कुर्दिस्तान में चुनावी नतीजे का इंतज़ार

इराक़ के उत्तरी स्वायत्त इलाक़े कुर्दिस्तान में शनिवार को राष्ट्रपति पद और संसद के लिए चुनाव हुए जिसमें सत्ताधारी गठबंधन को कड़े मुक़ाबले का सामना करना पड़ रहा है.

Image caption कुर्दिस्तान में मतगणना शुरू हो गई है

सुधारवादी आंदोलन ‘चेंज’ से सत्ताधारी गठबंधन को चुनौती अवश्य मिल रही है लेकिन समझा जाता है कि वर्तमान राष्ट्रपति मसूद बरज़ानी और गठबंधन की दोनों प्रमुख पार्टियां चुनाव जीत जाएँगी.

इराक़ के राष्ट्रपति जलाल तालबानी ने इन चुनावों को कुर्द इलाक़े के लिए एक महत्वपूर्ण दिन बताया है. तालबानी ख़ुद एक कुर्द हैं.

मतदान का समय एक घंटे बढ़ाना पड़ा जिससे सभी को मतदान का अवसर मिल सके. कई इलाक़ों में भारी मतदान हुआ.

एक मतदान केंद्र के अधिकारियों ने बताया कि वहाँ 80 प्रतिशत मतदान हुआ और कहीं कहीं इससे भी अधिक मतदान की ख़बरें हैं.

हिंसा नहीं

मतदान केंद्रों पर कोई 20,000 सैनिक तैनात किए गए थे और कहीं से हिंसा की कोई ख़बर नहीं आई.

लेकिन सुधारवादी आंदोलन चेंज का कहना है कि उसके पर्यवेक्षकों को पश्चिमी दाहुक प्रांत के सभी मतदान केंद्रों से निकाल दिया गया.

उसका आरोप है कि दाहुक और इरबिल में व्यवस्थित तरीक़े से धांधलियां हुईं हैं.

आधिकारिक परिणाम अगले सप्ताह के शुरू में आने की आशा है. बीबीसी के संवाददाता का कहना है कि लोग बड़ी उत्सुकता से नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं विशेष रूप से यह देखने के लिए कि सुधारवादी आंदोलन अपने गठबंधन सहयोगियों कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी और पेट्रिऑटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान से कितनी सीटें छीन पाता है.

उम्मीद

कुर्दिस्तान के राष्ट्रपति मसूद बरज़ानी कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी या केडीपी के नेता है. उन्होंने आशा व्यक्त की है कि चुनाव के बाद इराक़ की केंद्रीय सरकार के साथ ज़मीन, तेल और ऊर्जा जैसे लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाया जा सकेगा.

संसदीय चुनाव में केडीपी और पीयूके ने संसद की 100 सीटों के लिए उम्मीदवारों की एक संयुक्त सूची जारी की थी. बाक़ी की 11 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं.

यूँ तो वर्तमान गठबंधन के जीतने की आशा है लेकिन इन दोनों प्रमुख दलों को सुधारवादी आंदोलन चेंज से गंभीर चुनौती मिल रही है. इस आंदोलन के नेता हैं नौशेरवान मुस्तफ़ा.

चेंज ने भ्रष्टाचार और विशिष्ट वर्गवाद के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी है और उसे पूर्वी इलाक़ों में काफ़ी समर्थन हासिल है.

चेंज के कुछ समर्थक तो यहाँ तक आस लगाए बैठे हैं कि वह इतनी सीटें जीत सकता है कि इस्लामिक और वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बना सके.

हालाँकि इसकी संभावना कम ही है लेकिन कम से कम वह संसद में एक मुखर विपक्ष के रूप में सरकार को चुनौती ज़रूर दे सकता है.

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