मेहदी हसन का जाना

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Image caption दुनिया को अलविदा कह गए मेहदी हसन.

ये एक घिसा पिटा जुमला है लेकिन कहना पड़ेगा कि मेहदी हसन के निधन के साथ ही वाकई एक अध्याय का अंत हो गया है.

वो दक्षिण एशिया के बहुत बड़े गायक थे.

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उन जैसी गायकी और उन जैसी समझ रखने वाला अब कोई नहीं दिखता. जब तक वो जिंदा थे, तब भी ऐसे लोग कम ही दिखते थे जो ग़ज़ल की बारीकियों को समझते हों. मसलन ग़ज़ल क्या है, ग़ज़ल को कैसे गाना चाहिए, कौन-कौन से राग हैं जिनमें आप अच्छी ग़ज़ल गा सकते हैं और किन रागों से परहेज़ करना चाहिए.

मेहदी हसन को ग़ज़ल गाते वक्त एक राग से दूसरे राग में जाने और हर राग को बखूबी निभाने में महारथ हासिल थी.

ग़ज़ल के भाव को समझ कर उसे गाना आसान नहीं होता. इसमें पेचीदगियां आती हैं. बहुत से गायक कोई भी गजल चुन लेते हैं और उसे गाने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता.

ग़ज़ल की बारीकियां

एक बार मेहदी हसन ने मुझे मिसाल देते हुए बताया कि ग़ालिब की एक गजल है, दिल ही तो है, न संगो ख़िस्त, दर्द से भर न आए क्यों, रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें रुलाएं क्यों.

ख़िस्त का मतलब है ईंट और ये शब्द त पर खत्म होता है, लेकिन इसे आसानी गाने में नहीं ढाल सकते, क्योंकि पंक्ति के आखिर में स्वर पर खत्म होने वाले शब्दों को गाना आसान है लेकिन जो व्यंजन पर खत्म होते हैं उन्हें गाना मुश्किल है.

स्वरों पर खत्म होने वाले शब्दों में गायकी के रंग दिखाए जा सकते हैं लेकिन ख़िस्त जैसा शब्द त पर खत्म होता है और ये कलाकारी दिखाने के लिए अपने पीछे कुछ नहीं छोड़ता. इसीलिए ग़ज़ल को चुनना आसान काम नहीं है.

मेहदी हसन इन तमाम बारीकियों को समझते थे और वहीं बातें उनकी गायकी को खूबसूरत बनाती थीं. लोग भी उसे सराहते थे, भले उन्हें गजल और उसकी बारीकियों के बारे में ज्यादा न पता हो. ठीक वैसे ही जैसे आपको खाना बनाना भले न आता हो, लेकिन अच्छा खाने के ज़ायके को तो सराह सकते हैं.

ग़ज़ल का भविष्य

Image caption मेहदी हसन का परिवार राजस्थान के लुना गांव से है और इस गांव में ही उनके पिता की कब्र है.

मेहदी हसन का जाना इसलिए भी सालता है कि अब ग़ज़ल को गाने वाले ऐसे लोग नहीं दिखते हैं. ग़ज़ल के पुराने शौकीनों को दिल बहलाने के लिए आज भी मेहदी हसन या गुलाम अली साहब की 15-20 साल या उससे पुरानी गज़ल़ों को सुनना पड़ता है. ग़ज़ल में नया कुछ नहीं आ रहा है.

मेहदी हसन साब को सुन कर बहुत से लोग ग़ज़ल गायक बने हैं. इनमें जगजीत सिंह और हरिहरन जैसे गायकों के नाम आते हैं. साथ ही तलत अजीज भी हैं.

मेहदी हसन प्रेरणा के एक बड़े स्रोत रहे हैं. लेकिन दुर्भाग्य है कि अब शायद ग़ज़ल गाने का उतना चलन नहीं रहा. आज ग़ज़ल गाने वाले और अच्छी ग़ज़ल गाने वाले बहुत कम हैं.

कुछ लोग कोशिश कर रहे हैं. ग़ज़ल गा रहे हैं, लेकिन सच यही है कि अच्छी ग़ज़ल गाने वाले अब हैं नहीं. अगर हैं भी तो वैसे मेहदी हसन या गुलाम अली जैसा रुतबा हासिल नहीं कर पाते.

मुफलिसी के आखिरी दिन

मेहदी हसन के आखिरी दिन बहुत मुश्किलों और मुफसिली वाले रहे, जो एक विडंबना है.

ये सही है कि वो बहुत लोकप्रिय गायक रहे जिससे उन्हें दौलत भी खूब मिली.

पाकिस्तान और भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप, मध्यपूर्व और अमरीका में उन्हें पसंद किया जाता था. लेकिन दक्षिण एशिया के पारंपरिक या घरानों वाले गायकों में आम तौर पर समस्या ये होती हैं कि वे उन्हें वित्तीय प्रबंधन नहीं आता. इसीलिए उन्हें आखिरी दिनों में मुफलिसी का सामना करना पड़ा.

दूसरा पाकिस्तान जैसे मुल्क में, जिसे उन्होंने इतना कुछ दिया है, लेकिन वहां कलाकार की इतनी इज्ज्त नहीं है जैसे भारत या दूसरे देशों में है.

ये बेहद अफसोस की बात है कि क्योंकि पाकिस्तान से इतने अच्छे अच्छे गायक आते. कई बार तो ऐसे गायक आपको भारत में भी नहीं मिलते. लेकिन पाकिस्तान उनकी कदर करना नहीं जानता. इसलिए मेहदी हसन साहब को भी आखिरी दिनों में परेशानियों का सामना करना पड़ा.

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