अफ़ग़ानिस्तान में अनिश्चितता का माहौल

हामिद करज़ई
Image caption सूत्रों के अनुसार दूसरे दौर के चुनाव की बात से हामिद करज़ई तिलमिलाए हुए हैं

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन वाले चुनाव शिकायत आयोग की ओर से दोबारा चुनाव कराने की सिफ़ारिश के बाद वहां राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल है.

इस साल अगस्त में हुए राष्ट्रपति चुनाव में धाँधलियाँ होने की जाँच करनेवाले आयोग के कुछ अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि राष्ट्रपति हामिद करज़ई को चुनाव में सीधी जीत के लिए पर्याप्त मत नहीं मिल सके हैं और ऐसे में वहाँ अब दोबारा चुनाव होना चाहिए.

इसके बाद करज़ई और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला-अब्दुल्ला के बीच दूसरे दौर का मतदान होगा.

शिकायत आयोग ने करज़ई के पक्ष में पड़े लगभग एक तिहाई मतों को नकार दिया था.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि करज़ई ने वादा किया है कि वो संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान करेंगे.

काबुल स्थित बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हामिद करज़ई मानते हैं कि चुनाव में मिली जीत उनसे छीन ली गई है और वे दूसरे दौर के मतदान का विरोध कर रहे हैं.

इस बीच अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने उम्मीद जताई है कि हामिद करज़ई मंगलवार को अपनी स्थिति स्पष्ट कर देंगे.

अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव 20 अगस्त को हुए थे और उसके बाद चुनाव में बड़े पैमाने पर धाँधली होने की शिकायतें आईं.

पिछले दो महीने से चुनाव शिकायत आयोग नामक एक संस्था इस बारे में जाँच कर रही थी जिसे संयुक्त राष्ट्र का समर्थन मिला हुआ है.

इस स्वतंत्र संस्था में पाँच आयुक्त हैं जिनमें से तीन विदेशी सदस्य हैं. उनकी नियुक्ति संयुक्त राष्ट्र ने की है.

आयोग में दो सदस्य अफ़ग़ान हैं जिनमें एक की नियुक्ति अफ़ग़ानिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने और एक की नियुक्ति वहाँ के मानवाधिकार आयोग ने की है. इन दो अफ़ग़ान सदस्यों में से एक ने पिछले सप्ताह ये कहते हुए त्यागपत्र दे दिया कि उसकी बातों की सुनवाई नहीं हो रही.

रिपोर्ट और सिफ़ारिश

चुनाव क़ानून के हिसाब से, हमारे फ़ैसले और हमारे आदेश अंतिम और बाध्यकारी हैं. तो चुनाव आयोग को ये ध्यान में रखकर कोई फ़ैसला करना होगा ग्रैंट किपेन, अध्यक्ष, चुनाव शिकायत आयोग

चुनाव शिकायत आयोग ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग को सौंप दी.

आयोग के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि उनकी जाँच में ये पाया गया कि हामिद करज़ई को चुनाव में 50 प्रतिशत वोट नहीं मिल सके हैं.

आयोग के अधिकारियों ने कहा कि उनकी जाँच में ये पाया गया कि दो सौ से अधिक मतदान केंद्रों पर मतदान में गड़बड़ी हुई और उनके मतदान को रद्द कर दिया जाना चाहिए.

चुनाव में सीधी जीत के लिए किसी भी प्रत्याशी के लिए 50 प्रतिशत मत हासिल करना आवश्यक है.

ऐसा नहीं होने की सूरत में पहले दौर के चुनाव में पहले दो स्थानों पर रहनेवाले उम्मीदवारों के बीच फिर से चुनाव करवाना पड़ेगा.

यानी अब चुनाव शिकायत आयोग की रिपोर्ट के हिसाब से हामिद करज़ई और दूसरे नंबर पर रहनेवाले प्रत्याशी अब्दुल्ला अब्दुला के बीच फिर से चुनाव करवाया जाना चाहिए.

विवाद

Image caption प्रारंभिक परिणामों में हामिद करज़ई को आसानी से जीतता बताया गया था

अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग ने दोबारा चुनाव करवाए जाने की सिफ़ारिश को अस्वीकार कर दिया है.

मगर चुनाव शिकायत आयोग के अध्यक्ष ग्रैंट किपेन ने कहा है कि आयोग के फ़ैसलों पर अमल होना चाहिए.

ग्रैंट किपेन ने कहा,"चुनाव क़ानून के हिसाब से, हमारे फ़ैसले और हमारे आदेश अंतिम और बाध्यकारी हैं. तो चुनाव आयोग को ये ध्यान में रखकर कोई फ़ैसला करना होगा."

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के एक प्रवक्ता अलीम सिद्दिक़ ने भी कहा है कि चुनाव आयोग को इस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए.

उन्होंने कहा," अब जबकि चुनाव शिकायत आयोग ने अपनी सिफ़ारिश सौंप दी है हम आशा करते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान का स्वतंत्र चुनाव आयोग उन सिफ़ारिशों को लागू करने की दिशा में सुचारू क़दम उठाएगा और वह या तो अंतिम परिणाम घोषित कर देगा या फिर दोबारा चुनाव करवाने का एलान करेगा."

निराशा और धमकी

मतगणना के दौरान जो प्रारंभिक परिणाम आ रहे थे उनमें बताया गया था कि हामिद करज़ई को आसानी से 50 प्रतिशत वोट मिल गए हैं.

अब सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि दूसरे दौर के चुनाव की बात से हामिद करज़ई ख़ासे तिलमिलाए हुए हैं.

हामिद करज़ई को इसकी जानकारी पिछले सप्ताह ही दे दी गई थी.

करज़ई चुनाव शिकायत आयोग के निष्कर्ष को सीधे-सीधे अपनी झोली में आई जीत की चोरी बता रहे हैं और दूसरे दौर के किसी भी चुनाव को नहीं होने देने की धमकी भी दे रहे हैं.

पिछले कुछ दिनों के भीतर पश्चिमी देशों के कई नेताओं और राजनयिकों ने बड़े ज़ोर-शोर से कूटनीति के सहारे राष्ट्रपति करज़ई को समझाने की कोशिश की है.

अमरीका ने ये कहकर दबाव बढ़ाया भी है कि वे अफ़ग़ानिस्तान में तबतक अतिरिक्त सैनिक नहीं भेज सकते जबतक कि उनको ये भरोसा नहीं हो जाता कि काबुल में बैठा व्यक्ति उनका सच्चा सहयोगी है.

लेकिन लगता नहीं कि अमरीकी दबाव का कुछ असर हुआ है और एक ऐसा चुनाव जिससे आशा बंधी थी कि वो अफ़ग़ानिस्तान में स्थायित्व लाने में मददगार रहेगा, उसने अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक अनिश्चय की धुँध को और गहरा दिया है.

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