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रविवार, 23 मार्च, 2003 को 19:29 GMT तक के समाचार
हमेशा साथ रहे दर्शक
पूरी प्रतियोगिता में भारतीय टीम को भारी संख्या में मौजूद दर्शकों का साथ मिल गया
पूरी प्रतियोगिता में भारतीय टीम को भारी संख्या में मौजूद दर्शकों का साथ मिल गया



रविवार को वॉन्डर्रस क्रिकेट मैदान का माहौल कोलकाता के इडन गार्डन्स से अलग नहीं था.

तीस हज़ार की क्षमता वाले इस स्टेडियम के हर हिस्से में भारतीय समर्थक भरे हुए थे.

कुछ तिरंगा लहराते हुए तो कुछ इन्ही रंगो में अपने आप को ढाले हुए.

1983 के बाद ये पहला मौक़ा था जब भारत फ़ाइनल में खेल रहा था और ये लोग भारत के विभिन्न हिस्सों ने ये मैच देखने पहुँचे थे.

इनमें उद्योगपति मुकेश अंबानी सहित भारत के कई नामी-गिरामी लोग थे.

सभी भारत को वर्ल्ड कप जीतते देखना चाहते थे, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की पारी के बाद ज़्यादातर का जोश ठंडा पड़ गया.

दर्शकों का जोश

अगर जोश में थे तो मैदान के विभिन्न हिस्सों में बैठे हज़ारों भारतीय समर्थक.

वे हर चौक्के पर ताली बजाते और हर नो-बॉल या वाइट बॉल पर और ज़्यादा तालियाँ.


अंतिम मैच में गांगुली का हौसला बढ़ाने की कोशिश की दर्शकों ने
उनकी इन तालियों की गूँज इतनी तेज़ थी कि हाफ़-टाइम में मैदान के ऊपर से गुज़रे बोइंग विमानों की आवाज़ भी इनके सामने साधारण लग रही थी.

शायद ये इन्हीं लोगों का जोश था वीरेंदर सहवाग और सौरभ गांगुली को केवल आठ ओवरों में पचास रन पूरे करने की हिम्मत दी.

ऑस्ट्रेलिया से आए लोग भारत के इस जोश को देख कर हैरान थे.

सिडनी से आई कैथी ने कहा, “अगर मेरी टीम को जीतने के लिए 360 रन बनाने होते तो मुझमें इतना जोश नहीं होता”.

तेंदुलकर, गांगुली और मोहम्मद क़ैफ़ का विकेट गिरने पर भी ये जोश ठंडा नहीं हुआ.

स्कोरबोर्ड पर केवल 59 रन थे लेकिन इन समर्थकों की ज़ुबान पर “जीतेगा भई जीतेगा, इंडिया जीतेगा”.

इसमें कोई शक़ नहीं था कि उनकी आवाज़ में उम्मीद ज़्यादा थी और विश्वास कम.

निराशा

बंगलौर से आए चैतन्या ने कहा, “देखिए, इस मैच में भारत का जीतना तो मुश़्किल है. लेकिन अगर हमारी आवाज़ सुन कर हमारे खिलाड़ी जोश में आ जाएँ तो हमें तो मज़ा आ जाएगा”.

पंजाबी के “चक दे फ़ट्टे” से लेकर “इंडिया, इंडिया” और फ़ुटबॉल के “ओले, ओले, ओले” तक इन क्रिकेट-प्रेमियों ने अपनी टीम की हिम्मत बंधाने की पूरी कोशिश की.

लेकिन सहवाग और राहुल द्रविड के अलावा भारत का कोई भी बल्लेबाज़ मैदान पर अपना जलवा नहीं दिखा पाया.

चालीसवें ओवर में जब भारतीय पारी ख़त्म हुई तो मैदान पर काग़ज़ की मशालें नहीं जलीं.

सिर्फ़ सुनाई दी तालियों की आवाज़, जो बज रही थीं ऑस्ट्रेलिया के लिए.
 
 
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