अंतरराष्ट्रीय प्रसारण के 80 साल

 बुधवार, 29 फ़रवरी, 2012 को 12:58 IST तक के समाचार

अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टिंग के 80 साल...

  • बीबीसी की एम्पायर सेवा

    पहला दिन:

    बीबीसी की एम्पायर सेवा साल 1932 दिसंबर में नई शॉर्ट वेव तकनीक पर शुरू की गई थी. बीबीसी के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल जॉन रीथ ने 12 मिनट का एक संदेश साढ़े पंद्रह घंटों में अलग-अलग जगहों के समयानुसार पांच बार लाइव पढ़ा.

  • बीबीसी की एम्पायर सेवा

    एम्पायर सेवा के शुरू होने के छह दिनों बाद प्रसारण की परंपरा ने जन्म लिया, क्रिसमस के राजसी संदेश का.

    ये संदेश किंग जॉर्ज पंचम ने सैन्ड्रीघम स्थित नॉरफ्लॉक रिट्रीट से पढ़ा.

    जॉन रीथ ने अपनी डायरी में तब लिखा कि ये बीबीसी इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है. (फ़ोटो: गेट्टी)

  • बीबीसी की एम्पायर सेवा

    चार्ल्स डी गॉल ने अधिवासित फ्रांस को संबोधित किया:

    फ्रांस की सरकार ने साल 1940 में जर्मनी के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. ‘फ्री फ्रांस’ के नेता जनरल चार्ल्स डी गॉल ने ब्रॉडकास्टिंग हाउस के बी-2 स्टूडियो से अधिवासित फ्रांस को संबोधित किया.

    बीबीसी स्टाफ को बताया गया था कि सेना के कोई जनरल आएंगे. जनरल का संदेश रिकार्ड नहीं किया जा सका और उन्हें वो कई बार दोहराना पड़ा.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    विदेशी सेवा:

    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एम्पायर सेवा के नाम में बदलाव आया, इसे साल 1939 नवंबर में विदेशी सेवा का नाम दिया गया. इसी के साथ अपना दायरा बढ़ाते हुए बीबीसी ने अरबी, स्पैनिश, जर्मन, इतालवी, फ्रेंच, अफ्रीकी और पुर्तगाली भाषाओं में सेवाएं शुरू की.

    साल 1940 के अंत तक बीबीसी 34 भाषाओं में प्रसारण कर रहा था. हर दिन 78 समाचार प्रसारित किए जाते थे. बीबीसी ने हिन्दी, आइसलैंडिक, अल्बेनियाई, और बर्मीस भी नई भाषाई सेवा के तौर पर शुरू की.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    वाक्युद्ध:

    बीबीसी के दफ्तर ब्रॉडकास्टिंग हाउस, ऑक्सफर्ड स्ट्रीट और सीनेट हाउस में स्थापित किए गए. जैसे जैसे ब्रितानी सरकार ने ब्रॉडकास्टिंग का महत्व समझा, बीबीसी विदेशी सेवा का मनोबल बढ़ता चला गया.

    साल 1941 के अंत तक इसके 1400 से अधिक कर्मचारी थे. उस साल डर्बी के सांसद फिलिप नोएल बेकर ने संसद में एक बहस में कहा, “जब मै कहता हूं कि यूरोप के लोगों तक पहुंचने का सबसे कारगर तरीका ब्रॉडकास्टिंग है तो मुझे नहीं लगता कि कोई सांसद मुझसे असहमत होगा.”

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    साल 1940 दिसंबर में ब्रॉडकास्टिंग हाउस के बाहर एक बम विस्फोट में ईमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई.

    जल्दबाज़ी में यूरोपीय सर्विस लंदन के उत्तर-पश्चिमी इलाके मेदा वैले में स्थानांतरित कर दी गई. साल 1941 में वो फ्लीट हाउस स्थित बुश हाउस में चले गए, जो कि तब के ब्रितानी अख़बार उद्योग का गढ़ माना जाता था, उस समय ईमारत का किराया था तीस पाउंड.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    विजय के लिए ‘V’ का चिन्ह:

    जनवरी साल 1941 में बेल्जियन फ्रेंच सर्विस के निदेशक विक्टर डी लावेलये ने बेल्जियन श्रोताओं को देश पर कब्जा करने वाली ताकतों के खिलाफ प्रतीक के तौर पर ‘V’ चिन्ह का प्रयोग करने पर बढ़ावा दिया.

    जल्द ही बेल्जियम, नीदरलैंड और फ्रांस में दीवारों पर ये चिन्ह आम हो गए.

    बाद में उसी साल चर्चिल ने इस चिन्ह का 19 जुलाई, 1941 के अपने चर्चित भाषण में प्रयोग किया.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    प्रतिरोध करने वालो की मदद-

    अपने देशों पर विदेशी कब्जा होने से रोकने के लिए यूरोप में जब लोग प्रतिरोध कर रहें थे, तब बीबीसी की यूरोपीय सेवा उन तक खूफिया संदेश पहुंचाता रहा. ये संदेशों की शब्दावली बड़ी ही अजीब थी, जिनसे आम लोगों के लिए कोई सीधा मतलब नहीं निकलता था.

