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शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी से ख़ास बातचीत

उर्दू के मशहूर आलोचक और लेखक शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी के उपन्यास 'कई चांद थे सरे आसमां' ने हिंदुस्तानी साहित्य की दुनिया में लोकप्रियता का एक नया मक़ाम हासिल कर लिया है.

19वीं सदी के भारतीय जीवन, उसके आर्थिक-सामाजिक पहलू, संस्कृति की जीवंत तस्वीर बयां करती इस रचना को पढ़ना उस दौर की बारीक से बारीक जानकारियों से होकर गुज़रना है जिसे एक संघर्ष नायिका वज़ीर ख़ानम की कहानी के ज़रिए प्रस्तुत किया गया है.

मूलत: अंग्रेज़ी साहित्य के छात्र रहे फ़ारुक़ी साहब ने 19वीं सदी के उर्दू अदब और परंपरा को ठीक से समझने के लिए पहले आलोचना विधा में अपनी पैठ बनाई और फिर कहानीकार बने.

उनकी रचनाओं में 'शेर, ग़ैर शेर, और नस्र (1973)', 'गंजे-सोख़्ता (कविता संग्रह)', 'सवार और दूसरे अफ़साने (फ़िक्शन)' और 'जदीदियत कल और आज (2007)' शामिल हैं.

उन्होंने उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर मीर तक़ी मीर के कलाम पर आलोचना लिखी जो 'शेर-शोर-अंगेज़' के नाम से तीन भागों में प्रकाशित हुई.

पाकिस्तान के तीसरे सबसे बड़े पुरस्कार सितारा-ए-इम्तियाज़ और भारत में सरस्वती सम्मान से सम्मानित फ़ारुक़ी साहब बुधवार को 79 वर्ष के हो गए हैं. कुछ दिन पहले बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी ने उनसे ख़ास बातचीत की थी.