लंदन का मुफ़्त अख़बार बंद

अख़बार वितरक
Image caption लंडन पेपर के वितरक अरविंद सोलंकी

लंदन वासी अब 'लंडन पेपर' नहीं पढ़ पाएंगे. उन्हे आदत है शाम को दफ़तर से लौटते हुए अख़बार लेने की, जिससे दिन भर की ख़बरों का पता लग सके और रेल या बस का सफ़र अख़बार पढ़ते हुए निकल जाए.

पहले लोग 'ईवनिंग स्टैंडर्ड' अख़बार ख़रीदा करते थे लेकिन फिर आया मुफ़्त अख़बारों का दौर. अगस्त 2006 में शहर में जगह-जगह 'लंडन लाइट' बंटने लगा. एक महीने बाद रूपर्ट मरडॉक के न्यूज़ इंटरनेशनल ने उसे चुनौती देते हुए 'लंडन पेपर' निकाला. इसकी लंदन में रोज़ पाँच लाख प्रतियां बंटने लगीं.

लेकिन 18 सितंबर को उसका अंतिम अंक प्रकाशित हुआ और उसी के साथ कोई 60 कर्मचारी और 700 वितरक बेरोज़गार हो गए.

अधिकतर वितरक भारतीय

इन वितरकों में अधिकतर भारतीय छात्र हैं जो लंदन पढ़ाई करने आए हैं और अख़बार बांटकर छह पाउंड प्रति घंटा कमाते हैं. 'लंडन पेपर' के बंद होने से उनपर कितना असर पड़ेगा. गुजरात से आए अरविंद सोलंकी कहते हैं, "बहुत ही बुरा असर पड़ेगा क्योंकि मेरे पास यही एक नौकरी थी और आमदनी का एक मात्र स्रोत यही था जिससे मैं यहां खाने पीने का ख़र्च निकालता था. अब मुझे भारत से पैसा मंगवाना पड़ेगा".

लेकिन अतिरिक्त पैसा कमाने के लिए क्या यही काम चुनना ज़रूरी था. ऊपर से लंदन का विकट मौसम. कभी सर्द हवाएं हैं कभी बारिश तो कभी बर्फ़ लेकिन रोज़ शाम को सड़क पर खड़े होकर अख़बार तो बांटना है. हैदराबाद से आए बदरुद्दीन मोहम्मद कहते हैं, "मेरा कॉलेज के टाइमिंग के हिसाब से यह सही होता है. कॉलेज सुबह होता है शाम को अख़बार बांटने का काम करता हूं और रात को पढ़ाई करता हूं. इससे इस काम में सहूलियत है".

वैसे पश्चिमी देशों में अधिकतर छात्र और छात्राएं पार्ट टाइम काम करते हैं. लेकिन जब मैंने गुजरात से अकाउन्टिंग पढ़ने आए प्रकाश पटेल से पूछा कि अगर वो भारत में होते तो क्या ये काम करते तो वो बोले,"भारत में नहीं क्योंकि वहां तो हमारा दूध का बड़ा व्यापार है. उधर हम अपने मालिक थे यहां ये काम करना पड़ता है".

लंडन पेपर बंद करने की वजह

'लंडन पेपर' और उसके जैसे अन्य मुफ़्त अख़बार विज्ञापनों के दम पर चलते हैं लेकिन जब दुनिया पर आर्थिक मंदी की काली छाया पड़ी तो मालिकों को ये मुफ़्त अख़बार बहुत मंहगे पड़ने लगे.

Image caption लंडन पेपर का स्टैंड

'लंडन पेपर' को एक साल में एक करोड़ 30 लाख पाउंड का नुकसान उठाना पड़ा. बस इसीलिए इसे बंद कर दिया गया. अख़बार के कार्यालय ने इसपर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया बस न्यूज़ कॉरपोरेशन के यूरोप और एशिया अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी जेम्स मरडॉक ने एक वक्तव्य जारी किया, "पिछले डेढ़ साल में न्यूज़ इंटरनेशनल की रणनीति ये रही है कि हम अपने कारोबार को सुनियोजित करें और अपने प्रमुख प्रकाशनों में निवेश बढ़ाएं. लंडन पेपर की टीम ने नई रचनाशीलता और ताज़ा तरीकों के साथ, कम समय में, बहुत कुछ हासिल किया लेकिन मुफ़्त अख़बार के क्षेत्र में कारोबार आशानुकूल नहीं रहा. हमने एक कड़ा फ़ैसला किया है जो हमारे कारोबार की प्राथमिकता को दर्शाता है".

जेम्स मरडॉक के इस फ़ैसले से लंदन के बहुत पुराने अख़बार ईवनिंग स्टैंडर्ड को लाभ होगा. अख़बार बेचने वाली ईवा को लगता है, "अगर मुफ़्त अख़बार नहीं होगा तो शायद लोग अख़बार ख़रीदने लगेंगे. क्योंकि जब कोई चीज़ मुफ़्त मिलती है तो उसे लेना आसान होता है. लेकिन अगर मुफ़्त अख़बार नहीं होगा तो लोग अख़बार ख़रीदेंगे".

ज़ाहिर है लंडन पेपर बंद होने से भारतीय छात्रों को नुकसान उठाना पड़ेगा. तो क्या उन्हे कोई दूसरी नौकरी नहीं मिल सकती. अरविंद सोलंकी कहते हैं, "मिल सकती है लेकिन उसके लिए समय चाहिए. और फिर इस मंदी के दौर में आपको भी पता है कि नौकरी पाना कितना मुश्किल है. लंदन में तो बहुत ही मुश्किल है. मैं पिछले एक साल से दूसरी नौकरी तलाश कर रहा हूं लेकिन अभी तक नहीं मिली".

किसी का फ़ायदा किसी का नुकसान. आर्थिक मंदी के इस दौर में बेरोज़गारी की ख़बरें देने वाले, आज ख़ुद ख़बर बन गए हैं.

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