न्यूयॉर्क में दलित चेतना की अलख

दलित सम्मेलन
Image caption सम्मेलन में दलित-मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया गया

न्यूयॉर्क के लांग आईलैंड इलाक़े में भारतीय मूल के दलित और अल्पसंख्यक समुदाए के लोगों का जमावड़ा लगा हुआ है.

ये लोग एक सम्मेलन में भाग ले रहे हैं जिसमें दलित और अल्पसंख्यकों को सामाजिक न्याय दिलाने और उनके अधिकारों की सुरक्षा के उपायों पर चर्चा हो रही है.

तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में चेताया गया है कि अब प्रस्तावों का दौर ख़त्म हो गया है और अधिकारों को हासिल करने का समय आ गया है.

सम्मेलन की शुरूआत करते हुए भारत के केंद्रीय इस्पात मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के नेता राम विलास पासवान ने कहा कि आज़ादी के बाद 60 वर्ष गुज़र जाने के बाद भी दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को पूरे अधिकार नहीं मिले हैं.

वह कहते हैं, “आज़ादी के 60 साल के बाद भी अगर हम खाली प्रस्तावों को पास करने तक सीमित रहे तो पिछड़े लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार कम मिलेंगे. हम उन अधिकारों को लेने के लिए पिछड़े दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों का सशक्तिकरण करेंगे. इसके लिए उन्हें साथ में लाना होगा.”

सरकार भरोसे नहीं

लेकिन फिर भी पासवान खुद सरकार में होने के बावजूद इस बात को मानते हैं कि सिर्फ़ सरकार के भरोसे नहीं बैठा जा सकता. वह कहते हैं खुद पिछड़े समुदाए के लोगों को अब अपने भविष्य को सुधारने के लिए प्रयत्न करने होंगे.

इस सम्मेलन में पिछड़े समुदाए के लोगों की शिक्षा, उनकी आर्थिक स्थिति, नौकरियों में भी आरक्षण की मांग और उनके ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा पर भी चर्चा होगी.

इस सम्मेलन में दुनिया भर से करीब 700 लोग भाग ले रहे हैं. इनमें विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता, नेता और आम लोग भी शामिल हैं.

भारत के अलावा एशिया के अन्य देशों से और यूरोप और कनाडा से भी कई प्रतिनिधि इस सममेलन में भाग ले रहे हैं.

इस तीन दिवसीय सम्मेलन में इस बात पर भी ज़ोर दिया जा रहा है कि भारत में दलित और अल्पसंख्यक समुदाए के उपेक्षित लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने में तेज़ी कैसे लाई जाए.

'दलित-मुस्लिम साथ हों'

Image caption दलित सम्मेलन में सभी धर्मों के लोगों को बुलाया गया

पहले दिन की चर्चा में विभिन्न समुदायों के नेताओं और धर्मगुरूओं ने विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे.

दलितों के अलावा इस सम्मेलन में बहुत से मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी शिरकत की. इसके अलावा बैठक में इसाई, सिख और बौध धर्म के मानने वाले लोगों ने भी हिस्सा लिया.

पूर्व सांसद सैयद शाहाबुद्दीन ने सम्मेलन में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व किया.

उनका कहना था, “मुसलमान और दलित इन दोंनों समुदायों को मिलकर काम करना चाहिए क्योंकि यही दोंनो समुदाय हैं जो शिक्षा और नौकरियों में सबसे पिछड़े हैं.”

इस सम्मेलन का नारा है कि भारतीय समाज में जो लोग शक्तिहीन हैं, उनका शक्तिकरण किया जाए.

दलित और अल्पसंख्यक फ़ोरम के क़ुर्बान अली का मानना है कि सच्चर समिति की रिपोर्ट के बाद भारत में मुस्लिम समुदाए के लोगों के हालात सुधरने के अच्छे आसार हैं.

वो कहते हैं, “सच्चर समिति की रिपोर्ट आने के बाद अब मुसलमानों का तुष्टिकरण किए जाने की बात पर से भी नकाब हट गई है. अब सरकार की जो नीतियां हैं उनको सही तरीके से लागू किया जाए.”