पूर्वजों के लिए पिंडदान की परंपरा

 शनिवार, 20 अक्तूबर, 2012 को 10:27 IST तक के समाचार

बिहार के गया जिले में श्राद्ध से संबंधित तस्वीरें

  • गया, पिंडदान
    किसी सुदूर प्रदेश से परिवार के साथ बिहार के गया शहर आए लोग कर्मकांड से निवृत होकर नदी किनारे अपना कुछ समय बिताते हैं. इन्हें विश्वास है कि गया में तर्पण और पिंडदान के बाद इनके मृत परिजनों की आत्मा को शांति मिलती है. (सभी तस्वीरें: मणिकांत ठाकुर, बीबीसी संवाददाता)
  • गया
    सत्रहवीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इस विष्णुपद मंदिर का निर्माण कराया. स्वर्ण कलश वाले सौ फ़ीट ऊंचे मंदिर के दोनों गुम्बद दूर से ही दिख जाते हैं.
  • गया
    मंदिर की बाहरी बनावट में भी स्थापत्य यानी वास्तुकला की विशिष्ट झलक मिलती है. खासकर इसके स्लेटी रंग-रूप में काली घटा जैसी कुदरती छटा दिखती है.
  • गया
    देश के विभिन्न राज्यों से आए हुए लोग यहाँ अपने पितरों के मोक्ष या मुक्ति के लिए पिंडदान के बाद मंदिर की परिक्रमा करते हैं.
  • गया
    मंदिर परिसर में पिंडदान की प्रक्रिया दिन भर चलती रहती है, इसलिए गया के पंडा-पुजारी अपने-अपने यजमानों के साथ ख़ासे व्यस्त नज़र आते हैं
  • गया
    पितृपक्ष के दौरान मंदिर के अंदरूनी हिस्से में पूजा-पाठ के लिए पिंड दानियों की भीड़ पूरे पंद्रह दिनों तक उफान पर होती है.
  • गया
    विष्णुपद यानी भगवान् विष्णु का 'पदचिन्ह' इस मंदिर के गर्भ गृह का मुख्य आकर्षण है. एक शिलाखंड पर उभरे 40 सेंटीमीटर के इस पदचिन्ह को श्रद्धालु अपने आराध्य देव विष्णु के ही पाँव का निशान मानते हैं.
  • गया
    इसबार पितृपक्ष मेले में बिहार से बाहर के चार लाख से अधिक लोगों के पहुँचने का अनुमान लगाया गया था. इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और नेपाल के लोगों की तादाद ज्यादा बताई गई.
  • गया
    राजस्थान के चुनिंदे शिल्पियों ने ग्रेनाइट के बड़े-बड़े शिलाखंडों को जोड़कर और कलात्मकता से सजाकर इस मंदिर को भव्य आकार दिया है.
  • गया
    विष्णुपद मंदिर से बिल्कुल सटकर बहने वाली फल्गू नदी के बीच बालू पर अलग -अलग झुंडों में श्राद्ध कर्म और पिंडदान के अदभुत दृश्य नज़र आते हैं.
  • गया
    फल्गू नदी को अन्तःसलिला यानी अन्दर-ही-अन्दर बहने वाली नदी कहा जाता है. इसलिए कहीं -कहीं छिछले पानी के बीच उभरी बालू-मिट्टी पर ही बैठकर लोग पिंडदान कर लेते हैं.

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