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साहित्य में हाशिए की आवाज छूट गई हैः राजेंद्र यादव

अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर राजेंद्र यादव को लेखक, संपादक और विचारक के अलावा विमर्श, बहसों और असहमतियों का पैरोकार माना जाता है.

राजेंद्र यादव ने हिंदी साहित्य में स्त्री, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी आवाजों को नई ऊंचाइयां दीं. वे कहते हैं कि हमारा साहित्य कुलीन लोगों का साहित्य रहा है. इसमें हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज छूट गई है.

आलोचकों का मानना था कि उन्हें विवाद प्रिय हैं. हनुमान पर की गई अपनी टिप्पणी 'रावण के दरबार में हनुमान पहला आतंकवादी था', के लिए उनपर मुकदमे चले और धमकियां भी मिलीं.

'हंस' पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव को गुलजार के गीत बेहद पसंद आते रहें. खामोशी फिल्म का गीत, हमने देखी है उन आंखों की... सुनते ही वे सब भूल जाते थें.

मीता, मन्नू भंडारी, हेमलता तीन स्त्रियों को राजेंद्र यादव अपने जीवन को आकार देने वाला माना.