'यहाँ आकर लगा अँगरेज़ ख़राब नहीं हैं'

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अँगरेज़ों के शासनकाल में भारत की आज़ादी की माँग का समर्थन करने वाली श्रीला फ़्लेदर को अंदाज़ा भी नहीं था कि आगे चलकर वे ख़ुद इंग्लैंड की राजनीति का हिस्सा बनेंगी और ब्रिटेन की संसद में पहुँचने वाली अल्पसंख्यक समुदाय की पहली महिला होंगी.

श्रीला फ़्लेदर कंज़रवेटिव पार्टी की ओर से 1990 में ब्रितानी संसद के ऊपरी सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स की सदस्य बनीं और इस तरह उन्हें बैरोनेस फ़्लेदर कहा जाने लगा.

आज़ादी से पहले अँगरेज़ों को भारत से बाहर करने के अभियान की समर्थक रहीं फ़्लेदर के मुताबिक़ बाद में उनका अँगरेज़ों के प्रति नज़रिया बदला, "यहाँ आकर लगा कि सचमुच अँगरेज़ ख़राब नहीं हैं. जब हम आए तो लगा कि अँगरेज़ काफ़ी सीधे, अच्छे और मदद करने वाले थे."

ढेर सारे स्कूल और अस्पताल बनवाने के लिए मशहूर सर गंगा राम के परिवार में लाहौर में जन्मीं श्रीला फ़्लेदर ने 1950 के दशक में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से कानून की डिग्री ली और फिर बार-एट-लॉ करने वापस इंग्लैंड आईं.

'खुले तौर पर था नस्लभेद'

उनका कहना है कि 1950 के दशक में भी इंग्लैंड में अकेले रहने में उन्हें कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई क्योंकि लोग तंग नहीं करते थे.

मैं तो हमेशा से ही साड़ी पहनती हूँ और इसके अलावा तो कुछ पहना ही नहीं. बँटवारे और स्वतंत्रता के समय से ही साड़ी पहनने की आदत थी और यूनिवर्सिटी में भी हम साड़ी ही पहनते थे

बैरोनेस श्रीला फ़्लेदर

वह मानती हैं कि उस समय इंग्लैंड में नस्लभेद था. उनके मुताबिक़, "नस्लभेद था भी तो बहुत खुले तौर पर था. लोगों को अगर बात नहीं करनी होती थी तो वो बात नहीं करते थे लेकिन गालियाँ नहीं देते थे."

श्रीला फ़्लेदर 1976 में काउंसिल की सदस्य बनीं और उसके बाद 1986 में वह विंडसर एंड मेडनहेड क्षेत्र की मेयर बनीं. ये वही इलाक़ा है जिसमें इंग्लैंड की महारानी का शाही महल विंडसर पैलेस आता है.

वह राजनीति में आने से पहले ही सामाजिक कार्य के क्षेत्र में आ चुकीं थीं और लोगों के बीच जाकर काम कर रहीं थीं.

'हमेशा साड़ी ही पहनी'

आम तौर पर साड़ी पहनने वाली श्रीला फ़्लेदर 1990 के दशक में जब हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स की सदस्य बनीं तो वहाँ भी वह साड़ी ही पहनकर गईं.

वे कहती हैं, "मैं तो हमेशा से ही साड़ी पहनती हूँ और इसके अलावा तो कुछ पहना ही नहीं. बँटवारे और स्वतंत्रता के समय से ही साड़ी पहनने की आदत थी और यूनिवर्सिटी में भी हम साड़ी ही पहनते थे."

मुझे 1997 में ताज्जुब हुआ कि पहले और दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाले अपने लोगों की कोई यादगार ही नहीं है. इसके बाद मैंने एक ट्रस्ट बनाया

बैरोनेस श्रीला फ़्लेदर

बैरोनेस फ़्लेदर दोनों बेटों को नियमित अंतराल पर भारत ले जाती रही हैं जिससे वे भी भारत को जानते-समझते रहें.

उनके मुताबिक़,"जब तक बच्चों को अपनी विरासत का पता नहीं हो तो उनमें आत्मविश्वास कैसे आएगा."

फ़रवरी में बैरोनेस फ़्लेदर की एक पुस्तक प्रकाशित हो रही है जो उन्होंने ग़रीबी हटाने के विषय में लिखी है. उनका कहना है कि महिलाओं के सहयोग से ये स्थिति बदली जा सकती है.

अब बैरोनेस फ़्लेदर आत्मकथा लिखना चाहती हैं.

स्मृति स्थल

इसके अलावा बैरोनेस फ़्लेदर की पहल पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाले दक्षिण एशियाई लोगों की याद में एक स्मृति स्थल भी बनवाया गया है.

इस बारे में बैरोनेस फ़्लेदर ने बताया, "मुझे 1997 में ताज्जुब हुआ कि पहले और दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाले अपने लोगों की कोई यादगार ही नहीं है. इसके बाद मैंने एक ट्रस्ट बनाया. जो लोग इस बारे में जानते थे उनको साथ लिया और तब भी इसके लिए धन जुटाने में मुझे पाँच साल लग गए."

बैरोनेस फ़्लेदर इस संबंध में ब्रिटेन में मौजूद धनी एशियाई समुदाय से काफ़ी खिन्न हैं क्योंकि उनके मुताबिक़ धनी एशियाई लोगों ने लगभग तीस लाख पाउंड की इस परियोजना में कोई बड़ी आर्थिक मदद नहीं की.

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