मेरे बच्चे सबसे अच्छे

राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल
Image caption प्रतिभा पाटिल अमरावती से सांसद रह चुकी हैं. उनके पति देवी सिहं वहाँ से विधायक व महापौर रह चुके हैं.

महाराष्ट्र में सभी राजनीतिक दलों के सीटों की संख्याओं को लेकर तालमेल तो हो गया है पर टिकटों के बँटवारे में परिवारवाद हर तरफ दिख रहा है.

काग्रेंस की लिस्ट में सबसे उभर कर दिखने वाला नाम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के बेटे राजेंद्र सिंह शेखावत का है जो विदर्भ की अमरावती सीट से काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. इस सीट से अभी विधायक है सुनील देशमुख है जो राज्य के वित्त और जल संसाधन और संसदीय मामलों के मंत्री हैं.

सुनील देशमुख कहते है कि उन्हें अचलपुर से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया गया था जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया.

सुनील देशमुख ने बीबीसी को बताया “मुझे लगता है कि राजेंद्र सिंह शेखावत अमरावती सीट से जीतकर नहीं आ सकते क्योंकि वो मुंबई में रहते है.”

इसके अलावा टिकट मांगने वालों की फेहरिस्त में केन्द्रीय उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदें की बेटी परिणीति भी शामिल है जो शोलापुर से टिकट चाहती है. वहीं केंन्द्र में भारी उद्योग मंत्री और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख अपने बेटे अमित देशमुख के लिए लातूर सीट से आस बाँधे हुए हैं.

एनसीपी प्रमुख और केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के भतीजे फिर से बारामती सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं.

भाजपा में पार्टी महासचिव गोपीनाथ मुंडे अपनी बेटी पंकजा के लिए पार्ली सीट से और दिंवगत नेता प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन के लिए घाटकोपर (पश्चिम) से टिकट पाने में कामयाब हो पाए हैं. गोपीनाथ मुंडे पूनम महाजन के फूफा हैं.

अपनी पार्टी में परिवारवाद को भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद सामान्य बात बताते हैं. वो कहते हैं कि चुनाव के वक्त तो टिकट की मारामारी होती ही है.

भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद कहते हैं “हम जानते हैं कि गोपीनाथ मुंडे या प्रमोद महाजन की बेटी जैसों की जीत की संभावना ज्यादा होती है साथ ही हमे क्षेत्र से भी दबाव आता है.”

मराठी दैनिक लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर कहते हैं कि राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से 25 से भी कम बड़े परिवारों के रिश्तेदारों के पास जाती हैं लेकिन इससे कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जाता है.

केतकर आगे जोड़ते हैं “इन क्षेत्रों में सालों से कार्यकर्ता काम करते आ रहे हैं और इससे ये संदेश जाएगा कि उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. उनको लगेगा महज़ नाम से टिकट मिल जाता है, काम के लिए टिकट मिले ये ज़रूरी नहीं. "

केतकर जो बरसों से राज्य की राजनीति पर पैनी नज़र रखते रहे हैं वो मानते हैं कि उम्मीदवारों को अपने पिता के कारण टिकट मिल तो जाता है लेकिन वो जीत ही जाए ऐसा नहीं होता. “पहली बार परिवारवाद का फायदा मिल सकता है पर हर बार ऐसा हो ये जरुरी नही”.

तमाम विरोध और टीका टिप्पणियों के बावजूद इन नेताओं को ये उम्मीद है की जनता उनके काम का ईनाम उनके चुनाव लड़ रहे रिश्तेदारों को देगी.

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