'गुस्सा तो बहुत आता है'

prabhsahay kaur
Image caption प्रभसहाय कौर दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करतीं हैं

दिल्ली हाई कोर्ट में दोपहर दो बजे का वक़्त और मै वकीलों के चम्बेर्स में इंतज़ार कर रहा था प्रभसहाय कौर का.

एकाएक कमरे का दरवाजा खुलता है और 24 वर्षीया प्रभसहाय कमरे में दाखिल होते ही फर्राटेदार अंग्रेजी में थोड़े विलंब से आने के लिए माफ़ी मांगती है और मुझसे चाय-काफ़ी के लिए पूछती हैं.

विनम्रता से मना करते हुए मैं उनसे यही गुजारिश करता हूँ की हम अपनी बातचीत हिंदी में जारी रखे.

वकालत के पेशे में हाल-फिलहाल में कदम रखें वाली प्रभसहाय एक टहाके के बाद ही तैयार हो जाती है और कहती हैं, "किस्मत का ही खेल है की मैं आज आपसे बात कर रही हूँ. 1984 के दंगों के दौरान मेरे वकील पिता और माँ ने तमाम जगह छुप-छुप कर अपने को बचाया और मुझे भी. क्योंकि मैं उस वक़्त अपनी माँ की कोख में थी. और ये बात आज भी मेरे मन में चुभती है."

1984 के सिख विरोधी दंगों में तमाम सिख परिवार विस्थापित हुए और कई परिवारों के सदस्य दंगों की भेंट चढ़ गए. पचीस साल बाद भी नई और युवा पीढी के सिखों के बीच दंगों के दौरान हुई कथित ज़्यादतियों की कहानियां ताज़ी हैं.

इनमे से ज़्यादातर या तो उस दौरान दुनिया में ही नहीं आये थे या फिर आने की दहलीज़ पर ही थे. पर इन्होने रिश्तेदारों, दोस्तों और जान-पहचान वालों से ऐसे कई किस्से सुने हैं जिनको याद कर, आज भी काँप उठते हैं.

'मैं पहले एक भारतीय हूँ, फिर एक सिख'

प्रभसहाय कौर भी नए ज़माने के तौर तरीकों से पूरी तरह वाकिफ हैं और बदलती तकनीकी के इस दौर मैं अपने को हमेशा आगे ही पाती हैं. मैं प्रभसहाय से पूछता हूँ की की सिखों के साथ 1984 मैं जो हुआ उसके बारे मैं वो खुद क्या राय रखती हैं.

जवाब मैं कहती हैं, " गुस्सा तो बहुत आता है की हमारे इतिहास मैं इतनी बड़ी घटना घट गयी और लोगों को इसके बारे मैं बताया ही नहीं जाता. आज के माँ-बाप अपने बच्चों को हर तरह की जानकारी देते हैं, सीख देते हैं लेकिन इस घटना के बारे मैं कुछ भी नहीं बताते. जब आज के बच्चों को १९७७ के आपातकाल के बारे मैं पता है, इंदिरा गाँधी की हत्या के बारे मैं पता है तो ऐसा क्यों है की 1984 के दंगों में हजारों लोगों के मारे जाने के बारे में भनक तक नहीं."

प्रभसहाय की बातों को सुनकर मन में सवाल उठना लाज़मी था की क्या पिछली पीढी के कुछ सिखों की तरह ही युवा पीढी के सिख भी समाज की मुख्यधारा के साथ चलने पर एक बार सोचते हैं?

इस सवाल पर प्रभसहाय अपनी राय को ख़ास बताते हुए कहती हैं, " पिछली सिख पीढी की सोच से मेरी सोच कुछ अलग है. क्योंकि मैं सोचती हूँ हम उस सब से आगे बढ़ चुके हैं. गुजरात को ही देख लीजिये. इसलिए मैं ये नहीं सोचती की मेरे साथ ही ऐसी कोई अनहोनी हो सकती है. ये तो किसी के साथ हो सकता है और मैं इसीलिए अपने को पहले भारतीय मानती हूँ फिर एक सिख. शायद पहले के दौर के लोग ऐसा नहीं सोचते थे. "

पहले एक भारतीय, फिर एक सिख ! इसी जवाब के बारे में सोचते हुए मैंने प्रभसहाय से विदा ली, क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट की एक अदालत में एक सुनवाई के लिए उन्हें भी तो समय से पहुंचना था.