कहीं मखौल तो कहीं शाबाशी

बराक ओबामा

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को अचानक नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के बाद अमरीका भर में लोग भौंचक्के रह गए.

कुछ को हर्ष तो कुछ को आश्चर्य हुआ. कुछ लोगों सवाल उठा रहे हैं कि ओबामा को क्यों, अभी उन्होंने किया ही क्या है.

शुक्रवार सुबह तड़के जैसे ही इस पुरस्कार की घोषणा की ख़बर फैली अमरीकी समाचार माध्यमों, टीवी और रोडियो पर इसी बात की चर्चा होनी शुरू हो गई.

दिन भर सीएनएन, एमएसएनबीसी और फ़ॉक्स न्यूज़ जैसे 24 घंटे समाचार प्रसारित करने वाले टीवी चैनल्स पर यही मुद्दा छाया रहा.

शनिवार को अमरीका में छपने वाले सभी समाचार पत्रों में यही ख़बर सुर्खियों में है. कुछ समाचार पत्रों में इस पर ख़ुशी जताते हुए छापा है तो कुछ अख़बारों में मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में यह ख़बर छापी गई है.

स्वागत

अमरीका के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपना रुख़ बिल्कुल स्पष्ट रखा है.

समाचार पत्र के संपादकीय में राष्ट्रपति बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा का भरपूर स्वागत किया है.

न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकीय में लिखा गया है, "बिल्कुल, यह नोबेल पुरस्कार मिस्टर बुश के राष्ट्रपति शासनकाल की काफ़ी हद तक खुली आलोचना है. लेकिन राष्ट्रपति का ओहदा संभालने के बाद पिछले नौ महीनों में जिस तरह ओबामा ने बुश के शासनकाल में दुनियाभर में फैलाई गई नफ़रत को कम करने के लिए क़दम उठाए हैं वह उनकी बड़ी कामयाबियों में से एक है."

समाचार पत्र ने कहा कि बराक ओबामा ने ख़ुद इस पुरस्कार को हासिल करने की कोशिश नहीं की थी.

न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि बराक ओबामा को नोबेल का शांति पुरस्कार इसलिए भी सही दिया गया है क्योंकि उन्होंने विश्व के सारे देशों के साथ मिलकर अहम मुद्दों पर काम करने की फिर से शुरूआत की है.

बराक ओबामा ने विश्वसनीयता के साथ प्रताड़ित न किए जाने की घोषणा करके विश्व भर के सामने देश का सम्मान बढाया है.

इसके अलावा समाचार पत्र में ग्वांतानामो बे को बंद किए जाने की घोषणा, जलवायु परिवर्तन को कम करने में भूमिका, परमाणु शस्त्रों को विश्व से ख़त्म करने के लिए कोशिश और मध्य पूर्व में फिर से शांति की संजीदा कोशिशों को भी बराक ओबामा की नोबेल पुरस्कार के लिए उपलब्धियां गिनवाई गई हैं.

उम्मीदें

लेकिन साथ यह भी कहा है कि बराक ओबामा को यह पुरस्कार दिए जाने के बाद विश्व भर में शांति के लिए काम करने को लेकर उनसे उम्मीदें और बढ़ गई हैं. और यह कि इस सिलसिले में बराक ओबामा को अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

लेकिन वहीं एक और अमरीकी समाचार पत्र वॉल स्ट्रीट जरनल ने ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिए जाने को ग़लत बताते हुए कहा है कि बराक ओबामा ने ऐसा कुछ ठोस नहीं किया है जिसके लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया जाए.

समाचार पत्र में यह भी लिखा गया है कि किस तरह नोबेल शांति पुरस्कार समिति के पुरस्कार हमेशा उस समय की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा राजनीति से प्रेरित होते हैं.

वॉल स्ट्रीट जरनल में इसका उदाहरण देते हुए लिखा गया है, "इस दशक के शुरू में नोबेल समिति पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश प्रशासन के खिलाफ़ रहे लोगों को ही पुरस्कार के लिए चुनती रही है. 2002 में जिमी कार्टर, फिर 2005 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के मोहम्मद अल बरदाई और उसके बाद 2007 में अल गोर. यह सभी बुश प्रशासन के खिलाफ़ रहे हैं."

समाचार पत्र में महात्मा गांधी को यह पुरस्कार आज तक न दिए जाने की भी आलोचना की गई है.

वॉशिंगटन पोस्ट का कहना है कि ओबामा के लिए यह पुरस्कार एक शर्मिंदगी का कारण सा बन गया है.

बोझ

समाचार पत्र के संपादकीय में कहा गया है कि ओबामा की बजाए ईरान में हाल के चुनावों के नतीजों के विरोध में होने वाले प्रदर्शनों के दौरान मारी जाने वाली एक महिला नेदा को यह पुरस्कार दिया जाना चाहिए था.

Image caption ओबामा ने भी आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी जताई थी

समाचार पत्र के मुताबिक़ इससे ओबामा को शर्मिंदगी उठाने से बचाया जा सकता था.

वॉशिंगटन पोस्ट का भी यही मानना है कि अभी बराक ओबामा ने कोई ठोस काम नहीं किया है जिससे उनको यह पुरस्कार मिले.

लेकिन अख़बार यह भी कहता है कि इस पुरस्कार को उन्हे दिए जाने के फ़ैसले में ओबामा की कोई ग़लती नहीं है.

न्यूयॉर्क पोस्ट में ओबामा को यह पुरस्कार दिए जाने का माखौल उड़ाया गया है और कहा गया है कि ख़ुद व्हाइट हाउस में बराक ओबामा के सहयोगियो को इस बात पर आश्चर्य हुआ.

वहीं लॉस एंजेलेस टाइम्स में लिखा गया है कि भले ही नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल गले में पहनने के लिए रिबन के साथ न दिया जाता हो लेकिन राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस मेडल का बोझ उनकी गर्दन पर ज़रूर महसूस होगा.

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