अमरीका में ज़कात अदा करने में परेशानी

अमरीका मुस्लिम सेंटर
Image caption टीकाकारों की राय में 11 सितंबर, 2001 की घटना के बाद अमरीका में रह रहे मुसलमानों के प्रति संदेह का माहौल पैदा हुआ है

अमरीका में एक मानवाधिकार संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीकी सरकार अपनी 'आतंकवाद विरोधी कार्रवाई' के नाम पर अमरीका में रह रहे मुसलमानों की दान-दक्षिणा की संस्थाओं को 'ग़लत तरीक़े से निशाना' बनाकर बंद कर रही है जिससे अमरीका में मुसलमानों को ज़कात या दान-दक्षिणा देने के उनके धार्मिक फ़र्ज में मुश्किल हो रही है.

अमरीका की एक मानवाधिकार संस्था 'अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन' यानी एसीएलयू की ताज़ा रिपोर्ट में अमरीकी वित्त मंत्रालय पर यह इल्ज़ाम लगाया गया है कि आतंकवाद के खिलाफ़ कार्रवाई के नाम पर अमरीका में रह रहे मुसलमानों की अनकों ख़ैराती संस्थाओं के खिलाफ़ आतंकवादी गुटों से संबंध होने के शक में कार्रवाई हो रही है.

दिलचस्प बात यह है कि यह सारी कार्रवाई पिछले अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के ज़माने से शुरू हुई थी.

रिपोर्ट के अनुसार इस कार्रवाई से अमरीका में रह रहे मुसलमानों को अपने धर्म का आज़ादी से पालन करने के उनके संवैधानिक अधिकार का भी हनन हो रहा है.

रुकावट

'ब्लॉकिंग फ़ेथ, फ़्रीज़िंग चैरिटी'– नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीकी सुरक्षा एजेंसियाँ इन दान-दक्षिणा से संबंधित संस्थाओं को गुप्त तरीकों से आतंकवादी गुटों से जोड़कर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू कर देती हैं और इन ख़ैराती संस्थाओं को उनके ख़िलाफ़ लगाए गए इल्ज़ामों से अपना बचाव करने की भी मोहलत नहीं दी जाती है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ इस तरह मुसलमानों की मज़हबी आज़ादी के अलावा उनकी आपस में मिलने जुलने की आज़ादी का भी उल्लंघन होता है और उनके साथ ग़ैर-क़ानूनी तौर पर पक्षपात का रवैया बरता जाता है.

इस रिपोर्ट की लेखिका जेनिफ़र टर्नर कहती हैं कि 11 सितंबर के बाद से और बुश प्रशासन के ज़माने से ही वित्त मंत्रालय के ज़रिए पेट्रियट एक्ट के तहत की जाने वाली 'आतंकवाद विरोधी कार्रवाई' के नाम पर यह गतिविधियाँ जारी हैं और यह बढ़ती ही गई हैं.

वह कहती हैं, "जो नीतियाँ बुश प्रशासन को दूसरे देशों में आतंकवाद को धन मिलने से रोकने के लिए लागू करनी थीं, उसको आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग के नाम पर नए तरीकों से अमरीकियों और अमरीकी संस्थाओं पर लागू किया जाने लगा. "

जेनिफ़र टर्नर का कहना है कि उन्होंने बहुत से मुसलमानों से बातचीत की है और ज़्यादातर दक्षिण एशियाई मूल के मुसलमान जो अमरीका में रह रहे हैं, उन्हें अपने देशों में त्रासदी या आपदा से जूझ रहे लोगों को आर्थिक मदद भेजने में मुश्किलें आ रही हैं.

स्पष्टीकरण

Image caption 'ब्लाकिंग फ़ेथ, फ़्रीज़िंग चैरिटी' की रिपोर्ट में मुसलमानों की मौजूदा स्थिति पर बात की गई है

इन इल्ज़ामों का जवाब देते हुए अमरीकी वित्त मंत्रालय का कहना है कि वह इस सिलसिले में ख़ैरात और दान लेने वाली संस्थाओं से संबंध बनाए हुए है और उनको यह बताने की कोशिश की जा रही है कि किस तरह आतंकवाद को बढ़ावा दिए बग़ैर ख़ैरात और दान दक्षिणा का काम जारी रखा जाए.

वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है, "हम सभी धर्मों की ख़ैराती संस्थाओं के साथ अपना संपर्क बढ़ा रहे हैं, जिससे उनके धन के आतंकवादी संगठनों के प्रयोग से उनको बचाया जा सके. हमारी यह भी कोशिश है कि ऐसी संस्थाओं और ख़ैरात देने वाले लोगों को यह भी बेहतर तरीक़े से समझाएँ कि वह कैसे दान दक्षिणा कर सकें और उनके धन का ग़लत प्रयोग भी न हो."

