भारतीय पहचान पर गर्व हैः नदीम अहमद

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दस लाख की आबादी वाला भारतीय समुदाय ब्रिटेन की कुल जनसंख्या का सिर्फ़ 1.8 प्रतिशत है लेकिन शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, मनोरंजन से लेकर राजनीति तक हर क्षेत्र में इस बिरादरी ने अपनी साख़ क़ायम की है. ज़ाहिर है, सफलता का ये सफ़र कभी बहुत कठिन, कभी बहुत दिलचस्प, कभी बहुत रंगीन रहा है, विदेशी आसमान में ऊँची उड़ान भरने वाले ऐसे लोगों से हम आपकी मुलाक़ात कराने जा रहे हैं जो मीडिया की नज़रों से दूर, कामयाबी की एक नई कहानी लिख रहे हैं.

नदीम अहमद अपने परिवजनों के साथ

नदीम अहमद के ज़्यादातर परिजन भारत में ही रहते हैं

इस विशेष श्रृंखला की शुरूआत लंदन में रहने वाले नदीम अहमद के साथ जो दुनिया भर में चाय के दूसरे सबसे बड़े व्यापारी हैं.

लंदन में एक बहुत ही संभ्रांत इलाक़ा है रीजेंट्स पार्क जहाँ नदीम अहमद का घर है. घर में दाख़िल होते ही चीज़ें एक ख़ास कहानी कहती हैं, घर को करीने से सजाया गया है. बाद में पता भी चला कि नदीम अहमद की पत्नी फ़ैशन डिज़ायनर हैं और घर को सजाने-सँवारने में उन्हें महारत हासिल है. एक ड्राइंग रूम में पति-पत्नी और दोनों बेटों का फ़ोटो है जो लगभग पाँच साल पुराना है क्योंकि अब बेटे बड़े हो चुके हैं. ताजमहल के साथ खिंचवाया हुआ फ़ोटो बताता है कि ब्रिटेन में पैदा हुई पीढ़ी का भारत लगाव कम नहीं हुआ है.

"लंदन आकर 1991 में हमने एक छोटा सा कमरा लिया, जिसमें एक टेबल थी जिसे दो लोग शेयर करते थे. हमने चाय की ट्रेडिंग से शुरूआत की, अब हम चाय का कारोबार करने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बन चुके हैं".

'ग्लोबल टी एंड कॉमोडिटीज़' के संस्थापक मैनेजिंग डायरेक्टर नदीम अहमद की आवाज़ में किसी तरह का अभिमान नहीं है लेकिन एक बात वे बहुत गर्व से बताते हैं कि उन्होंने अपना भारतीय पासपोर्ट अभी तक नहीं छोड़ा है, न ही उनके दोनों बेटों ने.

नदीम अहमद की कंपनी की चाय टायफ़ू ब्रिटेन में बहुत मशहूर है

नदीम अहमद की कंपनी की चाय टायफ़ू ब्रिटेन में बहुत मशहूर है

नदीम अपने सफ़र के बारे में बताते हैं कि पिछले 18 वर्षों में किस तरह उन्होंने 'फ्रॉम बुश टू कप' की नीति के तहत चाय का इतना बड़ा कारोबार खड़ा किया, "हमने कीनिया, तंज़ानिया और मलावी जैसे अफ्रीकी देशों के ढेर सारे चाय बाग़ानों को ख़रीदा जिन्हें ब्रितानी सरकार बेच रही थी क्योंकि उन्हें भारी घाटा हो रहा था, कुछ ही सालों में ख़र्च में भारी कटौती करके हमने उन्हें दोबारा फ़ायदेमंद बना दिया."

तंबाकू के प्रसिद्ध व्यापारी सर हाजी इलाही बख़्श के पोते और सर अब्दुल रहीम के बेटे ने ये काम अपने भरोसेमंद भारतीय मैनेजरों को सौंपा, "मैं भारत में चाय बागानों में गहरी दिलचस्पी रखता था इसलिए मैं अपने साथ प्लांटेशन मैनेजरों को भारत से ही लेकर आया."

टाटा से हमारा कॉम्पीटीशन है मगर फिर भी सामाजिक कार्यों के मामले में वे मेरे प्रेरणास्रोत हैं.

नदीम अहमद

अफ्रीका में उनकी चाय की खेती की देखरेख कई भारतीय मैनेजर तो करते ही हैं, पाँच सौ कर्मचारियों वाली'ग्लोबल टी एंड कॉमोडिटीज़' भारत से भारी मात्रा में चाय का आयात करती है जिसे कंपनी के 'टाइफ़ू' और 'ब्रुक बांड' जैसे नामी ब्रांडों में अच्छे फ्लेवर के लिए मिलाया जाता है.

