चुनावी ख़बर या विज्ञापन- बूझो तो जानें

Image caption हरियाणा में मंगलवार को विधानसभा चुनाव हुए

क्या हो जब ख़बर और विज्ञापन में फ़र्क करना मुश्किल हो जाए? हरियाणा के चुनावी सफ़र के दौरान मैने अखबारों में ऐसे विज्ञापन देखे जो किसी आम ख़बर की तरह छपे थे.

एक आम पाठक के लिए ये पहचानना मुश्किल हो जाए कि जो वो पढ़ रहा है वो ख़बर है या फिर कोई विज्ञापन जिसके लिए उम्मीदवार ने लाखों दिए हैं.

मान लीजिए एक ही पन्ने पर दो ख़बरें लगी हैं. पहली ख़बर में एक क्षेत्र में एक पार्टी को ज़बरदस्त स्थिति में बताया जाता है, तो साथ ही लगी दूसरी ख़बर में दूसरी पार्टी के बारे में उसी क्षेत्र में अपार जनसमर्थन की ख़बर होती है.

एक पत्रकार का कहना था कि लगता है किसी के दिए प्रेस रिलीज़ को हूबहू वैसे ही छाप दिया हो.

राजनीतिज्ञ इस तरह की शिकायत कर चुके हैं कि चुनाव के वक्त अख़बारों के लोग ख़बर छपवाने के लिए पैसा मांगने आ जाते हैं. हालांकि चंडीगढ़ स्थित प्रमुख चुनाव अधिकारी सज्जन सिंह कहते हैं कि इस बारे में उनके दफ़्तर को कोई शिकायत नहीं मिली है.

हरमोहन धवन चंद्रशेखर सरकार में मंत्री थे और पिछले लोकसभा चुनाव में चंडीगढ़ से बसपा प्रत्याशी थे.

वो कहते हैं, "तीन अख़बार के लोग मेरे पास आए. उन्होंने कुछ लोगों के नाम गिनाए जिन्होंने उनके मुताबिक अख़बार में जगह खरीदी थी. फिर उन्होंने मुझसे कहा कि मैं भी जगह खरीदूं और अगर मैं ऐसा करता हूँ तो अख़बार में वही छपेगा जो मैं चाहूँगा. मैने साफ़ मना कर दिया. मैने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से नहीं की, लेकिन मुझे लगता है कि मुझे ऐसा करना चाहिए था. मुझे दुख है कि नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले भी खुद ऐसा काम करते हैं."

इस मामले में हिंदी औऱ अंग्रेज़ी अख़बार दोनों ही दोषी हैं, लेकिन कुछ प्रतिष्ठित हिंदी अख़बारों के बारे में कहा जा रहा है कि उनमें ये प्रवृत्ति ज़्यादा है.

दैनिक भास्कर के चंडीगढ़ स्थित स्थानीय संपादक प्रभात सिंह कहते हैं कि चुनाव आयोग की गाइडलाइंस से बचने के लिए उम्मीदवारों का निकाला गया ये एक नया तरीका है.

वो कहते हैं, "जिस ख़बर के बारे में आप कह रहे हैं, क्या उस ख़बर के साथ कोई डेटलाइन है, क्या उसमें रिपोर्टर या ब्यूरो का ज़िक्र है? अख़बार पढ़कर या फिर मीडिया से मतदाता अपने विचार बना रहा होता तो लोकसभा चुनाव में मीडिया में प्रसारित हुए आंकड़े देख लीजिए और हश्र एक जैसा ही होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ. विज्ञापन अपनी जगह और वोटर का मैंडेट अपनी जगह है."

ये पूछे जाने पर कि एक आम पाठक के लिए ख़बर और प्रायोजित ख़बर के बीच फ़र्क करना कितना मुश्किल होता है, तो प्रभात सिंह कहते हैं, "जो पाठक अख़बार पढ़कर अपनी सोच बनाता है, वो अख़बार के बारे में सारी बातें जानता है, और उनमें ये सब बातें भी शामिल हैं."

चुनावी सफ़र के दौरान मैने कई पत्रकारों से इस बारे में बात की.

पैसे के लिए..

जैसे कि एक चुनावी रोडशो के दौरान हरियाणा में बहुत देखे जाने वाले एक टीवी चैनल के स्ट्रिंगर पत्रकार को ही ले लें. उसका कहना था किसी स्थानीय पत्रकार के लिए चुनाव किसी दीवाली से कम नहीं होता और चार से पाँच लाख वो आराम से बना लेते हैं.

उसका कहना था, "इस विधानसभा चुनाव में जो बात बदली है वो ये कि इस बार सभी कुछ ऊपर मैनेजमेंट के स्तर पर ही तय हो गया है कि किस नेता या पार्टी को कितनी और कितने खर्चे पर कवरेज मिलेगी. मार्केटिंग वाले रिपोर्टर्स को बताते हैं कि किसको कितना कवरेज मिलेगी."

एक आम आदमी को ये बातें सुनने में नाटकीय लग सकतीं हैं. सवाल उठेगा कि ऐसा कहना आसान होता है, लेकिन ये बात बिना सुबूत के साबित कैसे हो, लेकिन इन पत्रकारों का कहना था कि जो वो कह रहे हैं वो सही है. लेकिन ये भी सच है कि ये बातें सभी के लिए लागू भी नहीं होतीं.

चंडीगढ़ स्थित इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक विपिन पब्बी कहते हैं कि पहले कोशिश होती थी कि विज्ञापन आम ख़बरों से अलग दिखे औऱ साफ़ पहचान में आए, लेकिन अब ऐसा नहीं है और इसके लिए पत्रकार को दोष देना गलत है क्योंकि सब कुछ प्रबंधन या संपादक के स्तर पर ही हो जाता है.

टीवी चैनलों के बारे में विपिन पब्बी कहते हैं कि कुछ चैनल तो राजनीतिक दलों ने ही खड़ें किए हैं और वो एकतरफ़ा कार्यक्रम औऱ ख़बरें ही दिखाते हैं.

एक अख़बार के मैनेजमेंट स्तर के एक व्यक्ति का कहना था कि आर्थिक मंदी के वक्त अगर कोई पार्टी विज्ञापन के बदले अपने बारे में कुछ लिखवाने की शर्त रखती है तो कोई बड़ी बात नहीं है.

उनका कहना था कि क्या आर्थिक जगत से जुड़े अख़बार कंपनियों की तारीफ़ के बजाय किसी स्कैंडल की ख़बर छापते हैं, तो फिर राजनीति ही अलग क्यों.

इन तर्कों के बावजूद सवाल वही कि क्या इन सबसे मीडिया की विश्वसनीयता पर असर नहीं पड़ रहा है.

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