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ग्यारह सितंबर के चरमपंथी हमलों के फ़ौरन बाद उसी साल 23 सितंबर को अध्यादेश 13224 जारी किया था. इस अध्यादेश में आतंकवादी संस्थाओं के आर्थिक स्रोत और उनको आर्थिक मदद पहुँचाने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई का प्रावधान है.

इसके तहत किसी भी ख़ैराती संस्था जिसका आतंकवाद से किसी भी प्रकार का संबंध हो उसके खाते सील करके उसे बंद किया जाता है और अन्य क़ानूनी कार्रवाई भी की जाती है. इसके अलावा ऐसी संस्था को जो भी धन देता है या मदद पहुँचाता है उसके खिलाफ़ भी आतंकवाद को मदद पहुँचाने के इल्ज़ाम में कार्रवाई होती है.

रिपोर्ट में यह ज़रूर कहा गया है कि अमरीकी अधिकारियों को कुछ संस्थाओं के आतंकी गुटों से संबंध होने के सबूत मिले हैं लेकिन इन संबंधों को स्थापित करने में जो तरीका अपनाया गया है वह ग़लत और बेकार साबित होता है.

रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका मे पिछले आठ सालों में कम से कम सात मुसलिम ख़ैराती संस्थाओं को आतंकवाद से संबंध रखने के इल्ज़ाम में बंद कर दिया गया है और उनके बैंक खाते सील कर दिए गए हैं.

कोशिश

इनमें से कुछ पर मुकद्दमे चल रहे हैं तो कुछ अभी भी मकददमे के इंतज़ार में हैं. इसके अलावा बहुत सी संस्थाओं और उनके कर्मचारियों पर अमरीकी सुरक्षा एजेंसियाँ नज़र भी रखे हुए हैं.

जिन संस्थाओं को बंद किया गया है उनके नाम हैं - अल हरमैन इस्लामिक फ़ाउंडेशन, ग्लोबल रिलीफ़ फ़ाउंडेशन, होली लैंड फ़ाउंडेशन, इस्लामिक अमेरिकन रिलीफ़ एजेंसी, गुडविल चेरिटेबल ऑर्गेनाईज़ेशन, बेनेवलेंस इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन और काइंडहार्टस्.

सरकार के ज़रिए बंद की जाने वाली यह मुस्लिम ख़ैराती संस्थाएँ टेक्सास, न्यूयॉर्क, मिशिगन, मिज़ूरी, इलिनॉय और ओहायो जैसे राज्यों में स्थित थीं.

रिपोर्ट का कहना है कि इन सात में से सिर्फ़ तीन संस्थाओं के ख़िलाफ़ अदालत में मामला चल रहा है और इनमें से भी सिर्फ़ एक संस्था को दोषी पाया गया है.

इसके अलावा कई मुसलिम संस्थाओं जैसे कांउसिल ऑन अमेरिकन इस्लामिक रिलेशन्स जैसी मुसलमानों के अधिकार संबंधी संस्थाओं के कई ओहदेदारों के नाम भी ऐसे मामलों में साज़िश रचने के इल्ज़ाम में ग़लत तरीके से जोड़ दिए गए हैं.

बहुत से मुसलमानों ने अमरीकी सुरक्षा एजेंसियों के चंगुल में फंसने के डर से किसी भी ख़ैराती संस्था को दान देना बंद कर दिया है.

इस मानवाधिकार रिपोर्ट में मिशिगन के फ़्लिंट शहर में करीब 60 ऐसे मुसलमानों से बातचीत का भी ब्यौरा दिया गया है जिसमें वह लोग बताते हैं कि किस तरह एफ़बीआइ के अधिकारियों ने उन्हें मुस्लिम ख़ैराती संस्थाओं को दान देने के मामले में उनसे पूछताछ की.

कानूनी कार्यवाई के डर से अमरीकी मुसलमान घबराए हुए हैं और खौराती संस्थाओं का रूख ही नहीं कर रहे हैं.

इसके कारण बहुत सी ऐसी धार्मिक संस्थाओं के काम में बाधा आ रही है जो विश्व भर के विभिन्न इलाकों में लोगों को राहत पहुंचाने का काम करती हैं.

अमरीकी मुसलमानों में यह बेचैनी है कि वह अपने धार्मिक कामों को पूरी तरह अंजाम नहीं दे पा रहे हैं. कई मस्जिदों और इस्लामिक सेंटरों में ख़ैराती संस्थाओं को चंदे दिए जाते हैं जिनमें अब भारी कमी देखी जा रही है.

इनमें बड़ी संख्या में भारतीय, पाकिस्तानी औऱ बंग्लादेशी मूल के मुसलमान जो अमरीका में रह रहे हैं अब इस बात से डर रहे हैं कि कहीं उनपर किसी संस्था को खैरात और चंदा देने के नतीजे में आतंकवादियों से संबंध रखने का इल्ज़ाम न लगा दिया जाए.