उन्होंने अफ्रीका को इसलिए चुना क्योंकि वहाँ चाय की खपत उत्पादन के मुक़ाबले काफ़ी कम थी, लेकिन भारतीय चाय की बात ही कुछ और है. वे बताते हैं, "इंडिया से हम बीस-पच्चीस परसेंट चाय ख़रीदकर अपने ब्लेंड में डालते हैं, हमारे हर ब्लेंड में इंडियन चाय रहना ज़रूरी है."

क़रीब दस करोड़ पाउंड का सालाना कारोबार करने वाली कंपनी के पास ब्रिटेन में चाय के दो बड़े लोकप्रिय ब्रांडों-टाइफ़ू और ब्रुक बांड सहित कई बड़े उत्पाद हैं.

कोलकाता में जन्मे और पले-बढ़े नदीम आज भी साल में चार-पाँच बार भारत जाते हैं, "घर जाना बहुत अच्छा लगता है, होम इज़ व्हेयर द फैमिली इज़, एंड माइ फैमिली इज़ इन कैलकटा."

विदेश में पहचान

उद्यम के लिए ब्रिटेन का प्रतिष्ठित 'क्वींस अवार्ड' पा चुके नदीम मीडिया से दूर रहकर अपना काम करते रहने में विश्वास करते हैं, उन्हें तो इसी बात पर आश्चर्च हो रहा था कि उनके बारे में बीबीसी को कैसे पता चला.

उनके पिता सर अब्दुल रहीम ने स्कूलों, अनाथालयों और अस्पतालों के निर्माण और संचालन में ख़ासा योगदान दिया था, शायद यह उनके पूर्वजों की ही विरासत है कि वे कहते हैं, "भारत के बिज़नेसमैन जितना कमाते हैं उसका एक क़तरा भी समाज पर ख़र्च नहीं करते. हमें बिल गेट्स से सबक लेना चाहिए, टाटा समूह ने मिसाल पेश की है, पिछले 100 साल में उन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया है."

ग्लोबल टी के मैनेजिंग डायरेक्टर नदीम अहमद

नदीम अहमद को ब्रिटेन में पहचान मिलने के बावजूद अपनी भारतीय पहचान पर गर्व है

ब्रितानी बाज़ार में टाटा के टेटली ब्रांड से नदीम अहमद की टाइफ़ू का कड़ा मुक़ाबला है लेकिन वे कहते हैं, "टाटा से हमारा कॉम्पीटीशन है मगर फिर भी सामाजिक कार्यों के मामले में वे मेरे प्रेरणास्रोत हैं."

नदीम बिल्कुल नहीं मानते कि भारतीय होने की वजह से उन्हें ब्रिटेन में कभी कोई परेशानी उठानी पड़ी हो, उनके मुताबिक़ ब्रिटेन से अधिक समता पर आधारित समाज दुनिया में मिलना मुश्किल है.

"यहाँ भारतीय लोग ख़ूब सुख-समृद्धि का जीवन जी रहे हैं और भारतीय होने के रूप में मज़बूत सामुदायिक बंधन नज़र आता है. हम यहाँ के क़ानून का सम्मान करते हैं और अपनी भारतीय पहचान को बरक़रार रखते हुए ब्रितानी समाज में घुलमिलकर रहते हैं, जिससे भारतीय समुदाय की प्रतिष्ठा भी यहाँ ख़ूब है".

जसवंत सिंह की जिन्ना पर छपी ताज़ा किताब और डॉक्टर इक़बाल के लेखों का संग्रह मेज़ पर रखा दिखाई देता, वे कहते हैं, "मैं हर पढ़ने लायक चीज़ पढ़ना चाहता हूँ, पढ़ना मेरा ख़ास शौक़ है, राजनीतिक किताबों में मेरी विशेष रुचि है." टेनिस, तैराकी, स्वैक्श और शेरो-शायरी में भी उनकी दिलचस्पी है.

फ़ैशन और इंटीरियर डिइज़ानर पत्नी ने उनके घर को बहुत करीने से सजाया है, उनके दो नौजवान बेटों की ताजमहल के पास खिंचवाई गई तस्वीर दीवार पर टँगी है. "बड़ा बेटा लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में फाइनेंस एंड एकाउंटिंग पढ़ रहा है, छोटे वाले ब्रिलिएंट मैथमेटेशियन हैं, वे इंपीरियल कॉलेज जाएँगे."

