सभी उठाएँ आर्थिक बोझ: मनमोहन

मनमोहन सिंह
Image caption जलवायु परिवर्तन पर ऐसे फ़ैसले होने चाहिए जो सभी को स्वीकार्य हों

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शनिवार को कहा कि उनका देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करने के क़रार पर दस्तखत करने को तैयार है बशर्ते इससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ को सभी समान रूप से उठाने के लिए तैयार हों.

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन बैठक पर क़ानून तौर पर बाध्यकारी ठोस परिणाम हासिल करने पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन ग्रीनलेवल के तहत संरक्षणवाद को बढ़ावा देने का माध्यम बन गया है. भारत और दूसरे विकासशील देशों को ये कतई मंज़ूर नहीं है.

पोर्ट ऑफ़ स्पेन के चोगम में राष्ट्राध्यक्षों की बैठक में उन्होंने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जलवायु परिवर्तन पर बहस को आर्थिक प्रतिस्पर्धा या समान अवसरों की दलील से जोड़ा जा रहा है.

हरसंभव प्रयास

मनमोहन सिंह ने जलवायु परिवर्तन पर दिसंबर के कोपेनहेगेन शिखर सम्मेलन से कम उम्मीद लगाने के कुछ विकसित देशों के रुख़ को नामंजूर करते हुए कहा कि इस वार्ता के बारे में पहले से कोई आकलन नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि विचारों में सहमति बनाने के हरसंभव प्रयास किए जाने चाहिए.

प्रधानमंत्री ने कहा कि कोपेनहेगन का नतीजा अगर संयुक्त राष्ट्र समझौते के मसौदे को लागू करने में मददगार होने की बजाय इसे ख़ारिज़ करने वाला होता है तो इससे वित्त, प्रौद्योगिकी जैसे विशिष्ट मुद्दों को भारी झटका लगेगा.

उन्होंने कहा कि कोपेनहेगन सम्मेलन का नतीजा 'समग्र, संतुलित और बराबरी' का होना चाहिए. उन्होंने कहा कि इसमें वित्त और तकनीकी जैसे दूसरे अहम मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह हुआ कि हमें आंशिक नतीजों का प्रतिरोध करना चाहिए.

विशेष रूप से आमंत्रित संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून, फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी तथा राष्ट्रमंडल देशों के अन्य नेताओं को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, "हमें विज्ञान के महत्व को स्वीकार करना है, लेकिन विज्ञान समता से ऊपर नहीं होना चाहिए. जलवायु परिवर्तन को लेकर अगर कोई कदम ग़रीबी की उपेक्षा कर उठाया गया तो ये व्यवहारिक नहीं होगा."

जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय एवं समग्र प्रतिक्रिया पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन ग्रीन लेवल के तहत संरक्षणवाद का माध्यम बन गया है.

संरक्षणवाद जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र समझौता मसौदे और विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के प्रतिकूल होगा. उन्होंने कहा कि भारत तथा अन्य विकासशील देश इसका जबरदस्त प्रतिरोध करेंगे.

ग़ौरतलब है कि ग्रीनहाउस गैसों में कटौती की बाध्यकारी सीमा तय किए जाने को लेकर विकासशील और विकसित देशों में तीखे मतभेद हैं.

कोपेनहेगन में होने वाले सम्मेलन में ये तय किया जाना है कि क्योटो संधि की समयावधि समाप्त होने के बाद ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या से निबटने के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए.

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