धनराशि पर यूरोपीय संघ में खींचतान

धुआँ
Image caption यूरोपीय देशों के बीच धन के योगदान को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है

यूरोपीय संघ के देशों में ग्लोबल वार्मिंग पर क़ाबू पाने के लिए विकासशील देशों को मुहैया कराए जाने वाले धन को लेकर समझौते की कोशिशें तेज़ हो गई हैं.

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में दो दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन यूरोपीय संघ के नेता इस बात पर सहमत नज़र आए कि साझा तौर पर अगले तीन सालों में लगभग नौ अरब डॉलर धन मुहैया कराया जाना चाहिए.

लेकिन जानकारों का कहना है कि अमीर देशों में इस बात को लेकर संशय है कि वो कैसे पूर्वी यूरोप के ग़रीब देशों को इस बात के लिए तैयार करें कि वो भी दानदाताओं की सूची में शामिल हों.

साथ ही ये बात भी अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी है कि इस मद में फ़्राँस और जर्मनी कितनी राशि देंगे.

बीबीसी संवाददता का कहना है कि योगदान की राशि को लेकर संघ के देशों में सम्मेलन के दौरान तनातनी हो सकती है.

आशा

स्वीडन के प्रधानमंत्री फ़्रेडरिक रीनफेल्ट ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हम लोगों के पास आज रात के मुक़ाबले कल बेहतर आँकड़े होंगे."

उनका कहना था कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यक्रमों से जुड़े हुए हैं. ये एक स्वैच्छिक योगदान है, आधे से अधिक देशों ने अपने आँकड़े उपलब्ध करा दिए हैं.

ब्रसेल्स सम्मेलन में ग़रीब देशों को 2010-12 के बीच समुद्र की बढ़ते तल, जंगल के उजड़ने, पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन के दूसरे परिणामों से लड़ने के लिए पैसा मुहैया कराने की बात है, ताकि तेज़ी से क़दम उठाए जा सकें.

यूरोपीय संघ के अनेक अमीर देश महत्वपूर्ण योगदान देने की घोषणा कर चुके हैं, लेकिन अब तक ये स्पष्ट नहीं हो सका है कि जर्मनी, फ़्राँस और पूर्वी यूरोपीय देश योगदान के लिए तैयार हैं या नहीं.

सबसे अधिक योगदान ब्रिटेन की ओर से आया है, उसने 88 करोड़ 30 लाख यूरो जबकि स्वीडन ने 76 करोड़ 50 लाख यूरो देने की बात कही है. नीदरलैंड और डेनमार्क ने 30 करोड़ और 16 करोड़ यूरो के योगदान की घोषणा कर रखी है.

ये रक़म अगले तीन सालों 2010-12 के लिए होंगी.

यूरोपीय संसद के अध्यक्ष जर्ज़ी बुज़ेक ने संघ के नेताओं से आह्वान किया, "जलवायु परिवर्तन पर तेज़, बाध्यकारी और वैश्विक फ़ैसले होने चाहिए."

इस बीच अमरीकी सीनेट ने जलवायु परिवर्तन पर नए बिल का प्रस्ताव रखा है. जिसके तहत वर्ष 2005 के स्तर से 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 17 प्रतिशत कटौती की बात कही गई है.

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