न्यूयॉर्क के मुस्लिम सेंटर के शमशीर अली बेग कहते हैं कि लोग अब ख़ैरात देने से कतराते हैं कि कहीं वह क़ानूनी मुश्किल में न पड़ जाएँ.

वह कहते हैं, "आतंकवाद रोकने के लिए जो नए क़ानून बने थे उनके तहत उन लोगों के नाम भी दर्ज किए जाते थे जो ख़ैरात देते थे. तो इससे लोगों में डर समा गया है और वह दान देने से पीछे हट गए हैं. साथ ही बहुत सी ख़ैराती संस्थाओं को ग़लत इल्ज़ाम लगाकर बंद कर दिया गया है."

उधर एफ़बीआई जैसी संस्थाओं का कहना है कि मुस्लिम समुदाय को ही कोशिश करके ऐसी संस्थाओं से दूर रहना होगा जो आतंकवादी गुटों से मेलजोल रखती हैं.

अमरीकी वित्त मंत्रालय के अधिकारी भी मुसलमानों के बीच जाकर यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह अपने ख़ैराती चंदे ऐसी संस्थाओं को दें जिससे वह रक़म आतंकवादियों के हाथ में न जाने पाए.

मुहिम

Image caption मिस्र की राजधानी काहिरा में ओबामा के दिए भाषण से लोगों को स्थिति बदने की उम्मीद है

मुसलमानों की कुछ मानवाधिकार संस्थाओं ने अब इस तरह ख़ैराती संस्थाओं को बंद किए जाने के ख़िलाफ़ मुहिम भी शुरू की है.

इन संस्थाओं ने अमरीकी प्रशासन को यह समझाने की कोशिश की है कि मुसलमानों को धार्मिक आज़ादी के आधार पर ज़कात या ख़ैरात देने से रोका नहीं जाना चाहिए और यह भी कि धार्मिक आज़ादी किसी भी जनतांत्रिक समाज का अहम हिस्सा होती है.

मुस्लिम एडवोकेट्स, कैलिफ़ोर्निया स्थित एक ऐसी ही संस्था है, जो मुसलमानों और मुस्लिम ख़ैराती संस्थाओं को भी इस बात की जानकारी देती है कि वह कैसे अपने धार्मिक फ़र्ज़ को पूरा करते हुए ख़ैरात या ज़कात लें या दें जो मौजूदा क़ानून को भी न तोड़े.

अब तक इस संस्था ने देश भर में क़रीब 150 मस्जिद और ख़ैराती संस्थाओं को इस मामले में शिक्षित करने और उनकी जानकारी बढ़ाने में भी मदद की है.

मुस्लिम एडवोकेट्स की फ़रहाना खेरा कहती हैं कि उनको बहुत से मुसलमानों से पता चला है कि जब वह अमरीका से बाहर सफ़र करके लौटते हैं तो उनसे बॉर्डर पर भी अधिकारीगण यह सवाल करते हैं कि वह किस संस्था को रक़म देते हैं और कितनी रक़म देते हैं और क्या वह उस संस्था से जुड़े हैं, और उन संस्थाओं को चलाने वालों के भी नाम पूछे जाते हैं.

फ़रहाना खेरा कहती हैं, "हम अमरीका में रह रहे मुसलमानों के लिए ज़कात देना एक धार्मिक कर्तव्य है और यह बहुत अहम मुद्दा है. सरकार को इस पर ध्यान देना होगा. ख़ासकर ख़ैराती संस्थाओं पर रोक लगाने संबंधी जो मौजूदा नीतियाँ हैं उनमें व्यापक बदलाव करने की सख्त ज़रूरत है."

ओबामा से उम्मीद

वैसे अमरीकी मुसलमानों को राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा से हिमायत की उम्मीद है.

हाल ही में मिस्र की राजधानी काहिरा में अपने भाषण के दौरान ओबामा ने अमरीका में मुसलमानों को दान दक्षिणा देने में पेश आने वाली मुश्किलों का भी ज़िक्र किया था और यह भी वादा किया था कि वह इस मामले में जल्द ही ऐसे कदम उठाएंगे कि मुसलमानों को उनके धार्मिक कामों का पालन करने में मुश्किल न हो.

मुसलमानों ने ओबामा के इस एलान पर भी खुशी का इज़हार किया है. अब मुसलमानों को यह इंतेज़ार है कि ओबामा अमरीकी कांग्रेस के साथ मिलकर कब ऐसे क़ानूनों को बदलने की प्रक्रिया शुरू करेंगे जिससे आज़ादी से ख़ैरात, ज़कात का धार्मिक कर्तव्य को अंजाम दिया जा सके.

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