कश्मीरी पंडित
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पोस्टकार्ड: कवियित्री क्षमा कौल

जम्मू-कश्मीर में नब्बे के दशक के वे दिन और रात कैसे रहे होंगे जब चारों ओर निराशा और आशंका के बादल छाए हुए थे? ख़ास तौर पर महिलाओं के लिए.

ये वो दिन थे जब पुराने रिश्ते और दोस्तियाँ शक और आशंका के अँधेरों में खोने लगी थीं. श्रीनगर की सड़कों पर आज़ादी के नारे लगने लगे थे और घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो चुका था.

कवयित्री क्षमा कौल का कहना है कि तब एक लेखिका के रूप में उनकी पहचान धूमिल पड़ गई थी.

‘इनका भी कश्मीर’ श्रृंखला की आख़िरी कड़ी. प्रस्तुति क्षमा कौल.

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