट्रेनिंग कॉलेज, आर्ट कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और पटना विमेंस कॉलेज - ये 10 कॉलेज और कला-विज्ञान सम्बन्धी विभिन्न विषयों के स्नतकोत्तर विभागों वाले ' दरभंगा हाउस ' को मिला कर बना है पटना विश्वविद्यालय.

इनमें पटना सायंस कॉलेज की बड़ी ख्याति रही है. वर्ष 1931 में यहाँ ' इंडियन साइंस कांग्रेस' का आयोजन हुआ था, जिसमें नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक सीवी रमण समेत कई बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने भाग लिया था. सीवी रमण तो यहाँ बाद में भी व्याख्यान देने आए थे.

पंडित राहुल सांकृत्यायन और सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे प्रकांड विद्वानों को भी यहाँ उस समय व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था.

लगभग 40 वर्षों तक इस विश्व विद्यालय में इतिहास के शिक्षक रहे डॉ. सुरेन्द्र गोपाल उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "एक वो समय था जब प्राचीन इतिहास और संस्कृति विभाग के प्रख्यात शिक्षक प्रो. अल्तेकर, जानेमाने इतिहासकार प्रो. रामशरण शर्मा, प्रो. सय्यद हसन अस्करी, और प्रो. के.के दत्त, राजनीति शास्त्र के विद्वान प्रो. मेनन, प्रो, फिलिप्स और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बाथेजा जैसे शिक्षक पटना विश्व विद्यालय की गरिमा में चार चाँद लगा रहे थे."

इस विश्वविद्यालय की ये जो गौरवशाली परंपरा थी, वो सत्तर के दशक में 'आपात काल' के बाद खंडित-सी होने लगी. लंबी-लंबी हड़तालें, परीक्षाओं में नक़ल और कैम्पस में तोड़-फोड़ जैसी अराजक गतिविधियाँ हावी हो गईं .

यहाँ पठन-पाठन का माहौल राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के बीच इस तरह बिगड़ना शुरू हुआ कि फिर इस कैम्पस की पुरानी गरिमा वापस नहीं लौट सकी.

कवियों की भाषा में कहें तो अब यहाँ के माहौल में सृजन से ज़्यादा संहार नज़र आता है.