पहला विश्व युद्ध: सिख सैनिकों का साहस

  • 4 अगस्त 2014

प्रथम विश्व युद्ध में भारत के बहुत सारे सैनिक ब्रितानी फ़ौज का हिस्सा बन कर विदेशों में लड़ने गए थे.

उस दौर के सिख सैनिकों की कहानी, तस्वीरों की जुबानी देखिए. ये तस्वीरें पंजाब डिजिटल लाइब्रेरी ने डिजिटाइज़ की हैं.

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पंजाब अंग्रेज़ों के लिए भर्ती के लिहाज से अहम राज्य था. जहां कहीं भी प्रथम विश्व युद्ध लड़ा गया सिख फौजी ब्रितानी फौज का हिस्सा बनकर वहां मौजूद रहे. 'फर्स्ट राजिंदर सिख इन्फैंट्री' के घायल सैनिक गल्लिपोली के एलेक्ज़ेंड्रिया अस्पताल के बाहर खड़े हैं. गल्लिपोली में ऑटोमन साम्राज्य (आधुनिक तुर्की) के ख़िलाफ़ एलाइड फोर्सेज़ ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जंग लड़ी. एलाइड फोर्सेज़ की यह मुहिम समुद्र और ज़मीन पर नाकामयाब रही.

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बॉम्बे की बंदरगाह पर पटियाला रियासत की फ़ौज समुद्री जहाज़ में सवार होती हुई. तस्वीर में घोड़े हैं और बैलगाड़ियाँ हैं. सवाल है कि ये घोड़े और बैलगाड़ियाँ सामान छोड़ने आए थे या फिर फ़ौज के साथ गए थे. घोड़ों की गिनती से लगता है कि ये भी इस मुहिम का हिस्सा थे.

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घर के बड़े अपने लड़के को तांगे तक छोड़ने आए हैं जो तस्वीर में नहीं हैं. यह लड़का ब्रितानी फ़ौज में भर्ती हो चुका है और जंग लड़ने जा रहा है. इस लड़के की पोती का पति ये तस्वीर लेकर पंजाब डिजिटल लाइब्रेरी के पास आया था. पंजाब डिजिटल लाइब्रेरी से इसमें शामिल लोगों के नाम खो गए. यह तस्वीर 1914 में पंजाब के होशियारपुर ज़िले के किसी गाँव में खींची गई थी.

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प्रथम विश्व युद्ध में इंग्लैंड ने सैनिकों की तस्वीरों के पोस्ट कार्ड छापे. इन कार्डों को संक्षिप्त संदेश घर भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. इस कार्ड पर घर का पता और पत्र लिखने के लिए तस्वीर का दूसरा पहलू इस्तेमाल होता था. सैनिकों का संदेश तो लिखा जाना है पर सरकार का संदेश पहले ही छपा हुआ है. यह सैनिकों के घरों में उनकी बहादुरी की कहानियाँ अंग्रेज़ी में बताता था.

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पोस्ट कार्ड पर इस कार्ड को छापने का उद्देश्य दर्ज है. साथ ही इसको छापने वाले से लेकर तस्वीर खींचने के बंदोबस्त की तफ्सील भी दी गई है. इस तफ्सील से अंदाज़ा होता है कि कार्ड को छापने का काम युद्ध स्तर पर हो रहा था. संभव है कि हर रेजिमेंट को ध्यान में रख कर ये कार्ड छापे जाते हों.

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प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सिख फौजियों को तकरीबन हर मोर्चे पर भेजा गया. तस्वीर में सिख फौजी फ्रांस में युद्ध के मोर्चे की तरफ मार्च कर रहे हैं. ये तस्वीर एक पोस्ट कार्ड पर छपी है.

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यह पोस्ट कार्ड एक पत्र के रूप में दो दिसंबर 1915 को भेजा गया है जिसका पता कार्ड पर लगी डाकखाने की मोहर से लगता है.

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सिख फौजियों की घुड़सवार टुकड़ी युद्ध क्षेत्र की तरफ मार्च करती हुईं. इस तस्वीर पर पाँच अक्तूबर 1914 की तारीख हाथ से दर्ज की गई है. लिहाजा यह तस्वीर पहले की खींची हुई लगती है.

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इस पोस्टकार्ड की तस्वीर डिज़ाइन की गई है. तस्वीर का नाम बताता है कि प्रथम विश्व युद्ध में लड़ रहे सैनिकों का उत्साह कायम रखने के लिए उन्हें अलग-अलग ढंग से सम्मानित किया जा रहा था. इस तरह डिज़ाइन किए गए पोस्ट कार्ड से पता चलता है कि उस वक्त एलाइड फोर्सेज़ के लिए सिख सैनिकों की क्या अहमियत थी.

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इस तस्वीर में भारतीय सैनिक फ्रांस में अपने घोड़ों की सेवा में लगे है. हालांकि बॉम्बे बंदरगाह की तस्वीर बाद की है पर यह तस्वीर उसके बारे में कुछ बताती है.

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पटियाला इन्फैंट्री की टुकड़ी येरूशलम में रेलवे के पुल पर पहरा दे रही है. दुश्मन सेना ने पीछे हटते समय इस पुल को उड़ा दिया था. टूटे हुए पुल का कुछ हिस्सा नीचे पड़ा है.

'री इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशियन रिसर्च एंड एक्सचेंज' और 'पंजाब डिजिटल लाइब्रेरी' ने मिलकर दक्षिण एशिया भर से लोगों की व्यक्तिगत और सार्वजानिक संग्रहों से तस्वीरें लेकर 'लिव्ड स्टोरीज एवरीडे लाइव्स' नाम से एक प्रदर्शनी का आयोजन किया.

इस प्रदर्शनी को 18 से 20 जुलाई 2013 के बीच पंजाब के लुधियाना ज़िले के दाउदपुर गांव में लगाया गया था. पंजाब के किसी गांव में ऐसी प्रदर्शनी बिलकुल नई बात थी.

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