    इन शब्दों में संदेश छुपे होते थे, जिनका मतलब आम तौर पर होता था कि लोग या दस्तावेज़ सही स्थान पर पहुंच गए, विदेशी सेना के खिलाफ विद्रोही कार्रवाई जारी है या रोकी गई.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    युद्ध रेखा में-

    बीबीसी के युद्ध संवाददाता, जैसे कि इस तस्वीर में दिखने वाले सीडी एडमसन अपनी रिपोर्ट युद्धभूमी से डिस्क में रिकार्ड करके भेजते थे. एक अन्य युद्ध संवाददाता गॉडफ्री टैलबॉट ने साल 1942 में संयुक्त ताकतों की पहली जीत कवर की थी. उन्होंने एक ट्रक को रिकॉर्डिंग स्टूडियो में तब्दील कर दिया था.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    पूर्वी देशों में ब्रॉडकास्ट

    साल 1946 में ब्रितानी विदेश मंत्रालय ने बीबीसी को रूसी सर्विस शुरू करने को कहा और इसके ठीक एक महीने बाद ये शुरू हुआ. शुरुआत में रूसी श्रोता प्रसारण को आज़ादी से सुन सकते थे, लेकिन शीत युद्ध के शुरू होने का बाद क्रेम्लिन सत्ता प्रसारण में व्यवधान उत्पन्न कराने लगी. साम्यवादी ताकतें प्रसारण को अकसर जाम कराने लगी, जिसके जवाब में वर्ल्ड सर्विस ने ट्रांसमीटर की ताकते बढ़वा दी.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    साल 1956 में सोवियत सेना ने हंगेरियाई विद्रोह को दबाया था. उस समय बीबीसी की हंगेरियाई सर्विस ने उन शरणार्थीयों के संदेश प्रसारित किए जो हंगरी छोड़ कर ब्रिटेन चले गए थे.

    शरणार्थियों अपना नाम कोड में परिवर्तित कर लेते थे ताकि हंगेरियाई अधिकारी उनको पहचान नहीं सके.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    रेडियो उपयोग को बढ़ावा-

    1960 के दशक ने रेडियो के विकास का दौर देखा, ये बैटरी चालित पोर्टेबल रेडियो सेट के बढ़ावे के जरिए संभव हो पाया था.

    साल 1955 और 1965 के बीच पूर्वी यूरोप में रेडियो की बिक्री तीन गुना बढ़ गई, जबकि मध्यपूर्व, चीन, अफ्रीका और भारत में भी रेडियो मालिकों की संख्या में तेज़ बढ़ोत्तरी हुई. (फ़ोटो: गेट्टी)

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    जॉर्जी मार्कोव

    साल 1978 की बात है जब बीबीसी बल्गेरियन सर्विस के एक पत्रकार जॉर्जी मार्कोव बुश हाउस में स्थित अपने दफ्तर पर आ रहे थे. दोपहर का समय था और सड़क पर काफी भीड़ थी. मार्कोव को अपने पैर में तेज़ दर्द महसूस हुआ, उन्होंने पीछे मुड़कर देखा कि एक आदमी सड़क पर गिरा छाता उठा रहा था. मार्कोव की तबीयत उसी दिन काफी खराब हुई और तीन दिन बाद उनकी मौत हो गई.

    मेडिकल जांच में पता चला कि मार्कोव के जांघ में एक छोटी सी गोली लगी थी. मार्कोव को लगी उस गोली में दो छेद थे जिनमें जहर पाया गया. बाद में ये पता चला था कि खूफिया रूसी पुलिस दल केजीबी ने एक ऐसा ही छाता बनाया था जिससे जहर लगी छोटी गोलियां दागी जा सकती थी. (फ़ोटो: गेट्टी)

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    वात्स्लाव हैवेल-

    शीत युद्ध के दौरान ‘आयरन कर्टेन’ यानि कि लौह पर्दे के पीछे से रिपोर्टिंग करना कितना कठिन था इसका अंदाज़ा चेक लेखक वात्स्लाव हैवेल से किए गए बर्ताव से ही पता चलता है. सोवियत शासन खत्म होने के बाद वात्स्वाल चेक गणराज्य के राष्ट्रपति भी बने.

    वात्स्लाव को चुप कराने के लिए अधिकारियों ने उन पर टेलिफोन के प्रयोग करने पर भी पाबंदी लगा दी. खुफिया पुलिस उनकी निगरानी भी करने लगी.

