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विकास का शिकार बना किसान?

पिछले हफ़्ते उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के पास अपनी ज़मीनों के मुआवज़े से असंतुष्ट हज़ारों किसान सड़कों पर उतर आए. हिंसा भड़की, पुलिस ने गोली चलाई, दो किसान मारे गए और और पुलिस वाले की भी मृत्यु हो गई. लेकिन ये अपनी तरह की पहली घटना नहीं है.

सिंगूर, नंदीग्राम से लेकर दादरी के किसान अपनी ज़मीनें बचाने के लिए या बेहतर मुआवज़े के लिए लगातार सड़कों पर उतरे हैं. उधर आदिवासी समाज की भी शिकायत है कि विकास के नाम पर उन्हें उनकी ज़मीन और जंगलों से बेदखल करके उद्योगपतियों को वहाँ लाया जा रहा है.

क्या ये विकास की आवश्यक परिणति है या किसानों को ज़मीन से हटाने की साज़िश?