सू ची के समर्थन में बर्मा पर दबाव

सू ची समर्थक
Image caption अमरीकी राष्ट्रपति ने सू ची की बिना शर्त रिहाई की माँग की है.

विश्व समुदाय ने बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सांग सू ची को तुरंत रिहा करने की माँग की है.

इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक बुलाई गई थी लेकिन ये टल गई है क्योंकि रूस और चीन ने मसौदे के अध्ययन के लिए समय माँगा है.

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सू ची की सज़ा को ग़लत बताते हुए उनकी बिना शर्त रिहाई की माँग की है.

बर्मा की एक अदालत ने सू ची को नज़रबंदी क़ानून तोड़ने का दोषी पाते हुए उनकी नज़रबंदी 18 महीने और बढ़ा दी है.

अमरीका, संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और इंडोनेशिया ने बर्मा की अदालत के फ़ैसले की निंदा की है.

लेकिन भारत और चीन ने इस फ़ैसले पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है, "जब तक सू ची और अन्य राजनेताओं की रिहाई नहीं होती और उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं मिलती तब तक बर्मा में राजनीतिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता संदिग्ध रहेगी."

बर्मा के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि इब्राहिम गंबारी ने कहा है कि सू ची की रिहाई राजनीतिक प्रक्रिया को बहाल करने के लिए अनिवार्य है.

बर्मा में अगले साल बहुदलीय चुनाव होने हैं और अगर सू ची की सज़ा कायम रही तो वो इन चुनावओं में हिस्सा नहीं ले पाएंगी.

मामला

Image caption आंग सान सू ची पिछले 19 वर्षों से जेल में हैं

अदालत ने सू ची को तीन साल और नज़रबंद रखने का फ़ैसला सुनाया था लेकिन सैन्य शासन ने इसे घटाकर 18 महीने कर दिया है.

उनपर मई में झील पार कर अपने घर आए एक अमरीकी व्यक्ति को शरण देकर नज़रबंदी की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप है.

सू ची ने आरोप को मानने से इनकार किया है.

आंग सान सू ची ने अदालत को बताया था कि उन्हें नहीं पता था कि कोई देर रात उनसे मिलने आया है और ये जानकारी उन्हें अपने सहयोगी से मिली.

उन्होंने पहले ही कह दिया था कि वे मानकर चल रही हैं कि उनको दोषी ठहराया जाएगा.

इस मुकदमे की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी आलोचना हुई है.

जब सू ची को मई में गिरफ़्तार किया गया था तो वे नज़रबंद थीं और कुछ ही दिनों में रिहा होने वाली थीं.

सू ची को पिछले 19 वर्षों के दौरान अधिकांश समय नज़रबंदी में गुज़ारना पड़ा है.

संवाददाताओं का कहना है कि मुकदमे से बर्मा के सैन्य शासन को एक बहाना मिल गया है जिसके कारण वे 2010 में होने वाले चुनावों के बाद तक उन्हें हिरासत में रख सकते हैं.

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