आशावाद और 'पॉजिटिव थिंकिंग' से भरे नदीम को भारत में 'बहुत कम ख़राबियाँ' दिखाई देती हैं, वे 'भारत के नौजवानों के उत्साह और लगन' के कायल हैं, 'इंडिया नॉलेज के फ़ील्ड में बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है,' लेकिन वे भारत के नेताओं से ख़ासे निराश दिखते हैं.

"अमीर-ग़रीब की खाई को कम करना बहुत ज़रूरी है वरना समय के साथ अगर यह खाई और बढ़ती गई तो भारत के भविष्य के लिए बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी."

भारतीय मूल के कई व्यापारी हैं जिन्हें हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स की सदस्यता या सर की उपाधि मिली है, बाप-दादा, परदादा के बाद इस पीढ़ी को भी सर की उपाधि मिले तो काफ़ी दिलचस्प बात होगी, लेकिन नदीम अहमद में भारत के ग़रीबों के लिए काम करने की बेताबी अधिक दिखती है.

बीस साल और सोलह साल के दो बेटों के बाप नदीम अहमद भविष्य में अपना कारोबार बच्चों को सौंपकर कुछ सामाजिक काम करना चाहते हैं, बिल्कुल साफ़-सुथरी हिंदी बोलने वाले नदीम कहते हैं,"इंशा अल्लाह, मैं इंडिया जाकर रिटायर होना चाहता हूँ, वहाँ सोशल वर्क करना चाहता हूँ."

अमीर-ग़रीब की खाई

नदीम अहमद की कंपनी को टिकाऊ विकास में योगदान के लिए महारानी का पुरस्कार मिल चुका है

नदीम अहमद की कंपनी को टिकाऊ विकास में योगदान के लिए महारानी का पुरस्कार मिल चुका है

भारत को लेकर नदीम अहमद अब भी बहुत संवेदनशील नज़र आते हैं. कहते हैं कि भारत में बहुत सारी अच्छी बातें हो रही हैं, शिक्षा का विस्तार तेज़ी से हो रहा है, औद्योगिक प्रगति हो रही है, आमदनी बढ़ रही है मगर एक बात उन्हें बहुत कचोटती है और वो ये कि उनके ख़याल से भारत में सरकार और औद्यौगिक तबके ने देश के लगभग 80-90 करोड़ उन लोगों की भलाई के लिए पर्याप्त योगदान नहीं किया है जो ग़रीबी में जीवन जीने को मजबूर हैं.

नदीम अहमद के विचार में भारत के इन करोड़ों लोगों को भी एक सम्मानजनक और शिक्षित जीवन जीने का अधिकार है और उन्हें सिर्फ़ यह कहकर छोड़ा नहीं जा सकता कि यह उनका भाग्य है. उनके ख़याल से भारत की असल मायनों में प्रगति तभी कही जा सकती है जब देश के ग़रीब तबके को भी रोटी-कपड़ा और मकान के साथ-साथ शिक्षा के अवसर भी आसानी से उपलब्ध हों, सबको समान अवसर उपलब्ध हों.

हालाँकि नदीम अहमद आशा का दामन भी छोड़ते नज़र नहीं आते और उन्हें उम्मीद है कि जैसे-जैसे नई पीढ़ियाँ अपना रास्ता बना रही हैं उससे भारत में और भी सकारात्मक बदलाव आएंगे. लेकिन भारत के राजनीतिक वर्ग के लेकर नदीम अहमद कुछ निराश नज़र आते हैं. उनका ख़याल है कि इस वर्ग ने देश को वो नहीं दिया है जिसकी उस पर ज़िम्मेदारी है.

भ्रष्टाचार, बेईमानी, साम्प्रदायिकता जैसे दानवों ने आम आदमी का हक़ छीना है जिससे पूरी व्यवस्था को नुक़सान हो रहा है. अमीर-ग़रीब की खाई को कम करना बहुत ज़रूरी है वरना समय के साथ अगर यह खाई और बढ़ती गई तो भारत के भविष्य के लिए बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी. उनके ख़याल में अगर राजनीतिक व्यवस्था में सुधार आ जाए तो प्रगति का रास्ता बहुत आसान हो जाएगा.

उनकी ख़्वाहिश है कि भारत में ग़रीब लोगों के लिए अगर कुछ कर पाए तो ख़ुद को सौभाग्यशाली मानेंगे.

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