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सिनेराग: जब सुर मिले राग से

जो फ़िल्मी गीत हमें कभी यादों की वादियों में ले जाते हैं....

कभी बिछड़े हुए दोस्तों और अधूरी प्रेम कहानियों के पन्ने पलटने पर मजबूर करते हैं....

कभी एक ख़ामोश दर्द सा दे जाते हैं....आख़िर उनमें इतनी कशिश कैसी आती है?

क्या है सुरों और रागों की वो तरतीब जो चंद शब्दों में धड़कन डाल देती है?

वर्षांत कार्यक्रमों की श्रृंखला में विशेष प्रस्तुति –

सिनेराग का पहला हिस्सा. राजेश जोशी की पेशकश.