फ़्रांसीसी अर्थव्यवस्था में सुधार

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Image caption जर्मनी फ्रांस की अर्थव्यवस्था में सुधार लेकिन अब भी बेरोजगारी की दर ऊंची.

जर्मनी और फ्रांस से मिले रहे आंकड़ों से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब आर्थिक संकट से संभवत: उबरने लगी हैं.

बुधवार को ही अमरीका के फेडरल रिज़र्व ने कहा था कि अमरीकी अर्थव्यवस्था थोड़ा संभल रही है. ब्रिटेन में बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर अच्छे संकेत दिए हैं, हालांकि उनकी चेतावनी थी कि ब्रिटेन में आर्थिक संकट से उबरने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी और अनिश्चितताओं से घिरी रहेगी.

जर्मनी और फ्रांस यूरोज़ोन की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और उनका अनपेक्षित रूप से आर्थिक संकट से उबर आना पूरे क्षेत्र में आर्थिक स्थिरता लाने में मदद करेगा.

वहीं यूरोज़ोन के 16 देशों – जहां यूरो मुद्रा का प्रयोग होता है – साल की दूसरी तिमाही में सिर्फ 0.1 प्रतिशत की दर से ही सिकुड़ीं. ये दर इस साल की सबसे धीमी दर है.

जर्मनी आर्थिक संकट की चपेट में तब आया था जब विश्व व्यापार में गिरावट आने की वजह से जर्मनी के निर्यात को भारी नुकसान हुआ था.

लेकिन बेहतरी के ताज़ा संकेत निर्यात में बढ़ोतरी की वजह से नहीं बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था में सुधार की वजह से सामने आए हैं. हालांकि अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि अब भी जर्मनी की अर्थव्यवस्था काफी नाज़ुक है और वहां अब भी बेरोज़गारी की दर बढ़ रही है.

लेकिन ताज़ा आकंड़ों से सामने आया है कि विकास दर में सुधार के पीछे उपभोक्ताओं के खर्च में बढोतरी भी एक कारण है—और इस वृद्धि के लिए सरकार द्वारा किए गए उपाय काफी कारगर साबित हुए हैं.

इनमें सरकार द्वारा पुरानी कारों को बदलने के लिए नकद पैसा देने जैसे उपाय भी शामिल थे.

फ्रांस की अर्थव्यवस्था में भी हुआ सुधार काफी आशाजनक है. फ्रांस की वित्त मंत्री क्रिस्टिन लगार्डे छुट्टी पर थीं, जब उन्होंने खासतौर पर एक रेडियो स्टेशन को फोन करके नए आंकड़ों की जानकारी दी.

उनका कहना था कि विकास दर में सकारात्मक बढ़ोतरी से साफ हो गया है कि सरकार द्वारा उठाए गए कदम कारगर साबित हो रहे हैं.

उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि हमने जिस तरह से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पीछे पूरे भरोसे के साथ खड़े होकर नई नीति पर काम किया, वो आगे भी काफी मददगार साबित होगा. राष्ट्रपति की निवेशकों मदद देने की नीति बिल्कुल ठीक निकली.''

ये नए आकंड़े काफी आशाजनक तो लग रहे हैं लेकिन अब भी इस बात को लेकर चिंता बनी हुई है कि ये कितने मज़बूत संकेत हैं. यूरोप में बेरोज़गारी के और बढने की भारी आशंका है. बैकिंग व्यवस्था अब भी कमज़ोर है और इस व्यवस्था को आर्थिक बैसाखियां देने की सरकारों की कोशिश भी बहुत लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती है

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