सीरिया के रक़्क़ा में महिलाएँ
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सीरिया के रक़्क़ा में महिलाएँ

नूर सीरिया में इस्लामिक स्टेट की कथित राजधानी रक़्क़ा की रहने वाली महिला हैं. कुछ हफ़्तों पहले वह अफने परिवार के साथ वहाँ से भागने में क़ामयाब हुई और अब यूरोप में शरणार्थी के तौर पर रह रही हैं. वहाँ उनकी मुलाक़ात हुई बीबीसी से हुई. नूर ने बताया कि रक़्क़ा में महिलाओं की ज़िंदग़ी कैसी है. उनके और अब भी रक़्क़ा में मौजूद उनकी दो बहनों के अनुभवों के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की गई है. इसमें कुछ नाम बदल दिए गए हैं जिससे नूर या उसके परिवार की सुरक्षा को कोई ख़तरा न हो. ये उनकी कहानी है जो बीबीसी की #100women शृंखला का हिस्सा है.

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हम तीन बहनें सीरिया के रक़्क़ा में पूरी ज़िंदग़ी रहे.

रक़्क़ा को शक्तिशाली महिलाओं के शहर के तौर पर जाना जाता था, जहाँ आपको कुछ चाहिए तो महिलाओं से ही पूछना होता था.

मगर इस्लामिक स्टेट ने ये बदल दिया.

उन्होंने हमें अपने चेहरे ढकने पर मजबूर किया, पैंट पहनने से मना किया और हमारे लिए ज़िम्मेदार किसी पुरुष को साथ लिए बिना घर से निकलने पर भी रोक लगाई.

हमारी दोस्तों को सैनिकों से शादी के लिए मजबूर किया गया, या उनके लिए वेश्याएँ बनने पर मजबूर किया गया, मगर पुरुषों ने उन्हें गर्भवती हालत में अकेला छोड़ दिया.

आईएस ने एक महिलाओं का एक इस्लामिक पुलिस दल बनाया. वे हम पर नज़र रखती थीं, पीटती थीं या बेहद गंदे तरीक़ों से हमारी तलाशी लेती थीं. उनकी भाषा अरबी नहीं थी.

मेरी बड़ी बहन की अपने ससुराल में बहस हो गई, उन्होंने उसकी शिकायत कर दी और उसे धार्मिक पुलिस- हिस्बा के पास ले जाया गया.

उसे कोड़े मारने की सज़ा सुनाई गई. उसे कई-कई बार पीटा गया. उसका शरीर अब कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाएगा.

वे उन महिलाओं के साथ और भी बुरा बर्ताव करते हैं जो उनकी राजनीति को चुनौती देती हैं. वे उन्हें उन जगहों के नज़दीक़ छोड़ देते हैं जहाँ भेड़िए शिकार करते हैं. उन्हें ज़िंदा खा लिया जाता है.

मेरी छोटी बहन अभी 20 से 25 साल के बीच में है, वह घर से बाहर निकलने में डरती है. वो पूरे दिन मेरी माँ के साथ बैठी रहती है, वे कभी रक़्क़ा से बाहर नहीं निकलेंगे.

वे कभी रेडियो भी नहीं सुनते क्योंकि हमारे एक पड़ोसी को लगता है कि वो नरक़ के पाइप हैं और वे इसकी शिकायत कर देंगे.

मैं एक माँ भी हूँ, मैंने आपको अभी तक ये नहीं बताया था.

मेरा बेटा आठ साल का है. मुझे लगा कि वो पार्क जाता था मगर उसकी जगह मौलवी उसके दिमाग़ में नफ़रत के बीज बो रहे थे. उन्होंने उसे कट्टरपंथी बना दिया.

मैंने उससे कहा कि उसे उन लोगों से बातचीत बंद कर देनी चाहिए. वो चिल्लाया, 'तुम एक काफ़िर हो, तुम सुअर हो...'

वो ऐसा नहीं है मगर उन लोगों ने मेरे ख़िलाफ़ उसके मन में ज़हर बो दिया. मुझे नहीं पता कि अब वो क्या कर सकता है.

मैंने महिलाओं को ये फुसफुसाते हुए सुना है कि काश ये विद्रोह कभी नहीं हुआ होता, उन्हें आज़ादी चाहिए थी मगर ग़ुलामी हाथ लगी.

रक़्क़ा अब हड़पा जा चुका है और अजनबियों से भरा है.

रक़्क़ा की आत्मा मर चुकी है.