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वैलंटिनो के आकर्षण और नेपोलियन के दर्प का रूप थे 'राजेश खन्ना'

साल 1973, जगह बंबई का नटराज स्टूडियो जहां उमस भरी गर्मी की दोपहर में सुबह के 10 बजे एक फिल्म के सेट पर इंतज़ार हो रहा है सुपरस्टार राजेश खन्ना का.

जैक पिज़्जी कहते हैं कि ये वो दौर था जब राजेश खन्ना की फिल्मों के पोस्टरों में उनका नाम नहीं लिखा जाता है क्योंकि उनका नाम बच्चे-बच्चे की ज़बान पर था.

पिज़्जी के मुताबकि राजेश खन्ना एक करिश्माई हीरो थे जिनमें रुडोल्फ वैलंटिनो का आकर्षण और नेपोलियन का अहंकार था.

सेट पर स्पॉट ब्वॉय से लेकर निर्देशक तक सभी राजेश खन्ना का इंतज़ार कर रहे हैं.

'' हम अपने हीरो का इंतज़ार कर रहे हैं. सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वो इतने बड़े स्टार हैं कि एक साथ 10-12 फिल्मों में काम करते हैं, जिस कारण अक्सर देर हो जाती है. लेकिन मैं काफी निराश हूं...उनके आने पर उनसे इस बारे में ज़रूर बात करुंगा, मैंने फिल्म शुरु करने से पहले उनसे कह दिया था कि या तो समय पर आएं या फिल्म छोड़ दें''.

राजेश खन्ना जिस दौर में हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार बने थे, उस दौर में पर्दे पर चुंबन लेना भी गलत माना जाता था, लेकिन राजेश खन्ना पूरे देश में 'प्यार' का जितना विस्तार किया उतना भारत में कामसूत्र भी नहीं कर पाया था.

और शायद यही वो वजह है कि उनका देर से सेट पर आना भी माफ कर दिया जाता था.....

''हम सब काफी परेशान हुए क्योंकि आपके कारण हमारे काम का नुकसान हुआ लेकिन अब सब ठीक है, भूल जाओ....और अच्छा शॉट दो.....''