ममता बनर्जी
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क्या देश को मिलेगा पहला 'बांग्ला' प्रधानमंत्री?

तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता फुसफुसाकर कहते हैं- मंत्री तो वे हैं ही. मुख्य के बाद प्रधान, बस इतना ही होना बाक़ी है.किनारी वाली सफ़ेद सूती साड़ी लपेटे, हवाई चप्पल फटकारती ममता ख़ुद इस बारे में कुछ नहीं कहतीं. उन्हें एहसास है कि मुख्य से प्रधान का फ़ासला दरअसल उतना छोटा या आसान नहीं है.

तभी वे ये कहते हुए रुक जाती हैं कि तृणमूल की आवाज़ इस बार दिल्ली में ज़्यादा बुलंद होगी. दिल्ली की सरकार इस बार हम तय करेंगे. बंगाल तय करेगा.

लेकिन ऐसी स्थिति बने, उससे पहले तृणमूल कांग्रेस को अधिक से अधिक लोकसभा सीटें चाहिए. 42 सांसद पश्चिम बंगाल से चुनकर आते हैं और बंगाली संवेदना की गठरी बग़ल में दबाए ममता को लगता है कि इस बार उन्हें 30 सांसद मिल जाएंगे. सन् 2009 के मुक़ाबले 11 अधिक.

राजनीति का गणित अब काफ़ी जटिल हो चुका है, जबकि ममता बनर्जी कभी गणित की विद्यार्थी नहीं रहीं. ऐसे में दिल्ली के ताज पर उनकी दावेदारी कितनी मज़बूत है? मधुकर उपाध्याय का विश्लेषण.