    हालांकि बीबीसी की चेक सर्विस इस प्रतिबंध के बावजूद स्थानीय पोस्ट ऑफिस के जरिए उनका साक्षात्कार करती रही. (फ़ोटो: गेट्टी)

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    फॉल्कलैंड विवाद

    साल 1982 में जब अर्जेंटिना ने फॉल्कलैंड पर आक्रमण किया तब बीबीसी का कार्यक्रम ‘कॉलिंग द फॉल्कलैंड्स’ स्थानिय निवासियों के लिए एक लाइफ लाइन बन गया. सुएज़ विवाद मामले की ही तरह इस बार भी बीबीसी आलोचना का शिकार हुआ.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    'बीबीसी सुनना जरूरी' -

    बीबीसी ने अनजाने में रूसी खुफिया सेवा के अधिकारियों को भी शिक्षित करने में भूमिका निभाई. केजीबी के एक डबल एजेंट, ओलेग गोर्डाइवस्की ने आदेश दिया था कि अंग्रेज़ी भाषा में काम करने वाले रूसी जासूस एक परंपरा के तौर पर अंग्रेज़ी सीखने की शुरुआत वर्ल्ड सर्विस न्यूज़ सुनकर करे, लेकिन इससे पहले टेप से रूस विरोधी समझी जाने वाली चीज़ों को हटाए जाने को जरूरी बनाया गया.

    उन्होंने कहा, “सोवियत यूनियन में बीबीसी का महत्व नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. बीबीसी हमारे लिए एक यूनिवर्सिटी जैसा था.”

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    नया दौर-

    इतिहास के पन्नों से गुजरते हुए बीबीसी ने 68 भाषाओं में प्रसारण किया. इन में से माल्टियाई, गुजराती, जापानी, वेल्श जैसी कई भाषाएं आई और गई. बर्लिन में नाज़ी सत्ता के गिरने के बाद पूर्वी यूरोप में नए दौर की शुरूआत हुई हालांकि इसके बाद वर्ल्ड सर्विस पहले की तरह इलाके का लाइफ लाइन नहीं रहा. नतीजतन कई यूरोपीय भाषाई सेवाओं को बंद कर दिया गया. इसके बाद भी अन्य इलाक़ों में कटौतियां जारी रहीं जिसके बाद अब वर्ल्ड सर्विस कुल 28 भाषाओं में सेवाएं प्रदान करता है, इनमें से कई सिर्फ ऑनलाइन रह गए है. (फोटो: गेट्टी)

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    दुनिया को देखने की एक खिड़की

    बीबीसी वर्ल्ड सेवा रेडियो नज़रबंदी में रह रहे या अपहृत लोगों के लिए एक बाहरी दुनिया को देखने का एक प्रमुख स्रोत रहा है. चरमपंथी समूह इस्लामिक डॉन ने साल 1986 में विशेष राजदूत टेरी वाइट, पत्रकार जॉन मैकार्टी और शोधकर्ता ब्रायन कीनन का लेबनान में अपहरण कर लिया था. टेरी वाइट ने कहा, “मै बीबीसी वर्ल्ड सर्विस को रोज़ाना सुनता हूँ. मैने अपने भाई जॉन को बीबीसी के आउटलुक कार्यक्रम में बोलते सुना. ये मेरे लिए बड़ी बात थी, क्योंकि उससे मुझे अपने परिवार के बारे में सूचना मिली.” (फ़ोटो: एएफपी/गेट्टी)

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    “बीबीसी सबसे बढ़िया”

    अगस्त 1991 में जब मिखाइल गोर्बाचोव को नजरबंद कर लिया गया था उस समय बाहरी दुनिया से उनका सम्पर्क केवल विदेशी रेडियों सेवाओं के जरिए था. वर्ल्ड सर्विस के एक पूर्व महानिदेशक जॉन टूसा एक पत्रकार समारोह को याद किया जिसमें गोर्बाचोव ने कहा था कि बीबीसी सबसे बढ़िया सुनाई देता है.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    11 सितंबर साल 2001 में जब न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ उस समय आम तौर पर शांत रहने वाले बुश हाउस के न्यूज़रूम में अफरा तफरी मच गई थी.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    समाचार का प्रमुख स्रोत

    साल 2011 में अरब क्रांति के दौरान सोशल मीडिया पत्रकारों के लिए खबरों के स्रोत के तौर पर सामने आया. प्रत्यक्षदर्शियों ने अलग अलग इलाकों से खबरें, तस्वीरे और वीडियो भेजी.

    सोशल मीडिया के प्रयोग का दोहरा असर हुआ, एक तो ये कि सोशल मीडिया सूचनाएं इक्ठ् करने के लिए एक अहम स्रोत बना. दूसरा ये कि इन जानकारियों के प्रसारण से लोग खबरों की जड़ों तक पहुंचे.

    सोशल मीडिया अभी भी बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के खबरें जुटाने के स्रोत और उसे वापस प्रकाशित करने की प्रक्रिया में अहम भागीदार है.

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    आंग सान सूची

    साल 2012 नवंबर में जनतंत्र समर्थक नेता आंग सान सूची को बर्मा में नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया था.

    उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि नज़रबंद रहने के दौरान वो बीबीसी वर्ल्ड सर्विस सुनती थी. सूची ने बताया कि उन्हे बीबीसी का एक संगीत कार्यक्रम काफी पसंद था. (फ़ोटो: गेट्टी)

  • बीबीसी वर्ल्ड सेवा

    ब्रॉडकास्टिंग हाउस में वापस-

    साल 2012 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस 71 साल बाद ब्रॉडकास्टिंग हाउस में वापस जा रहा है. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पत्रकार बाकी बीबीसी परिवार के साथ एक जगह पर काम करेंगे.

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